मुंबई स्टेशन पर भगदड़-मौतें, लोगों की सोच से लेकर रेलवे की क्षमता तक सुधार जरूरी

संपादकीय
29 सितंबर 2017


भारत के सबसे बड़े महानगर और देश की कारोबारी राजधानी मुंबई के एक लोकल ट्रेन स्टेशन पर किसी अफवाह के चलते एक पुल पर भगदड़ हुई और कुचलकर 22 लोगों की मौत हो चुकी है, दर्जनों घायल हैं। आज ही नए रेलमंत्री पीयूष गोयल मुंबई पहुंचे थे, और वे इसी लोकल ट्रेन से सफर करने वाले थे। देश के सबसे अनुशासित माने जाने वाले मुंबई के लोगों के बीच ऐसी भगदड़ हैरान करने वाली है क्योंकि वहां हर दिन 75 लाख से अधिक लोग लोकल ट्रेन में सफर करते हैं, और बहुत बुरी भीड़ के बीच भी डिब्बों के बाहर टंगे हुए रोज का सफर एक आम बात है, लेकिन ऐसी भगदड़ की बात कभी सुनी नहीं गई। लोग व्यस्त घंटों में बहुत ही धक्का-मुक्की के साथ ट्रेन में चढ़ पाते हैं, और हर कुछ मिनट में हर रास्ते पर चलने वाली लोकल ट्रेन भी मुंबई की जरूरत के मुताबिक कम पड़ती है, लेकिन ऐसा हादसा वहां कभी नहीं हुआ था।
देश में रेलवे स्टेशनों पर, या किसी मेले के दौरान नदी के घाट पर, नदी के पुल पर पहले भी ऐसे हादसे हुए हैं। उनमें से अधिकतर हादसे किसी अफवाह के चलते हुए जिन्हें सुनकर लोग जान बचाकर भागने लगे, और इसी चक्कर में मौतें हुईं। भारत की आबादी जितनी अधिक है, और लोगों की भीड़ कुछ खास दिनों पर जिस तरह कुछ जगहों पर जुटती है, उससे भी भगदड़ की नौबत आती है। लेकिन मुंबई के लोग जो कि बहुत तेज और स्ट्रीट-स्मार्ट माने जाते हैं, वे भी एक अफवाह का शिकार हो गए, यह बात कुछ हैरान करने वाली है। यहां पर इस बात की चर्चा इसलिए जरूरी है कि अफवाहें उन्हीं जगहों पर अधिक फैलती हैं, जिन जगहों पर लोगों में वैज्ञानिक सोच और तर्कशक्ति कम होने लगती हैं। आज पूरे देश में ऐसा माहौल है कि लोग अपनी सामान्य समझबूझ भी खो रहे हैं, और वे अंधभक्ति से लेकर धर्मान्धता तक अलग-अलग किसी न किसी बात के शिकार हो रहे हैं। इंसान का मिजाज टुकड़े-टुकड़े में समझदार और नासमझ नहीं बनता। लोग अगर समझदार रहते हैं तो हर बात में समझदार रहते हैं, और लोग अफवाहों पर भरोसा करने लगते हैं तो वे किसी भी तरह की प्रतिमा को दूध पिलाने भी पहुंच सकते हैं, और चोटी काटने के शक में लोगों की हत्या भी कर सकते हैं।
किसी देश को अपने लोगों के बीच जो खूबियां बढ़ानी चाहिए उनमें तर्कशक्ति, और वैज्ञानिक सोच-समझ बहुत अहमियत रखती हैं। इसके अलावा लोगों के बीच में अपनी जिम्मेदारी का एहसास बढऩा चाहिए, और दूसरों के अधिकारों के लिए सम्मान भी बढऩा चाहिए। जब हमारी राष्ट्रीय सोच-समझ न्यायप्रिय होने लगेगी, तो हम किसी भी तरह की अफवाह और भगदड़ से भी बचेंगे। दुनिया के बहुत से देश ऐसे हैं जहां लोग पहले दूसरों के अधिकार की फिक्र करते हैं, और जब उनका सम्मान हो जाता है, तब फिर वे अपने अधिकारों के बारे में सोचते हैं। हिन्दुस्तान में हाल इससे ठीक उल्टा है, यहां पर लोग पूरे वक्त अपने अधिकारों की न केवल फिक्र करते हैं, बल्कि अपने अधिकारों का दावा भी ठोंकते रहते हैं, और अपनी जिम्मेदारी की बात भी नहीं सोचते हैं। ऐसी सोच ही किसी भगदड़ में लोगों को औरों की जान बचाने के बजाय अपनी जान बचाने के लिए बाकी लोगों को कुचलने का हौसला देती है। भारत में त्याग और जिम्मेदारी की एक समझ विकसित करने की बहुत जरूरत है क्योंकि धर्म और आध्यात्मिक गुरूओं की अंधश्रद्धा में फंसे हुए लोगों के बीच कभी कोई साम्प्रदायिक अफवाह फैलाई गई, तो उसे झूठा साबित करने के पहले बड़ी संख्या में मौतें हो जाएंगी।
मुंबई का यह हादसा रेलवे स्टेशनों की क्षमता की तरफ भी ध्यान खींचता है। देश को सबसे अधिक टैक्स और रोजगार देने वाला यह महानगर बुरी तरह से लदा हुआ है, और अपनी क्षमता खो चुका है। मुंबई को जीने लायक बनाने के लिए बहुत कुछ सोचने और करने की जरूरत है। यहां पर लाखों लोग रोज लोकल ट्रेन के दरवाजों पर लटककर सफर करने को मजबूर हैं, और सरकारें इसे लोगों की नियति मानकर जरूरतों को अनदेखा करते आई हैं। हो सकता है कि इस हादसे के बाद सुधार हो सके। अभी तो एलफिंस्टन रोड नाम के इस स्टेशन का नाम बदलकर प्रभादेवी रखा गया था, जब जरूरत क्षमता को बढ़ाने की थी, तब बरसों से चली आ रही मांग को अनदेखा करते हुए सरकार ने केवल स्टेशन के नाम को बदलकर प्रभादेवी कर दिया था। देवी का नाम तब तक किसी काम का नहीं है जब तक इंसान अपने खुद के इंतजाम को न सुधारे। रेलवे को इस हादसे से एक बड़ा सबक लेने की जरूरत है, और देश के ऐसे तमाम स्टेशनों पर नजर डालने की जरूरत है जहां क्षमता चुक चुकी है।

