बेइंसाफी के मुद्दों पर सरकार सफाई दे, न कि चुप रहे...

संपादकीय
27 अगस्त 2017


छत्तीसगढ़ में पुलिस के बहुत से मंझले और छोटे अफसरों की बर्खास्तगी से कुछ नए मुद्दे उठे हैं। बर्खास्त होने वाले अधिकारियों का अपना दर्द रहना जायज है, और उन्होंने यह सवाल खड़ा किया है कि बर्खास्त अधिकतर अफसर दलित और आदिवासी तबकों के हैं, और बर्खास्तगी तय करने वाली अफसरों की कमेटी में शायद कोई दलित-आदिवासी नहीं हैं। बर्खास्त लोगों में से कुछ महिलाओं ने यह सवाल भी खड़े किए हैं कि सवर्ण जातियों के बहुत से ऐसे अधिकारी हैं जिनके खिलाफ बड़ी गंभीर शिकायतें बनी हुई हैं। इसके अलावा कम से कम एक महिला अधिकारी ने अपने बड़े अफसरों के चाल-चलन को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं, और उसका कहना है कि उसने पहले भी इसकी शिकायत सरकार से की है। इसी वक्त राज्य सरकार में एक और कार्रवाई हुई है, एक बड़े आईपीएस अफसर को प्रमोशन दिया गया है, और उसके खिलाफ एक छोटी महिला सिपाही द्वारा यौन प्रताडऩा की लगातार की गई शिकायत पर कोई कार्रवाई न होने को लेकर राष्ट्रीय महिला आयोग तक कई बार नोटिस भेज चुका है। खुद राज्य सरकार ने इस सिपाही की शिकायत पर बड़ी उच्च स्तरीय जांच करवाई थी, और उसकी रिपोर्ट भी सरकार और पुलिस मुख्यालय के बीच फुटबॉल की तरह एक-दूसरे की तरफ फेंकी जा रही है, और कोई कार्रवाई नहीं की गई।
हम इनमें से किसी भी आरोप या किसी भी शिकायत के सही या गलत होने पर कुछ कहे बिना इन मुद्दों पर चर्चा करना चाहते हैं कि अगर राज्य में दलित-आदिवासी जैसे कमजोर तबके के लोगों को भेदभाव की ऐसी शिकायत हो रही है, तो राज्य सरकार को और राज्य की दूसरी राजनीतिक-सामाजिक ताकतों को इसके बारे में सोचना चाहिए। न्याय का एक बुनियादी सिद्धांत रहता है कि न्याय न सिर्फ होना चाहिए, बल्कि वह होते हुए दिखना भी चाहिए। क्या सरकारी कर्मचारियों-अधिकारियों की बर्खास्तगी के लिए बनी कमेटियों में सरकारी सेवा के कमजोर तबकों के अधिकारी सचमुच नहीं हैं? क्या किसी छोटी महिला सिपाही की बार-बार लिखवाई गई रिपोर्ट, बार-बार की गई शिकायत पर खुद शासन की करवाई गई जांच की रिपोर्ट पर महीनों गुजर जाने के बाद भी कोई कार्रवाई न करना, और आरोपों से घिरे अफसर को प्रमोशन देना जायज बात है? हम यहां पर इन दोनों पक्षों में से किसी एक की हिमायत नहीं कर रहे, लेकिन क्या लोकतांत्रिक-निर्वाचित सरकार को इंसाफ करते हुए दिखना नहीं चाहिए? ऐसी कौन सी वजह है कि राज्य की एक सबसे बड़ी महिला अधिकारी की अगुवाई में बनाई गई जांच कमेटी की रिपोर्ट को न सरकार खारिज कर रही है, न उसे मंजूर करके कोई कार्रवाई कर रही है? ऐसे में जब सिपाही स्तर की एक महिला आईजी स्तर के एक अफसर के खिलाफ लगातार इंसाफ की लड़ाई लड़ रही है, तो उसकी बात अनसुनी करके, जांच रिपोर्ट को अनदेखा करके राज्य सरकार प्रदेश की बाकी महिला कर्मचारियों और बाकी महिलाओं को किस तरह का संदेश दे रही है?
हमारा ख्याल है कि संविधान में और कानून में भारत के कमजोर तबकों को खुलासे से पहचाना गया है, और उनके बारे में खास सावधानी बरतने, उनका खास ख्याल रखने की जिम्मेदारी न सिर्फ राज्य सरकारों को, बल्कि राज्यपालों को भी दी गई है। राज्यपालों को एक किस्म से ऐसे कमजोर तबकों का संरक्षक माना गया है, और छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी-बहुल राज्य में तो राज्यपाल का आदिवासी इलाकों के लिए अतिरिक्त जिम्मा भी संविधान में लिखा गया है। ऐसे में अगर सरकार लगातार दलित-आदिवासी कर्मचारियों-अधिकारियों के साथ भेदभाव की नाइंसाफी करने की तोहमत पा रही है, तो सरकार को किसी स्तर पर अपनी सफाई देनी चाहिए। इसके अलावा अगर महिला का शोषण हुआ है, और वह इंसाफ की लड़ाई लड़ रही है, तो उसे सड़क पर अकेले छोड़कर सरकार ऐसे अफसर को प्रमोशन दे जिस पर तोहमतें लगी हैं, और जैसी कि खबरें हैं, जांच रिपोर्ट में आरोप सही पाए गए हैं, तो यह राज्य का कैसा कल्याणकारी रूख है? छत्तीसगढ़ सरकार को आज देश की हवा देखते हुए यह समझ लेना चाहिए कि देश की न सिर्फ मुस्लिम महिलाओं के बीच तीन तलाक को लेकर जागरूकता आई है, बल्कि देश की सभी महिलाओं के बीच अपने अधिकारों को लेकर एक नया हौसला सामने आया है, और कानून उनका साथ भी दे रहा है। दूसरी बात यह दलित-आदिवासी तबकों की शिकायतों को लगातार और लंबे समय तक अनदेखा करना है किसी भी राजनीतिक ताकत के लिए समझदारी नहीं होगी, क्योंकि ये तबके सड़कों पर लड़ाई के साथ-साथ राजनीतिक ध्रुवीकरण की ताकत भी रखते हैं, और अदालतों में जाने जितनी ताकत भी इनकी हो गई है।
एक जनकल्याणकारी सरकार की जिम्मेदारी निभाते हुए छत्तीसगढ़ सरकार को इन तमाम मुद्दों पर अपना पक्ष साफ करना चाहिए, इसके पहले कि नसबंदी मौतों, बस्तर की बलात्कार-मौतों, और गौशाला-मौतों के बाद बेइंसाफी की शिकार किसी महिला की हताशा-मौत भी सामने आ जाए। 

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