इस फर्क में पिछली सदी तक के फर्क के मुकाबले बड़ा फर्क है...

आजकल
28 अगस्त 2017

इंसान का पिछले कुछ सौ बरस का दर्ज इतिहास देखें तो यह समझ पड़ता है कि टेक्नालॉजी ने उसकी जिंदगी के रूख को भी बदला, और रफ्तार को भी। ऐसा माना जाता है कि इंसान ने जब चक्का बनाया, तो वह उस वक्त तक का सबसे बड़ा आविष्कार था क्योंकि मशीनों से लेकर गाडिय़ों तक, और अब हवाई जहाज के उडऩे तक, इनमें से कोई भी काम चक्के के बिना नहीं हो सकता था। इसके अलावा कभी बारूद का आविष्कार, तो कभी बिजली का आविष्कार, कभी टेलीफोन का आविष्कार या कभी सीमेंट का, इन्होंने इंसान की जिंदगी को और जीने के तौर-तरीकों को समय-समय पर बदला, किसी ने कम, किसी ने अधिक।
ऐसा माना जाता है कि चक्के का आविष्कार पासान मानव के वक्त, एक ऐसे दौर में हुआ जिसे निओलिथिक दौर कहते हैं। लेकिन पिछले हजारों बरस में, चक्के के बनने के बाद से अब तक टेक्नालॉजी ने लोगों की जिंदगी बदलने में सैकड़ों बरस लगाए। लेकिन हाल के बरसों को देखें तो इंटरनेट, मोबाइल फोन, और सोशल मीडिया जैसे औजारों ने मोटे तौर पर पिछले बीस-पच्चीस बरसों में दुनिया के इतने बड़े हिस्से की जिंदगी को इतना बदलकर रख दिया है कि पच्चीस बरस बाद कोई कोमा से बाहर आएं, तो उन्हें लगेगा कि वह विज्ञान कथा की किसी नई दुनिया में पहुंच गए हैं।
यहां पर यह भी समझने की जरूरत है कि इन सूचना-औजारों में कामकाज और लोगों की उत्पादकता, कारोबार और किसी प्रोडक्ट की धारणा को तो एक विस्फोट की रफ्तार से बदलकर रख दिया है, लेकिन इसके साथ-साथ इंसान के संबंधों और उनकी सोच को भी, संस्कृतियों और जीवन के मूल्यों को भी इस कदर बदल दिया है, कि उन्हें पहचानना मुश्किल है। एक वक्त था जब लोगों की जिंदगी में स्टूडियो में पहुंचकर एक तस्वीर खिंचवाना बड़ी बात होती थी, और उस एक तस्वीर की तीन कॉपियां बनवाकर उन्हें पीढिय़ों तक सम्हालकर रखा जाता था। आज लोग खाते-नहाते अपनी तस्वीरें लेते हैं, उन्हें सेमर के फल के फटने पर हवा में उड़ते रेशों की तरह चारों तरफ फैला देते हैं, और उन पर दुनिया भर में बिखरे दोस्तों के बीच चर्चा भी शुरू हो जाती है।
अभी हिन्दुस्तान के सुप्रीम कोर्ट में निजता के अधिकार को लेकर एक ऐतिहासिक और सबसे बड़ा फैसला हुआ है, लेकिन इस निजता को लोग आज सोशल मीडिया पर खुद होकर जिस अंदाज और रफ्तार से कचरे की टोकरी में डालते दिखते हैं, वह भी किसी ने अभी दस-बीस बरस पहले तक सोचा भी न होगा। इस तरह टेक्नालॉजी ने इस बार जिस रफ्तार से लोगों की जिंदगी बदली है, उसकी कल्पना विज्ञान कथा लेखकों से परे शायद ही किसी ने की हो।