बाप-बेटे के बीच बहस छेडऩे से हकीकत नहीं बदलने वाली

संपादकीय
28 सितंबर 2017


अटल सरकार में वित्तमंत्री रहे, और अब तक भाजपा के सदस्य, यशवंत सिन्हा ने कल एक नई बहस शुरू की कि मोदी सरकार के आने के बाद से देश की आर्थिक नीति, अर्थव्यवस्था का क्या हाल हुआ है। उन्होंने एक अखबार में एक लंबा लेख लिखकर वित्तमंत्री अरूण जेटली पर तगड़ा हमला किया है कि नोटबंदी से लेकर जीएसटी तक बहुत से मोर्चों और मुद्दों पर केन्द्र सरकार किस तरह तबाही लेकर आ रही है, देश बहुत बुरी नौबत में पहुंच चुका है, और इससे तेज रफ्तार से उबरने का कोई जरिया नहीं है। केन्द्र सरकार ने मानो इस हमले का जवाब देने के लिए यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा से एक लेख एक दूसरे अखबार में लिखवाया जिसमें देश की आर्थिक नीतियों और आर्थिक स्थिति का बचाव किया गया है। अभी पिछले मंत्रिमंडल फेरबदल के पहले तक जयंत सिन्हा वित्त राज्यमंत्री भी थे, और वित्तमंत्री अरूण जेटली के सहयोगी के रूप में वे आर्थिक नीतियों के लिए कम या अधिक हद तक जवाबदेह भी थे।
लेकिन पिता-पुत्र के बीच के इस सार्वजनिक संवाद को छोड़ भी दें, तो भाजपा के भीतर इस बात को लेकर आज बहुत से नेताओं में इस बात पर बड़ा असमंजस है कि देश की आज की अर्थव्यवस्था को लेकर वे आम मतदाताओं को क्या जवाब दें? नोटबंदी से शुरू हुई आम जनता की तबाही जीएसटी से छोटे-बड़े कारोबारियों की तबाही तक जारी रही, सरकार और रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक नोटबंदी से कोई काला धन सामने नहीं आया और तकरीबन सारे ही नोट बैंकों में लौट आए। दूसरी तरफ बिना तैयारी के जिस तरह जीएसटी को लागू किया गया, उससे बाजार आज भी नहीं उबर पाया है, कारोबारियों में दहशत है, और दीवाली के वक्त भी धंधा मंदा है। ऐसी नौबत में यशवंत सिन्हा की उठाई हुई बहुत सी बातों पर गौर करने की जरूरत है, और इसका कोई विकल्प जयंत सिन्हा के लिखे लेख के रूप में सामने नहीं आ सकता।
दरअसल पिछले आम चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी पार्टी की अगुवाई भी कर रहे थे, और वे जिस ऐतिहासिक जीत के साथ सत्ता में आए, बाद में कुछ और राज्यों में भी उन्होंने अभूतपूर्व जीत हासिल की, उससे मिले आत्मविश्वास से उन्होंने कई ऐसे फैसले लिए जो कि बाजार के पैमानों पर तो कमजोर थे, लेकिन जो देश के लिए जनता के त्याग का नारा लगाने वाले थे, और राष्ट्रवाद के नाम पर जनता से उम्मीद करते थे कि वह तकलीफें झेल ले। लेकिन नारों से परे, भाषणों से परे, और सोशल मीडिया पर समर्थकों की एक बड़ी फौज की कोशिशों से परे, आज हकीकत यह है कि देश में बेरोजगारी बढ़ी हुई है, उत्पादन गिर गया है, कारोबार गिर गया है, नोटबंदी की वजह से रोज कमाने-खाने वाले लोगों के बहुत से दिन बर्बाद हुए जिसकी कोई भरपाई न होनी थी, न हुई है। इन तमाम बातों को अनदेखा करना न तो केन्द्र सरकार के लिए अच्छी बात है, न ही भारतीय जनता पार्टी के लिए। आज जिस तरह से चुनाव के करीब पहुंचते गुजरात में एक जुमला लोगों की जुबान चढ़ रहा है कि विकास पगला गया है। यह नारा मोदी और भाजपा के गुजरात के विकास के दावों के जवाब में उछला है, और अब जोर पकड़ते जा रहा है। भारत जैसे लोकतंत्र के चुनावों में हकीकत जितना ही वजन जनधारणा और नारों का रहता है, आज न तो ठोस कारोबारी और आर्थिक हकीकत सरकार की साख बचा पा रही है, न ही जनधारणा उसके पक्ष में है, और न ही अब नारे उसके साथ रह गए हैं। हम तो चुनावी नफे-नुकसान से परे भी देश की असली-जमीनी अर्थव्यवस्था की फिक्र करते हैं, जो कि आज सचमुच ही बहुत फिक्र के लायक है।
बाप-बेटों के बीच एक बहस छिड़वाकर देश की हकीकत को नहीं छुपाया जा सकता। इसलिए अब केन्द्र सरकार को दीर्घकालीन असर वाली योजनाओं को, नीतियों को, मनमाने नारों की तरह नहीं उछालना चाहिए, अब तक जो हो चुका है, देश उससे ही नहीं उबर पा रहा है। केन्द्र सरकार का कार्यकाल आधे से अधिक गुजर चुका है, और बाकी वक्त में उसे ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिसे वह अपने कार्यकाल के दौरान पूरा न कर सके।

