बच्चे सीधे चैंपियन नहीं बन जाते, उनके अभ्यास को मैदान लगते हैं...

संपादकीय
29 अगस्त 2017


छत्तीसगढ़ में अभी कुछ देर पहले सरकार के सालाना खेल जलसे में राज्य के होनहार खिलाडिय़ों का सम्मान किया गया, और उन्हें अलग-अलग पुरस्कार दिए गए। इस मौके पर मुख्यमंत्री ने राज्य की खेल नीति बनाने की घोषणा भी की है, लेकिन हमारी नजर में राज्य के खेल को जो सबसे नुकसानदेह बात है, उसकी यहां पर चर्चा जरूरी है ताकि उसे खेल नीति में शामिल किया जा सके, और सरकार यह घोषणा करे कि उसे पूरी तरह माना जाएगा।
राज्य में स्कूल-कॉलेज के खेल मैदानों के अलावा हर शहर-कस्बे में बहुत से सार्वजनिक मैदान ऐसे रहते हैं जिन पर खेल होना चाहिए। लेकिन हम राजधानी रायपुर में ही देखते हैं कि ऐसे तमाम मैदानों पर कोई न कोई बाजारू कार्यक्रम चलते रहता है, और धर्म, समाज, राजनीति, कारोबार के कोई न कोई जलसे हर मैदान के लिए कतार में लगे ही रहते हैं। सरकार रिकॉर्ड में इन मैदानों को इन आयोजनों के लिए कुछ दिनों के लिए देना दिखाया जाता है, लेकिन उनके कई दिन पहले से, कई मामलों में तो हफ्तों पहले से उन मैदानों पर तैयारी शुरू हो जाती है, और कार्यक्रम निपट जाने के बाद गड्ढों और कचरे से भरे हुए मैदान को छोड़ दिया जाता है। स्कूल और कॉलेज के मैदान भी किसी न किसी भवन बनाने में छोटे कर दिए जाते हैं, और राजधानी रायपुर का ऐतिहासिक सपे्र स्कूल मैदान तो आसपास की सड़कों को चौड़ा करके महज पार्किंग-इस्तेमाल के लिए छोटा कर दिया गया है, और अब वह किसी टूर्नामेंट के आकार का नहीं बचा है। इसी तरह राजधानी का ऐतिहासिक गवर्नमेंट स्कूल अपने मैदान की लंबाई-चौड़ाई को सड़कें चौड़ी करने के लिए खो बैठा है, और सड़कों की यह चौड़ाई महज पार्किंग के उपयोग में आ रही हैं।
हमारा ख्याल है कि छत्तीसगढ़ सरकार को सबसे पहले यह खुली घोषणा करनी चाहिए कि राज्य के किसी भी मैदान की एक इंच जमीन भी नहीं खाई जाएगी। ऐसा अगर नहीं होगा, तो खेलों के नाम पर जलसे जरूर होंगे, बाहर की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय टीमों के आने पर राज्य के बड़े-बड़े स्टेडियमों में मैच तो हो जाएंगे, लेकिन स्थानीय बच्चों के खेलने-कूदने की जगह खत्म होती जाएंगी। कभी किसी जरूरत के लिए, तो कभी किसी और जरूरत के लिए, मैदानों पर लोगों की नजर लगी रहेगी और बच्चों का मैदानों पर हक सबसे आखिर में आएगा। किसी भी देश-प्रदेश में बच्चे सीधे-सीधे स्टेडियम में खेलने वाले चैंपियन नहीं बन जाते। उनको अभ्यास के लिए जब तक अपने स्कूल-कॉलेज, मोहल्ले में मैदान नहीं मिलेंगे, तब तक वे तरक्की नहीं कर सकेंगे। इसके अलावा सरकार को यह भी समझना चाहिए कि खेल मैदान किसी भी शहर में खुली हवा की जगह भी रहते हैं, और उनकी वजह से आसपास की प्रदूषित हवा का जहर कुछ कम भी होता है। 

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