विश्व स्तनपान सप्ताह जागरूकता की जरूरत

संपादकीय
4 अगस्त 2017


दुनिया भर में अभी विश्व स्तनपान सप्ताह मनाया जा रहा है। अगस्त का पहला हफ्ता इसी बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए रहता है, क्योंकि कुछ समाजों में किसी अंधविश्वास के चलते महिलाएं बच्चों को दूध पिलाने से कतराती हैं, तो कुछ अतिसंपन्न और अतिआधुनिक तबके की महिलाएं अपने शरीर की फिक्र करते हुए बच्चों को दूध पिलाने से बचती हैं। इसके अलावा बाजार में बच्चों के पहले खाने का कारोबार करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां बेबी फूड को बढ़ावा देने के लिए उसके फायदे गिनाते हुए इतने आक्रामक तरीके से डॉक्टरों और दवा दुकानों के रास्ते, और ईश्तहार से भी बेबी फूड को घर-घर तक पहुंचाने की कोशिश करती हैं। ऐसे में बच्चों के भले के लिए यह जागरूकता जरूरी है कि नवजात बच्चों को शुरुआती एक-दो बरस सबसे अधिक फायदा मां के दूध का होता है, और उसकी एक बूंद बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाती है, और उनके विकास में मदद करती है।
इसी से जुड़ा हुआ एक दूसरा मुद्दा कई बरसों से खबरों में हैं कि अपने बच्चों को दूध पिलाती हुई मां क्या अपने बदन को लेकर किसी तरह की अश्लीलता की नौबत लाती है, या कि किसी सार्वजनिक जगह पर भी मां और बच्चे का यह पहला हक होता है, कि वे बच्चे की जरूरत पूरी कर सकें। यह बहस चलती रहती है और लोग सार्वजनिक जगहों पर दूध पिलाती महिला को देखकर बड़बड़ाते भी हैं, और उसका बुरा भी मानते हैं। लेकिन दूसरी तरफ विकसित दुनिया में ऐसी महिलाएं हैं जो संसद में भी अपने बच्चों को लेकर जाती हैं, और वहां संसद की कार्रवाई के बीच बच्चे को दूध पिलाना वे अपना हक समझती हैं। दरअसल समाज में अधिकारों को लेकर इस तरह की जागरूकता का आंदोलन ताकतवर और संपन्न तबके की तरफ से, चर्चित लोगों की तरफ से शुरू होने पर उसके कामयाब होने की संभावना अधिक रहती है। समाज में बड़े कहे जाने वाले लोग जब कुछ करते हैं, तो उनसे नीचे के तबके में भी उसे मंजूर करने का मिजाज रहता है। इसलिए विकसित देशों के ताकतवर तबके से शुरू हुई यह बात बाकी दुनिया तक भी पहुंच सकती है।
दूसरी बात यह है कि जो मजदूर या गरीब तबका रहता है, उसकी महिलाओं के पास तो पसंद-नापसंद की संभावना भी नहीं रहती। उसे तो मजदूरी की जगह पर, या सड़क किनारे फुटपाथ पर बैठकर भी अपने बच्चे को दूध पिलाना पड़ता है। इसलिए अधिक दिक्कत मध्यम वर्ग की है जो कि सामाजिक रीति-रिवाजों को सबसे अधिक ढोने का आदी रहता है। समाज की सोच में एक बदलाव की जरूरत है कि महिला और बच्चे के अधिकार बाकी तमाम अधिकारों से ऊपर हैं, और जिन लोगों को दूध पिलाती मां देखने में बुरा लगता हो, वे अपनी नजरों को लेकर कहीं दूर जा सकते हैं। कल ही एक खबर आई है कि भारत में बच्चों को मां का दूध न मिल पाने से देश का कितना नुकसान होता है। यह नुकसान सेहत पर भी होता है, और कुपोषण से प्रभावित होने वाली सेहत की वजह से बच्चों के बड़े होने पर उनकी आर्थिक उत्पादकता का नुकसान भी होता है। आमतौर पर कुपोषण से देश का होने वाला आर्थिक नुकसान गिनना आसान नहीं रहता, इसलिए उसकी चर्चा कम ही होती है। फिलहाल इस हफ्ते इस मुद्दे पर चर्चा करते हुए यह भी समझने की जरूरत है कि एक मां अपने बच्चे को ठीक से दूध पिला सके इसके लिए यह भी जरूरी है कि वह मां सेहतमंद रहे, बीमारियों से दूर रहे, और उसका खानपान ठीक हो। भारत के सक्षम और संपन्न तबके के लोग अपने आसपास में महिलाओं की सेहत का ध्यान रख सकते हैं, और उन्हें जागरूक बना सकते हैं। 

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