सरकार के पास मजबूत आधार, जनता की निजता पूरी निराधार, साइबर-मुजरिमों की चांदी

संपादकीय
27 सितंबर 2017


भारत में सरकार जिस तेजी से आधार कार्ड को अनिवार्य करते जा रही है, उसे देखकर यह हैरानी भी होती है कि क्या सचमुच ही देश के सुप्रीम कोर्ट में आधार की अनिवार्यता को चुनौती देने वाली याचिकाएं चल रही हैं, या फिर उनका निपटारा हो चुका है और सरकार को सारे हक दे दिए गए हैं? आज की ताजा खबर है कि आधार को हवाई सफर के लिए भी अनिवार्य किया जा रहा है, और हर किसी के मोबाइल फोन पर लगभग रोजाना ही ये संदेश आ रहे हैं कि आधार से जोड़े बिना किस तारीख से मोबाइल फोन काम करना बंद कर देंगे। अब जब पूरे देश को डिजिटल तकनीक से जोड़ा जा रहा है, और ऐसा कोई दिन नहीं है कि बैंक खातों और एटीएम की जालसाजी न हो, तब देश की साइबर-सुरक्षा को तौलने की जरूरत है। और देश की साइबर-सुरक्षा से हमारा मतलब सरकार के कम्प्यूटरों की साइबर-सुरक्षा नहीं, आम जनता के बैंक और दूसरे सरकारी कामकाज की सुरक्षा से है। आज तो विकीलीक्स के संस्थापक का यह संदेह डरावना लगता है कि अमरीकी खुफिया एजेंसी की पहुंच भारत के आधार कार्ड से जुड़ी सारी जानकारियों तक है जिसमें लोगों के बायोमेट्रिक्स भी हैं, उनकी उंगलियों के निशान भी हैं। एक किस्म से यह डर भी लगता है कि आधार कार्ड से एक तरफ तो लोगों की निजता पूरी तरह खत्म हो चुकी है, और दूसरी तरफ लोगों के बैंक और सरकारी रिकॉर्ड खतरे में आ गए हैं। एक तरफ आधार कार्ड, और दूसरी तरफ लगभग अनिवार्य हो चुके बैंक खातों को लेकर लोगों की कमसमझी की वजह से साइबर-जालसाज तरह-तरह से लोगों को लूट रहे हैं। ऐसे में लोगों की जानकारी मुजरिमों के हाथ एक बड़ा हथियार बन गई है।
कुछ समय पहले देश में एक बहुत बड़ी साइबर-ठगी पकड़ाई, और एक मामूली से आदमी ने बताया जाता है कि लोगों से 37 सौ करोड़ रूपए ठग लिए। उसने लोगों को यह झांसा देकर कुछ-कुछ हजार रूपए जमा कराए कि उन्हें घर बैठे ऑनलाईन सोशल मीडिया पोस्ट लाईक करने के लिए पांच-पांच रूपए मिलेंगे, और लाखों लोग उसके झांसे में आ गए। अब सरकारी टीवी दूरदर्शन पर चर्चा में देश के सबसे बड़े साइबर-कानून जानकार यह कहते दिखते हैं कि अभी यह कानून बड़ा कच्चा है, और इस किस्म के जुर्म की रोकथाम के लिए, इसे पकडऩे के लिए, और इसे सजा दिलाने के लिए इस कानून में पुख्ता इंतजाम नहीं है। मतलब यह कि साइबर और डिजिटल जुर्म तो खरगोश की रफ्तार से छलांग लगाकर आगे बढ़ रहे हैं, और ऐसे जुर्म रोकने के लिए सरकारी कानून और इंतजाम कछुए की रफ्तार से चल रहे हैं। इन दोनों का मेल शायद ही कभी हो पाएगा, और इस बीच ठगी, जालसाजी, धोखाधड़ी, और बैंक खातों में सेंधमारी करके मुजरिम उन गरीबों और को लूटते चले जाएंगे जिनके हाथों से सरकार नगदी छीनकर उन्हें डिजिटल भुगतान की ओर धकेल रही है।
भारत के लिए यह एक भयानक नौबत है जिसमें आर्थिक अपराधी बढ़ते चल रहे हैं, साइबर अपराधी बढ़ते चल रहे हैं, बैंक खातों के घुसपैठिये दुनिया में कहीं भी बैठे हुए किसी भी जगह के खातों को लूट रहे हैं, और भारत अभी तक न तो हिफाजत के इंतजाम कर पाया है, न ही वह साइबर-कानून बना पाया है जो कि ऐसे जुर्म की सजा दिला सके। वैसे भी यह बात समझ से परे है कि जो भारत अपनी सरहद से कुछ सौ किलोमीटर दूर पाकिस्तान में बैठे हुए मुम्बई बमकांड के आरोपी दाऊद इब्राहिम तक इन दशकों में नहीं पहुंच पाया है, वह दुनिया के अदृश्य साइबर-मुजरिमों तक क्या पहुंच पाएगा। सरकार की डिजिटल-हड़बड़ी और देश की डिजिटल-सुरक्षा-तैयारी के बीच किसी तरह का तालमेल नहीं दिख रहा है। जब बहुत कम पढ़े-लिखे लोगों के हाथ फोन पर बैंक खाते थमा दिए जा रहे हैं, भुगतान की ताकत थमा दी जा रही है, तो झारखंड के एक गांव में बैठे हजारों लोग केवल पूरे देश में साइबर-ठगी के काम में लगे हुए हैं, और उसे कोई रोक नहीं पा रहे हैं।
लेकिन अभी ठगी का जो मामला सामने आया है, वह नेटवर्क मार्केटिंग जैसी बहुत पुरानी एक अंतरराष्ट्रीय धोखाधड़ी की परंपरा की ताजा मिसाल है, और अगर केन्द्र या राज्य सरकारों की कोई निगरानी मशीनरी होती, तो वह कब का इस धोखाधड़ी को पकड़ चुकी होती। दरअसल भारत में जुर्म हो जाने के बाद उसे पकडऩे और सजा दिलवाने पर ही सारी ताकत लगाई जाती है, जबकि ऐसे जुर्म से इक_ा मोटी रकम कई खातों से होते हुए खत्म हो चुकी रहती है, और सरकार के हाथ अधिक से अधिक यही रह जाता है कि किसी मुजरिम को सजा दिलवाई जाए, जिससे कि डूबी हुई रकम तो लोगों को वापिस मिलती नहीं। आज भारत में ऐसे आर्थिक अपराधों पर नजर रखने के लिए एक बहुत ही मजबूत साइबर-सुरक्षा ढांचे की जरूरत है, और साइबर से परे भी खुले बाजार में पूंजी निवेश, या रकम दुगुना करके देने की योजना पर नजर रखने की जरूरत है। जब तक ऐसा नहीं होगा, ठगे हुए लोग ठगे से खड़े रह जाएंगे, और ठगों का खजाना सरकारी पहुंच से परे किसी और देश पहुंच चुका रहेगा। आज हम जगह-जगह ऐसे पूंजीनिवेशकों की भीड़ देख रहे हैं, जिन्होंने जिंदगी भर की छोटी-मोटी कमाई और बचत को दुगुना होने की उम्मीद में कहीं लगा दिया था, और ऐसी कंपनियां रातों-रात गायब हो गई हैं। सरकारों को जुर्म होने के पहले की बहुत बारीक खुफिया-निगरानी बढ़ानी होगी, उसके बिना अपराधियों के पीछे भागते रहना एक फिजूल की कोशिश ही रहेगी। साइबर-मुजरिमों की बाकी कोशिशों के साथ-साथ अब आधार कार्ड से एक बड़ा खतरा देश की पूरी जनता पर ही आ गया है, और सरकार बिना इससे बचाव की तैयारी के इसे अधिक से अधिक अनिवार्य करते चल रही है।

बीएचयू में नवरात्रि के दौरान जिंदा देवियों से ऐसा बर्ताव!

