विपक्षी एकजुटता को लालू ने औलादों को समर्थन मान लिया

संपादकीय
28 अगस्त 2017


बिहार में कल भाजपा, मोदी, और नीतीश के खिलाफ लालू यादव ने विपक्ष की एक बड़ी रैली बुलाई जिसमें डेढ़ दर्जन पार्टियां शामिल हुईं, और कांग्रेस से अध्यक्ष-उपाध्यक्ष उसमें नहीं पहुंच पाए लेकिन उन्होंने अपना संदेश भेजा और पार्टी के नेता भेजे। यह एक अलग विवाद चल रहा है कि रैली में भीड़ की जो फोटो लालू यादव ने ट्वीट की है वह असली है या नकली है, लेकिन दूसरी तरफ जो बात रैली के कल के नजारे से सामने आ रही है, और आज लालू के बयान से दिख रही है, उससे लगता है कि अपनी दुर्गति के बावजूद लालू यादव को यह अक्ल नहीं आई है कि अब समय अश्लील कुनबापरस्ती का नहीं रह गया है, और वे सारे विपक्ष को इसलिए इकट्ठा नहीं कर सकते कि वे अपनी औलादों को आगे बढ़ाएं। विपक्ष के नेता मोदी के विरोध के लिए पहुंचे थे, उनकी एकजुटता को अपनी औलादों का समर्थन मानने की गलती करके लालू यादव और कहीं के नहीं रहेंगे।
कल जिस तरह से सर्वदलीय या बहुदलीय आमसभा के मंच पर देश भर के नेताओं की मौजूदगी में लालू के बेटों ने एकाधिकार जमा रखा, और एक बेटे ने जिस भौंडी जुबान में आरएसएस के मुखिया के खिलाफ नासमझी की बातें कीं, उनसे भी यह जाहिर होता है कि लालू अपने कुनबे को बचाने और बढ़ाने के लिए विपक्ष का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह बात विपक्ष की एकता की किसी भी संभावना को चौपट करने के लिए काफी है क्योंकि मोदी के खिलाफ, एनडीए या भाजपा के खिलाफ कोई भी मोर्चा मुद्दों पर आधारित हो सकता है, न कि कुनबे पर आधारित। और फिर आज लालू यादव ने अपने बेटों को कृष्ण और अर्जुन बताते हुए जिस तरह के बयान दिए हैं, वह सब विपक्ष की संभावनाओं पर एक बड़ी चोट है। पिछले दिनों, कुछ हफ्ते पहले ही नीतीश कुमार ने विपक्ष की संभावनाओं को चौपट किया था, और अब लालू इस अंदाज में दिख रहे हैं, कि आज मेरी बारी है।
जब भाजपा विरोधी नेता इस कदर आत्ममुग्ध हों, और बददिमाग हों, तो फिर इस देश में भाजपा-विरोध की बात करना फिजूल है। देश में जब-जब कोई मुद्दा जलता-सुलगता है, कांग्रेस पार्टी के राजकुमार देश के बाहर रहते हैं, और बाहर भी ऐसे रहते हैं कि दो लाईन का बयान भी नहीं दे सकते। हरियाणा आज जिस तरह से बाबाग्रस्त है, जल रहा है, वैसे में राहुल गांधी को आज नार्वे की राजनीति की फिक्र पड़ी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भाजपा-राज्यों की नाकामयाबी पर ट्वीट न करना तो समझ आता है, लेकिन जिस राहुल गांधी को ऐसे में लीड लेनी चाहिए, वे ऐसे मौके पर चुप और नदारद रहते हैं। कांग्रेस पार्टी में भाजपा से विरोध का खुला दमखम रखने वाले दिग्विजय सिंह हाशिए पर कर दिए गए हैं, और बाकी नेता मानो सहमे-सहमे से बयान देते हैं।
भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष की संभावनाएं बनना तो दूर रहा, हर कुछ महीनों में ये संभावनाएं चौपट हो रही हैं, और इसके बाद अगर भाजपा विरोधी पार्टियां देश की जनता को साम्प्रदायिकता के झांसे में आने की तोहमत देंगी, तो वह पूरी तरह से नाजायज तोहमत होगी। जब भाजपा का कोई विकल्प देश की जनता के सामने पेश नहीं किया जाएगा, तो उसके पास पसंद क्या है?

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