स्कूल से मीडिया तक खड़ा कर ठगने वाले से सबक लें

संपादकीय
30 अगस्त 2017


छत्तीसगढ़ में कुछ बरस पहले लोगों से करीब 50 करोड़ रूपए ठगकर भागने वाले एक स्कूल संचालक राजेश शर्मा और उसकी पत्नी को बरसों की तलाश के बाद रायपुर पुलिस ने हैदराबाद से गिरफ्तार किया है। जिस आदमी ने रायपुर सहित प्रदेश के बहुत से शहरों में डॉल्फिन नाम से स्कूलें खोली थीं, और बच्चों के मां-बाप को यह झांसा दिया था कि पहली से बारहवीं तक की फीस एक साथ देने पर मोटी रियायत मिलेगी। मध्यम वर्ग के लोग लालच में आ गए, और उन्होंने फिल्मी सितारों के इश्तहार वाले इस स्कूल को अपनी मेहनत की कमाई दे दी। इसके बाद इस स्कूल संचालक ने धूमकेतु की रफ्तार से अखबार शुरू किया, टीवी समाचार चैनल की तैयारी की, और बड़े-बड़े लोगों के साथ उठना-बैठना शुरू हुआ।
अब उसकी गिरफ्तारी तो हो गई है, लेकिन जिनका पैसा डूबा है, उनमें से शायद ही किसी को कुछ वापिस मिल सके। ऐसा आज बहुत सी चिटफंड कंपनियां भी कर रही हैं, कुछ मार्केटिंग कंपनियां कर रही हैं, और कुछ नेटवर्क-मार्केटिंग योजनाएं भी लोगों को ऐसा झांसा दे रही हैं। इससे दो तरह के लोग साजिश के शिकार हो रहे हैं। वे लोग जो कि अपनी रकम ऐसे कामों में लगाते हैं, और वे लोग जो कि ऐसी योजनाओं और ऐसे जालसाजों के एजेंट बनकर काम करते हैं। न सिर्फ छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश में जगह-जगह जालसाज योजनाओं की घोषणा करके ऐसा कर रहे हैं, और बहुत से मामलों में अखबार निकालकर या टीवी चैनल शुरू करके, कोई वेबपोर्टल शुरू करके उसकी आड़ में भी ऐसा कर रहे हैं। हमने बहुत से जालसाजों को मीडिया की ताकत और उसके असर का इस्तेमाल करके लोगों के पीछे घुसपैठ करते देखा है। छत्तीसगढ़ में ही कुछ ऐसी चिटफंड कंपनियों ने लोगों के सैकड़ों करोड़ ठग लिए, जो कि अखबार की आड़ में यह धंधा कर रही थीं।
टीवी चैनलों के मामले में केन्द्र सरकार के नियम बड़े कड़े हैं, और कोई नया चैनल शुरू होने के पहले उसके पीछे के पूंजीनिवेशकों की खासी लंबी-चौड़ी जांच होती है, लेकिन अखबारों के मामले में ऐसा कुछ भी नहीं है। कोई मुजरिम भी जेल के भीतर से अखबार शुरू कर सकते हैं, और जेल से ही उसका संपादन कर सकते हैं। सरकार अखबार का नाम रजिस्टर करने के पहले किसी तरह की जांच नहीं करती है, और जाहिर तौर पर जो लोग ठगी-जालसाजी कर रहे हैं, जो लोग पूरी तरह से दो नंबर के धंधों से लाई हुई रकम से, दो नंबर के धंधे बढ़ाने के लिए, उनको सुरक्षा दिलाने के लिए अखबार शुरू करते हैं, उस पर भी न तो कोई रोक है, और न ही समाज के लोग ही ऐसे अखबारों के साथ कोई फर्क करते हैं। छत्तीसगढ़ की इसी राजधानी रायपुर में एक कुख्यात मुजरिम ने दर्जनों मामलों से जमानत पर रहते हुए एक अखबार शुरू किया था, तो प्रदेश के बड़े-बड़े अखबारनवीस उसमें काम करने चले गए थे, और उन सबकी मेहनत भी उसमें डूब गई थी, लेकिन तब तक उसे केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के इतने इश्तहार मिलते रहे, जितने कि बड़े-बड़े प्रतिष्ठित और प्रसारित अखबारों को भी नहीं मिलते थे।
दरअसल सरकार का काम तो कागजों पर फर्जी आंकड़े खड़े करके उन्हें दाखिल किए गए प्रमाण पत्र से भी चल जाता है, लेकिन समाज के लोगों को अच्छे और बुरे में फर्क करना सीखना चाहिए, वरना फिल्मी सितारों की चकाचौंध, बड़े-बड़े कार्यक्रम, बड़े-बड़े ईनाम, जिनका कि पत्रकारिता से कुछ भी लेना-देना नहीं रहता है, उनकी आड़ में वे एक मिलावटी पत्रकारिता ही पाते हैं, जिसके पीछे दूसरे कारोबारों से आई हुई कमाई रहती है, और जिसकी ताकत से दूसरे कारोबारों को सुरक्षा दिलाने की नीयत रहती है। अभी गिरफ्तार किया गया यह ठग ऐसे कई पहलुओं की तरफ लोगों का ध्यान खींच रहा है, और ऐसे में ही लोगों को सावधानी सीखने का एक मौका भी मिलता है। लोग अपनी पूंजी ऐसे काम में लगाएं जो कि भरोसेमंद हो, और लोगों को रातों-रात हसीन सपने पूरे करने का भरोसा न दिलाते हों। दूसरी तरफ लोग ऐसे मीडिया पर भरोसा करें जो कि मीडिया की कमाई से चलता हो, न कि किसी दूसरे धंधे से लाई गई रकम से। 

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