संपादकीय
26 सितंबर 2017


बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में दो दिन पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बनारस प्रवास के मौके पर भाजपा सरकार द्वारा नियुक्त कुलपति के लिए गए फैसले, और राज्य की भाजपा सरकार की पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई से एक बार फिर पूरे देश में लड़कियों की हालत और भाजपा की सत्ता के उनके प्रति रूख की कड़ी आलोचना की नौबत आ गई है। और यह पूरी शुरूआत किसी मोदी विरोध से नहीं हुई थी, और न ही भाजपा का विरोध इसके पीछे था, यह पूरा सिलसिला कुलपति और राज्य सरकार की कमअक्ली का नतीजा दिख रहा है। इसलिए बड़े बुजुर्ग यह कहते हैं कि बेवकूफों को आसपास रखना बेवकूफी के अलावा कुछ नहीं होता है। समारोहों से भरे हुए मोदी-प्रवास के बीच में यह अप्रिय विवाद पूरी तरह से टाला जा सकता था, लेकिन हम बार-बार यह देखते आ रहे हैं कि भाजपा से जुड़ी सरकारें ऐसी बहुत सी गलतियां लगातार कर रही हैं, और बड़े-बड़े तबकों को नाराज कर रही हैं। यह न तो एक जिम्मेदार सत्ता का रूख है, और न ही यह चुनावी समझदारी कही जा सकती।
फिर आग में घी डालने का काम बनारस हिन्दू विवि के कुलपति ने किया जो कि एक छात्रा पर विवि परिसर में हुए सेक्स-हमले को महज छेडख़ानी करार देते हुए उसकी गंभीरता को खत्म करने की कोशिश की। इसके साथ-साथ इस विवि में छात्रों और छात्राओं के बीच कई दूसरे मुद्दों पर भी लैंगिक -भेदभाव चलते आ रहा है, और इसका भी विरोध वहां हो रहा था, जिस पर कुलपति ने एक बहुत ही दकियानूसी रूख दिखाया है और ऐसे आदमी को किसी शैक्षणिक संस्थान में कुलपति के जिम्मेदार पद पर रहने का कोई हक भी नहीं दिखता है। यह भी याद रखने की जरूरत है कि भारत के इसी उत्तरी भाग में बड़े जोर-शोर से देवी दुर्गा की पूजा चल रही है, और इस नवरात्रि के बीच जिंदा देवियों पर किए जा रहे सेक्स-हमले को अगर कुलपति इतने हल्के से लेते हैं, तो राष्ट्रीय महिला आयोग को भी इस पर उन्हें नोटिस जारी करना चाहिए। दिक्कत यह रहती है कि देश और प्रदेश के सारे संवैधानिक आयोग राजनीतिक आधार पर भरे जाते हैं, और वहां की कुर्सियों पर बैठे लोग अपने को मनोनीत करने वाली सरकार के लिए कोई असुविधा खड़ी नहीं करते हैं।
बनारस हिन्दू विवि की यह ताजा घटना प्रधानमंत्री मोदी के लिए इसलिए भी एक असुविधा खड़ी कर रही है कि लोग इसे उनके पसंदीदा नारे बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ से जोड़कर भी उन पर तंज कस रहे हैं। यह वक्त केंद्र सरकार, भाजपा, और भाजपा की सरकारों के लिए यह सोचने का है कि उससे जुड़े हुए लोग, उसके मनोनीत लोग कैसा बर्ताव कर रहे हैं, क्योंकि जनता के बड़े-बड़े तबकों को गैरजरूरी मोर्चो पर इस तरह से नाराज करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए बहुत बड़े नुकसान की बात है और इससे महिलाओं के प्रति इस पार्टी, उससे जुड़े लोगों का नजरिया भी, तमाम नारों को पार करते हुए स्थापित हो रहा है। प्रदर्शन करती हुई छात्राओं पर पुलिस की कार्रवाई को हम बड़ा मुद्दा इसलिए नहीं मानते हैं कि देश में सब जगह पर प्रदर्शनों पर कार्रवाई होती ही है। कुलपति का नजरिया पुलिस कार्रवाई के मुकाबले अधिक हिंसक और घातक है।
http://dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=2790&path_article=18&article_title=दैनिक%20%27छत्तीसगढ़%27%20का%20संपादकीय,%2026%20सितंबर