निजी जिंदगी, कामकाज, कारोबार, लोकतंत्र, कानून, इन सबकी परिभाषाएं जिस रफ्तार से टेक्नालॉजी की वजह से बदल रही हैं, वह अविश्वसनीय सा है। लोगों के परिवार के भीतर के रिश्ते ऐसे बदल रहे हैं कि एक पीढ़ी पहले तक उसकी कल्पना किसी ने नहीं की होगी। सामाजिक संस्कृति, पारिवारिक तौर-तरीके, और निजी सोच, इन सबमें संचार तकनीक और सोशल मीडिया ने एक धमाके के साथ कुछ वैसा ही फर्क ला दिया है जैसा कि किसी खदान में चट्टानों को तोडऩे के लिए धमाका किया जाता है, और उसके साथ ही वहां की तस्वीर बदल जाती है। दो पीढिय़ों के बीच के फासले, परिवार के भीतर के दो रिश्तों के बीच के फासले, ये सारे के सारे खो गए हैं, और तकनीक की एक छलांग ने इन सबको एक बराबर नाप दिया है, एक साथ पार कर लिया है, और इनके बीच की सरहदों को मिटा दिया है।
और किसी भी टेक्नालॉजी की तरह, संचार और सोशल मीडिया की यह टेक्नालॉजी लौटने के लिए नहीं आई है, महज आगे बढऩे के लिए आई है। चक्का जब पत्थर का बना था, तो वह फिर से पत्थर बनने के लिए नहीं बना था, घूमने के लिए, घुमाने के लिए, और आगे बढऩे के लिए बना था। उसी तरह आज संचार तकनीक और अधिक संपर्क, और अधिक अंतरसंबंध, और अधिक बताने और जानने के लिए आई है, और धीरे-धीरे यह एक ऐसे दिन की तरफ बढ़ रही है जब औजारों की जरूरत कम से कम होती जाएगी। आज भी जिस तरह मोबाइल फोन के सिग्नल दिखते नहीं हैं, घरों के भीतर वाईफाई की तरंगें दिखती नहीं है, लेकिन हैं। इसी तरह फोन या कम्प्यूटर की तरह के औजार धीरे-धीरे खत्म होने की तरफ बढ़ रहे हैं, और लोगों के बदन में ऐसी माइक्रोचिप लगाना शुरू हो गया है जो कि महज सिग्नलों के मार्फत दूसरी मशीनों से, दूसरे लोगों से बातचीत करने लगेंगे, करने लग गए हैं, और अमरीका में ऐसे दफ्तर सामने आए हैं जहां के कर्मचारी अपने बदन में माइक्रोचिप लगवाकर सभी तरह की शिनाख्त और पासवर्ड की जरूरत को पार कर चुके हैं। दूसरी तरफ टेक्नालॉजी ऐसे उपकरण बना चुकी है जिससे कम्प्यूटर किसी के दिमाग में चल रही बातों को पढऩे लगे हैं, और दिमाग अब महज सोचकर कम्प्यूटरों पर काम करने लगे हैं, बिना बोले, बिना उंगली भी हिलाए।
इंसानों के बीच अब तक बिना बोले महज उंगलियों से एक फोन से दूसरे फोन पर, एक संदेश से दूसरे संदेश पर बातचीत रोजमर्रा की बात हो गई है। अब अगला कदम टेक्नालॉजी का यह रहने जा रहा है कि बिना कहे एक-दूसरे से कह लेना, और दूसरे को सुन लेना। तीसरा कदम जिस तरफ इंसान बढ़ चुके हैं, वह है लोगों के दिमाग को पढ़ लेना, और यह बहुत दूर की बात नहीं है, शायद अगली आधी सदी के भीतर यह होने लगेगा।
लेकिन हजारों बरस के सफर में इंसान टेक्नालॉजी की मदद से 20वीं सदी में ही कम्प्यूटर-इंटरनेट, और फोन के इस्तेमाल से अपनी जिंदगी को बदल पाए। इनमें से सौ-सौ बरस में लोगों की जिंदगी में जो फर्क पड़ा होगा, वह अब शायद हर एक बरस में या हर दो-चार बरस में पडऩे लगा है, और इस बार का यह फर्क किसी कारोबार या किसी सामान के मार्फत न होकर, किसी कारखाने से बनकर कारोबारी से होते हुए ग्राहक के हाथों तक न पहुंचकर, सीधे एक इंसान से दूसरे इंसान के हाथों, एक इंसान से दूसरे के दिमाग तक पहुंचने वाला फर्क है, और इस फर्क में पिछली सदी तक के फर्क के मुकाबले खासा बड़ा फर्क है।

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