इंटरनेट नाम के स्टेडियम के बीच खड़े कर दिए गए शब्द का हाल

25 सितंबर 2017

कुछ जाने-माने और स्थापित लेखक इस बात को लेकर परेशान हैं कि फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से लिखने का भला हो रहा है या बुरा? बहुत से लोग किताबों में छपने लायक या पत्र-पत्रिकाओं में जगह पाने वाले लेखन से अधिक सोशल मीडिया पर लिख देते हैं, और कुछ लोग तो छपने से परे अपने ब्लॉग बनाकर उस पर पोस्ट करते चलते हैं। छपना, खासकर किताबों या मासिक पत्रिकाओं में छपना ऐसे लोगों के लिए कुछ हद तक कम मायने रखने लगा है क्योंकि कब वह छपे, कौन उसे देखे, और उस पर लोगों की प्रतिक्रिया मिले या न मिले। दूसरी तरफ इंटरनेट पर ब्लॉग या सोशल मीडिया पर लिखे हुए असर बिजली की रफ्तार से होता है, और लोगों की प्रतिक्रिया तुरंत ही मिलना शुरू हो जाती है।
अब लोगों की प्रतिक्रियाओं से लिखने वालों के सोचने और लिखने पर कैसा असर पड़ता है, यह सोचने और समझने की एक बड़ी जटिल बात है। यह तो नहीं माना जा सकता कोई भी कल्पनाशील रचनाकार, जो कि शायद कम या अधिक हद तक संवेदनशील भी होते होंगे, वे लोगों की प्रतिक्रियाओं से बिल्कुल अछूते रहकर लिखना जारी रखते होंगे। फिर एक-दो दशक पहले तक का पेशेवर अंदाज में लिखना साहित्य के लेखकों को एक सीमित दायरे में रखता था, और उनके पाठक आमतौर पर उनके परिचित या कि उनकी कलम के परिचित रहते थे, और उनकी प्रतिक्रियाएं भी आमतौर पर अपेक्षित अंदाज में ही रहती थीं। ऐसे में लेखक बड़े सुरक्षित रहते थे क्योंकि लोग जिन्हें नापसंद करें उनकी किताबें पढऩे में वक्त क्यों बर्बाद करें, इसलिए बहुत कड़वी आलोचना कम होती थी। लेकिन अब हाल यह है कि आपके लिखे को कोई बिल्कुल ही अनजान देखकर उस पर कुछ लिख सकते हैं बिना आपका पिछला इतिहास जाने हुए, बिना आपकी साख की दहशत में आए हुए।
तो क्या यह नौबत अब लेखकों को पहले के मुकाबले अधिक जवाबदेह बना रही है, और उन्हें आलोचना के लिए और अधिक खुला पेश कर दे रही है? क्या इससे लेखक प्रतिक्रियाओं से प्रभावित लेखन की तरफ बढ़ रहे हैं? क्या इससे उन्हें कुछ लिखने के बाद भी अधिक सोचने की एक नई अंतर्दृष्टि मिल रही है? क्या अपने भौतिक दायरे के बाहर के अजनबी लोगों की प्रतिक्रियाएं उसके लिए एक अधिक सेहतमंद माहौल है?
कुदरत के रीति-रिवाज देखें, तो यह साफ दिखता है कि जिस तरह एक संकुचित रक्त समूह के भीतर ही आगे बढऩे वाली पीढिय़ों में एक जेनेटिक विकृति आते चलती है, उसी तरह से लोगों की सोच भी एक तंग दायरे की इकतरफा सोच में सांस लेते हुए द्वंद्व, अंतद्र्वद्व, और विचारों के लेन-देन की कमी से दम घुट जाने का शिकार होती है। एक ही तबका, एक ही राजनीतिक विचारधारा, एक ही भाषा,एक ही प्रदेश, और सबसे बुरी नौबत रहती है कि लेखकों के किसी एक ही संगठन की कैद में लिखने-पढऩे वाले लोग जिस वैचारिक विविधता से वंचित रह जाते हैं, उससे उनका अभी एक-दो दशक पहले तक का लिखना बुरा असर झेलता था। अब इंटरनेट और सोशल मीडिया पर वे अपने दायरे को बढ़ाते हैं, उसमें वैचारिक विविधता को जगह देते हैं, तो वे जेनेटिक विकृतियों से बचते भी हैं।
विचारों और तर्कों की संकर-फसल (क्रॉस फर्टिलाइजेशन) लिखने वालों को एक बेहतर नजरिया भी देती है, और प्रतिक्रियाओं से लोगों की वैचारिक चूक भी पकड़ में आने की एक गुंजाइश बनती है। लेकिन एक काल्पनिक और रचनात्मक साहित्य का लेखक न होने की वजह से यह मेरी समझ से कुछ परे है कि क्या इससे लोगों के लेखन का नफा होता है, या नुकसान? इतना जरूर है कि लोग इंटरनेट के मिजाज की आजादी का फायदा पाते हुए एक अधिक लोकतांत्रिक तरीके से अधिक किस्म के लोगों के अधिक संपर्क में आते हैं, और लेखक से पाठक तक की इकतरफा ढलान की राह दोनों तरफ के ट्रैफिक की सड़क बन जाती है, और लोग प्रतिक्रियाओं पर प्रतिक्रियाएं देकर इस सिलसिले को आगे भी बढ़ा सकते हैं।
इंटरनेट या सोशल मीडिया पर अपने लिखे हुए को डालने से लोग उसे आलोचकों के एक इतने बड़े दायरे के बीच खड़ा कर देते हैं कि मानो एक बड़े स्टेडियम के बीचों-बीच उन शब्दों को बिना कपड़ों के खड़ा कर दिया गया हो। इसके पहले तक होता यह था कि लोग अपनी सहूलियत के याराना दायरे के भीतर अपने लेखन को सुरक्षित हाथों में छोड़कर बेफिक्र रहते थे, और उनसे किसी किस्म की बेरहम निष्पक्षता का खतरा नहीं रहता था। अब वह मुमकिन नहीं रहा। अब किसी लेखक के लिए सोशल मीडिया की प्रतिक्रियाओं से बचना मुमकिन नहीं रहा, फिर चाहे वे खुद होकर सोशल मीडिया पर सक्रिय न हो। कोई और भी उनके लिखे हुए लेकर एक बहस छेड़ सकते हैं, जिस पर सैकड़ों लोग शामिल हो सकते हैं, कुछ लोग एक भीड़ की मानसिकता की तरह उस लिखे हुए पर ओछा हमला कर सकते हैं, कुछ दूसरे लोग ऐसे हमलों को रोक सकते हैं।
मेरा अपना तजुर्बा यह है कि मेरा अखबारी लिखना जैसे-जैसे एक और बड़े दायरे के बीच जाता है, हर लफ्ज को लेकर मेरे भीतर जवाबदेही बढऩे की एक बेबसी आते चलती है क्योंकि बहुत से नए लोग जो उसे देखते हैं, वे मेरे इतिहास के आतंक की दहशत में नहीं रहते, मुझसे अनजान रहते हैं, और लिखा हुआ एक वाक्य भी वे आगे-पीछे की कही गई और बातों से परे कसौटी पर कसा जाता है। यह एक बिल्कुल ही नया पैमाना रहता है जिसमें नए लोग पहली बार आपको पढ़ते हुए उसका मूल्यांकन करते हैं, उस पर प्रतिक्रिया देते हैं, उसे आंकते हैं, और उसे आगे बढ़ाकर उसे किसी दूसरे स्टेडियम के बीच ले जाकर फिर खड़ा कर देते हैं।
इसलिए साहित्य लेखन पर इंटरनेट-मौजूदगी का अच्छा या बुरा जैसा भी असर पड़ता हो, अखबारी लेखन की जिम्मेदारी और जवाबदेही तो इस नए माध्यम की वजह से बढ़ते चल रही है। दूसरी बात यह भी कि हमेशा चलने वाली चोरी अब उतनी बच भी नहीं पाती, और बड़े-बड़े लोग चोर साबित होते चलते हैं। अभी दो ही दिन पहले बड़बोले टीवी प्रस्तुतकर्ता अर्नब गोस्वामी के कहे हुए को उनके बहुत से पुराने साथियों ने झूठ साबित कर दिया है, और बिना इंटरनेट यह चोरी पकड़ में नहीं आई होती। साहित्य में भी चोरी कम नहीं होती हैं और वह भी लगातार अब सोशल मीडिया, ब्लॉग, और इंटरनेट की वजह से पकड़ में आती चल रही हैं।

दुष्टता से भरे टीवी सीरियलों से उबरने की बड़ी जरूरत...

संपादकीय
25 सितंबर 2017


पूरी तरह से भारतीय कहानी पर बनी हुई एक फिल्म, दंगल ने चीनी दर्शकों का दिल जिस तरह से जीता, और जितना बड़ा कारोबार किया, वह एक रिकॉर्ड रहा। दूसरी तरफ बाहुबलि ने भी देश के बाहर बड़ा कारोबार किया, और अब रजनीकांत की एक फिल्म इसी रास्ते पर जा रही है, और लोगों को उम्मीद है कि यह भी देश में अरबों रूपये लेकर आएगी। अभी अंदाज यह है कि रजनीकांत और अक्षय कुमार के अभिनय वाली फिल्म, 2.0, चीन में दस से पन्द्रह हजार सिनेमाघरों में एक साथ रिलीज होगी। यह संख्या कम नहीं है, क्योंकि भारत में किसी एक भी चीनी फिल्म को देखना शायद ही किसी को याद पड़ता हो। इससे देश में एक बहुत बड़ी विदेशी कमाई भी आ रही है, और भारत के बहुत से फिल्म निर्माताओं के लिए यह रास्ता भी खुला है कि वे भी फिल्म बनाकर भारत के साथ-साथ दुनिया के दूसरे देशों में कारोबार कर सकते हैं।
लेकिन भारत के अधिकतर टीवी सीरियल देखें, तो वे देश के बाहर कहीं कमाई करते नहीं दिखते हैं, और न ही दुनिया के दूसरे देशों में उनकी अधिक चर्चा होती। भारत के किसी टीवी सीरियल के किसी विदेशी भाषा में अनुवाद होकर, डब होकर प्रसारित होने की खबर भी नहीं आती। दूसरी तरफ भारत के अनगिनत टीवी चैनलों पर अमरीका के दर्जनों सीरियल छाए रहते हैं, जो कि पूरी तरह से अमरीकी दर्शकों को ध्यान में रखकर, अमरीकी कहानी पर ही बनते हैं, वहीं की भाषा में बनते हैं, लेकिन हिन्दुस्तान में अंग्रेजी जानने वाले लोगों के बीच उनके दर्शक बहुत बड़ी संख्या में हैं, और भारतीय टीवी चैनल उन सीरियल का मोटा भुगतान करके खुद विज्ञापनों की बड़ी कमाई भी करते हैं। इसके साथ-साथ ऐसे सीरियलों वाले भारतीय चैनल के लिए भारत के सेटेलाइट सर्विस का भुगतान भी दर्शक करते हैं। एक ही तरह के मनोरंजन उद्योग का देश के बाहर अलग-अलग कारोबार, उनका फर्क देखने लायक है।
भारत के टीवी सीरियलों में एक बड़ा हिस्सा एकता कपूर जैसे सीरियल-निर्माताओं का बनाया हुआ रहता है जो कि परिवार के बीच की साजिशों के नाटक का रहता है, और जिनकी वजह से हिन्दी टीवी की दर्शक महिलाओं की समझ बदनाम होती है। दूसरी बात यह भी रहती है कि परिवार के बीच तनाव और साजिश की ऐसी कहानियां देश की महिलाओं की सोच को प्रभावित करती हैं, परिवारों के बीच शक बढ़ाती हैं, और तनाव भी बढ़ाती हैं। ऐसे में कारोबार के नजरिए से, और मनोरंजन के नजरिए से भी भारतीय टीवी उद्योग को अमरीकी टीवी उद्योग से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। यहां का जितना बड़ा हिस्सा पारिवारिक साजिशों को समर्पित है, उससे देश के बाहर भारतीय टीवी कार्यक्रमों के दर्शक सीमित होते जाते हैं, क्योंकि दुनिया के लोग जिनमें बाहर बसे हुए भारतवंशी भी हैं, वे पारिवारिक तनावों से ऊपर उठ चुके हैं। ऊपर तो देश के भीतर का भारतीय समाज भी उठ चुका है, लेकिन भारतीय दर्शकों को लगातार ऐसी घटिया कहानियों में उलझाकर टीवी निर्माता देश के भीतर कमाई कर पा रहे हैं।
इस मुद्दे पर लिखने की जरूरत इसलिए है कि आबादी के एक बड़े हिस्से के लिए, तकरीबन पूरी आबादी के लिए नियमित और सस्ता मनोरंजन टीवी पर ही मिलता है। और ऐसा भी नहीं कि टीवी पर कुछ साफ-सुथरे कार्यक्रम कभी चल ही नहीं पाए, लेकिन जितनी अधिक दुष्टता है, जितनी अधिक साजिश है, उतनी ही अधिक टीआरपी मिलने से टीवी कार्यक्रम निर्माता लगातार उसी कामयाब फार्मूले पर आगे बढ़ते चलते हैं, और देश के लोगों को एक बीमार मानसिकता वाला मनोरंजन मिलते चलता है। अब कहने को यह बाजार व्यवस्था के तहत डिमांड और सप्लाई की बात है, और इसे लेकर कोई एकता कपूर जैसे लोगों को देश को बीमार करने से रोक भी नहीं सकते, लेकिन इस बारे में परिवार के भीतर भी लोगों को चर्चा करनी चाहिए, समाज में भी चर्चा होनी चाहिए कि किस तरह दुष्टता की कहानियों से उबरा जाए। ऐसा करना देश के लोगों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। 

संयुक्त राष्ट्र में सुषमा स्वराज ने देश के दो पाखंड धराशायी किए

संपादकीय
24 सितंबर 2017


भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने दो दिन पहले संयुक्त राष्ट्र में दिए अपने भाषण में जिन तर्कों के साथ पाकिस्तान पर हमला किया, उन तर्कों को सुषमा के, मोदी सरकार के विरोधियों ने भी सराहा है। अभी पिछले कुछ बरस से भारत में ऐसा माहौल बनाया गया है कि आजादी के बाद से अब तक की बाकी तमाम सरकारों ने कुछ भी नहीं किया, और जो कुछ अच्छा इस देश में हुआ है, वह पिछले तीन बरस की मोदी सरकार ने ही किया है।  ऐसे में जब सुषमा स्वराज ने संयुक्त राष्ट्र के मंच से एक औपचारिक भाषण में कहा कि भारत की आजादी के इन सत्तर बरसों में वहां बहुत सी पार्टियों की सरकारें रहीं, क्योंकि हम एक निरंतर चलता हुआ लोकतंत्र हैं। हर सरकार ने भारत के विकास में अपना योगदान दिया। हम लगातार, बिना रूके हुए, आगे बढ़ते गए और आईआईएम, आईआईटी, एम्स जैसी संस्थाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य और अंतरिक्ष के क्षेत्रों में, मानव कल्याण के लिए बनाया। हमने विज्ञान और तकनीक के ऐसे संस्थान खड़े किए जिन पर दुनिया को गर्व है।
अब जब सुषमा संयुक्त राष्ट्र में भारत के लोकतांत्रिक इतिहास के योगदान को गिनाकर पाकिस्तान पर यह हमला कर रही थीं कि एक ही साथ आजाद हुए इन दो पड़ोसी देशों में से भारत में जब यह सब कुछ किया, तो पाकिस्तान में आतंकी संगठन खड़े किए। उनकी यह बात तर्कसंगत और जायज बात रही, और इसने भारत में एक स्थायी और टिकाऊ लोकतंत्र की निरंतरता को स्थापित किया, और पाकिस्तान में एक कमजोर लोकतंत्र, और कट्टरपंथी, आतंकी ताकतों के राज को। लेकिन जिस वक्त वे अपना भाषण तैयार कर रही होंगी, उसी वक्त पहली बार केन्द्रीय मंत्रिमंडल में राज्यमंत्री बनकर आए मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री सत्यपाल सिंह के उस बयान से वैज्ञानिक सोच वाले लोग हैरान हो गए हैं जिसमें उन्होंने इंजीनियरिंग के छात्रों को भारत के प्राचीन वैज्ञानिक खोजों के बारे में सिखाने की जरूरत बताई है। उनका कहना था कि विमान का पहली बार जिक्र प्राचीन हिंदू ग्रंथ रामायण में मिलता है। राइट ब्रदर्स से आठ साल पहले ही एक भारतीय शिवाकार बाबूजी तलपड़े ने हवाई जहाज का आविष्कार कर डाला था।
साल 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुंबई में डॉक्टरों और मेडिकल कर्मचारियों की एक सभा में कहा था कि भगवान गणेश की कहानी दिखाती है कि तब प्लास्टिक सर्जरी संभव थी। मोदी ने कहा था कि हम गणेश जी की पूजा करते हैं। कोई तो प्लास्टिक सर्जन होगा उस जमाने में, जिसने मनुष्य के शरीर पर हाथी का सिर रख के प्लास्टिक सर्जरी शुरू की होगी। उन्होंने यह भी कहा कि महाभारत का कहना है कि कर्ण मां की गोद से पैदा नहीं हुआ था। इसका मतलब ये हुआ कि उस समय जेनेटिक साइंस मौजूद थी। तभी तो मां की गोद के बिना उसका जन्म हुआ होगा।
इसी साल जनवरी में राजस्थान के शिक्षा और पंचायती राज मंत्री वासुदेव देवनानी लोगों को गाय के वैज्ञानिक महत्व को समझा रहे थे। इस दौरान उन्होंने ये कहकर लोगों को चौंका दिया कि गाय एकमात्र जीव है जो केवल ऑक्सीजन लेती और छोड़ती है। उन्होंने इसके लिए कोई तथ्य पेश नहीं किया जबकि हाल में नासा ने भी अपनी रिपोर्टों में स्पष्ट किया है कि गायों के डकार में बड़ी मात्रा में हानिकारक मीथेन गैस निकलती है।
ऊपर के ये तमाम बयान खबरों से ज्यों के त्यों लिए गए हैं, इसलिए कि उनके जिक्र के बिना सुषमा स्वराज के भाषण के महत्व को समझाया नहीं जा सकता था। देश के भीतर एक राष्ट्रवादी लहर पैदा करने के लिए कैसी भी अवैज्ञानिक बातें की जा सकती हैं, लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय मंच पर ठोस उपलब्धियां गिनाने की जरूरत पड़ती है, तो फिर आईआईटी और इसरो ही काम आते हैं। आज दिक्कत यह हो गई है कि सब कुछ समझते-बूझते हुए भी भारत के बहुत से नेता देश में अंधविश्वास और पाखंड को इसलिए बढ़ावा दे रहे हैं कि जनता के एक खासे बड़े नासमझ या कमसमझ तबके को एक आक्रामक राष्ट्रवाद से जोड़ा जा सके। और यह योजना जस्टिस मार्कंण्डेय काटजू के इस गणित पर आधारित है कि भारत की नब्बे फीसदी आबादी मूर्ख है। हम इस हिसाब-किताब की सच्चाई के कागजात नहीं देख पाए हैं, लेकिन अवैज्ञानिक और पाखंडी बातों को बढ़ावा इस भरोसे के साथ ही दिया जा सकता है कि जनता का एक बड़ा हिस्सा इतनी समझ नहीं रखता कि वह अवैज्ञानिक बातों को वैज्ञानिक मानने से इंकार कर सके। जनता साक्षर हो सकती है, पढ़ी-लिखी हो सकती है, लेकिन अनिवार्य रूप से वह समझदार भी हो, यह जरूरी नहीं है। और ऐसे ही अंदाज के साथ जनता को पुराण और इतिहास की ऐसी नामौजूद बातों में फंसाकर रखा जाता है जिससे एक राजनीतिक विचारधारा को बढ़ावा मिल सके।
सुषमा स्वराज ने इस देश के दो बड़े झूठों को चाहे-अनचाहे संयुक्त राष्ट्र के भाषण में खारिज कर दिया है। पहला तो यह कि सत्तर बरस में पहले की किसी सरकार ने कुछ नहीं किया। और दूसरा यह कि भारत में अवैज्ञानिक बातों का बड़ा महत्व है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के लुभावने राष्ट्रवादी झूठों का इस्तेमाल उन्होंने नहीं किया क्योंकि वहां बैठे हुए लोगों की समझ के बारे में जस्टिस काटजू का गणित बिल्कुल उल्टा ही होगा। वहां के बाजार में पाखंड बिकना मुश्किल है, और उससे कोई इज्जत नहीं मिलती, इसलिए सुषमा स्वराज देश की सचमुच की इज्जत की बातों को गिनाकर वाहवाही पा गईं। भारत के आईआईटी, आईआईएम, और एम्स, पुराण की बुनियाद पर खड़ी हुई इमारतें नहीं हैं, वे ठोस ज्ञान-विज्ञान पर बने हुए प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्थान हैं। इस बात को, और आजादी के बाद की सभी सरकारों के कुछ न कुछ योगदान को देश के भीतर भी याद रखना चाहिए। इतिहास को छांट-छांटकर याद रखना, छांट-छांटकर भूल जाना, चुनावी सभाओं के बाद खत्म कर देना चाहिए।

टेक्नॉलॉजी की मेहरबानी और कहर से चौकन्ना रहना जरूरी

संपादकीय
23 सितंबर 2017


टेक्नॉलॉजी की मेहरबानी से, या कि यों कहें कि उसके कहर से इन दिनों झूठ कहना खासा महंगा पडऩे लगा है। और यह बात केवल झूठ तक लागू नहीं होती है, जो लोग अपनी सोच को, अपने शब्दों को रेगिस्तान में जगह बदलते रेत के टीलों की तरह बदलते हैं, वे भी कैमरों की रिकॉर्डिंग में फंस जाते हैं, पुरानी कतरनों के घेरे में आ जाते हैं, और लोग आनन-फानन उनके झूठ को कीलों की तरह इस्तेमाल करके उनकी इज्जत को चौराहे के खंभे पर ठोंक देते हैं। इन दो बातों से परे बहुत से लोग अपनी कही गैरजिम्मेदार बात, या कि किसी गलत हरकत की रिकॉर्डिंग से भी फंस जाते हैं, और कई लोग उससे उबर भी नहीं पाते, जेल भी चले जाते हैं।
इस पर लिखने की जरूरत एक ताजा वाकये से आन पड़ी है। टीवी के हिन्दुस्तान के सबसे बड़बोले, सबसे हमलावर, घोर जंगखोर, और स्वघोषित राष्ट्रवादी अर्नब गोस्वामी का कुछ बरस पहले का एक वीडियो सामने आया है जिसमें वे यह कहते सुनाई पड़ रहे हैं कि किस तरह गुजरात दंगों के बीच अहमदाबाद शहर में उनकी कार पर हमला हुआ था, और किस तरह वे लोग बाल-बाल बचे थे। इस वीडियो को लेकर उनके एक पेशेवर प्रतिद्वंदी और एक दूसरे टीवी चैनल के पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने इसे सफेद झूठ करार दिया, और कहा कि अर्नब गोस्वामी गुजरात दंगों की रिपोर्टिंग कर ही नहीं रहे थे। हम अभी इन दोनों के बीच के सच और झूठ पर नहीं जा रहे, लेकिन इतना जरूर सोच रहे हैं कि अब वक्त झूठ कहने का या लिखने का नहीं रह गया है। एक छोटी सी ट्वीट भी लोगों को कानून के घेरे में फंसा सकती है, हालांकि आज गैरजिम्मेदार और जुर्म सरीखी हर सोशल मीडिया पोस्ट के लिए लोग दूसरों को जिम्मेदार ठहरा देते हैं, या अपने कर्मचारियों पर तोहमत जड़ देते हैं, लेकिन यह सिलसिला भी तकनीकी-कानूनी जांच के आगे टिक नहीं सकता, और फंस सकता है। ऐसे में पहले के मुकाबले आज अधिक जरूरी है कि सच कहा जाए, चाहे फिर इसके लिए कम ही क्यों न कहा जाए, और अपना चाल-चलन ठीक रखा जाए। आज बुरे खयालों के साथ लोग तभी तक महफूज रह सकते हैं जब तक वह बात उनकी जुबान पर न आए, या कि उनका दिमाग उनके हाथों को किसी दूसरे के बदन तक पहुंचा न दे। ऐसा होने पर लोगों का बचना अब खासा मुश्किल हो चुका है।
एक वक्त था जब सच पर टिके रहने की वजह से राजा हरिश्चंद्र की एक मिसाल बनी थी, और आज भी उस मिसाल की कोई काट नहीं बन पाई है। लेकिन हरिश्चंद्र से लेकर वीडियो रिकॉर्डिंग के बीच का वक्त गुजर चुका है। अब समय ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग का है, छुपे हुए कैमरों और माइक्रोफोन का है, और डिजिटल पदचिन्ह छोडऩे वाले सोशल मीडिया का है। ऐसे में लोगों को बहुत सावधान रहने की जरूरत है। अभी राहुल गांधी ने अमरीका के दौरे के बीच कहीं पर गांधी को एनआरआई कह दिया तो उसे लेकर भारत में उनके विरोधी उन पर चढ़ बैठे। कुछ घंटे ही गुजरे होंगे कि लोगों ने दो बरस पहले की वह कतरन ढूंढ निकाली जिसकी खबर में अमरीका के न्यूयार्क के मैडिसन स्क्वेयर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रवासी भारतीयों के बीच कहा था कि गांधी उन्हीं की तरह एक एनआरआई थे। लोग आज सोशल मीडिया को उन वीडियो क्लिपिंग्स से पाट चुके हैं जिनमें नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए लगातार मनमोहन-सरकार के खिलाफ महंगे पेट्रोल को लेकर हल्ला बोला था, पाकिस्तान को लेकर हल्ला बोला था, आधार कार्ड और जीएसटी के खिलाफ तेजाबी बातें बोली थीं, मनरेगा को अपने चुनाव प्रचार में देश को तबाह करने वाली योजना बताया था। और अब इन तमाम वीडियो के खिलाफ उन्होंने मनमोहन सरकार की इन तमाम बातों के मुताबिक फैसले लिए हैं, और पेट्रोल को तो इतना महंगा कर दिया है कि खुदकुशी के लिए किसी को लोन लेना पड़े।
आज गांव-देहात तक के लोग फोन पर बातचीत को रिकॉर्ड करने लगे हैं, किसी भी सार्वजनिक जगह पर लोग अपनी आंखें चाहे बंद रखें, फोन पर रिकॉर्डिंग जरूर शुरू रख लेते हैं, और हैकरों के बिना भी अब लोग दूसरों के ईमेल, फोन, और सोशल मीडिया खातों में घुसपैठ करना सीख चुके हैं। हम हर कुछ महीनों में इसी जगह पर यह नसीहत लिखते हैं कि अब कोई फोन, कोई फोटो, कोई संदेश, कोई ईमेल, कुछ भी सुरक्षित नहीं है, निजी नहीं है, इसलिए लोग अपनी सोच और अपने चाल-चलन को ठीक रखें, इसके बिना वे कभी भी भारी सामाजिक शर्मिंदगी या बड़ी कानूनी दिक्कत में फंस सकते हैं। यह भी याद रखने की जरूरत है कि दुनिया के इतिहास के सबसे बड़े आतंकी हमलावर, अमरीका के न्यूयॉर्क की इमारतों पर विमानों से हमला करने वाला ओसामा-बिन-लादेन बरसों तक इसलिए अमरीकी खोज से बचे रह पाया था कि उसने फोन या इंटरनेट किसी का इस्तेमाल नहीं किया था। हम न तो यह कहते कि हर कोई लादेन जैसे मुजरिम हैं, और न ही यह कहते कि फोन-नेट का इस्तेमाल न किया जाए। लेकिन जो कहा जाए, और जो किया जाए, यह मानते हुए ही उसे करें कि आप डिजिटल सुबूत छोड़ रहे हैं। राहुल गांधी पर हमला हुआ, और कुछ घंटों में नरेन्द्र मोदी की कतरन सामने आकर हमलावरों का मुंह सिल गई। 

फलाहारी-बलात्कारी ने तो खान-पान के मौजूदा कानून का मखौल उड़ाकर रख दिया!

संपादकीय
22 सितंबर 2017


छत्तीसगढ़ में कानून की पढ़ाई कर रही एक छात्रा के साथ फलाहारी बाबा नाम से मशहूर एक हिन्दू भगवाधारी बाबा पर बलात्कार की रिपोर्ट लिखाई गई है, और छत्तीसगढ़ की पुलिस के दर्ज किए मामले पर अब राजस्थान की पुलिस इसे गिरफ्तार करने के लिए इसके आश्रम और अस्पताल में डेरा डाले हुए है। जैसा कि इसके नाम से जाहिर है, यह फलाहार करने वाला बाबा दिखता है, और इस देश में खान-पान की वर्तमान में कानूनी और गैरकानूनी तरीकों से लागू की गई संस्कृति के पैमानों पर यह सबसे अच्छा इंसान बनाने वाला आहार होना चाहिए। लेकिन हैरानी की बात यह है कि ईश्वर का नाम, भगवा कपड़ों का काम, और फलाहार मिलकर भी इस बाबा को बलात्कार से नहीं रोक पाए। कुछ ऐसा ही सफेद कपड़ों वाले आसाराम के साथ हुआ, जिसके साथ भगवान के अलावा बाकी सभी किस्म की सात्विक चीजें भी जुड़ी हुई थीं, और जिस पर किसी ने गोमांस तो दूर, अंडा-मछली भी खाने की तोहमत कभी नहीं लगाई। भगवा और सफेद कपड़ों से परे, दुनिया में मुमकिन हर रंग के चितकबरे और अविश्वसनीय दर्जे के बेहूदे कपड़ों को पहनने वाले बाबा राम रहीम का भी यही हुआ, और ईश्वर का नाम, सात्विक खान-पान, इसमें से किसी ने भी उसे बलात्कार से नहीं रोका।
अब सवाल यह उठता है कि जो लोग खान-पान से इंसान की सोच और उसके संस्कार ढलने की बात करते हैं, ऐसे लोगों के सामने कत्ल के मामलों में फंसे शंकराचार्य से लेकर, बेडरूम वीडियो के हीरो स्वामी नित्यानंद तक बहुत सी मिसाले हैं। ईसाई पादरी तो बच्चों से बलात्कार के जिन मामलों में पकड़ाते हैं, उनके पीछे तो उनका मांसाहार हो सकता है, लेकिन भारत के शाकाहारी बाबा-स्वामी अगर बलात्कार करते हैं, तो फिर शाकाहार या फलाहार के संस्कार कहां गए? आज देश में खान-पान के जो कानून लागू हैं, और उनसे भी ऊपर जो गुंडई चल रही है, उनके मुताबिक तो गौभक्षक सबसे बुरे मुजरिम होने चाहिए थे, लेकिन यहां तो फल और मेवा पर पल रहे धार्मिक अपराधी खान-पान से उन्हें मिले संस्कारों को बदनाम करते हुए बलात्कार कर रहे हैं।
यहीं पर विज्ञान, तर्क, और न्यायप्रियता की अहमियत सामने आती है। विज्ञान खान-पान से ऐसे किसी जुर्म को जोड़कर नहीं चलता, और न ही तर्क ऐसा कुछ रिश्ता सुझाता है। न्यायप्रियता यह कहती है कि जिसे जो खाना हो, उसे उसकी आजादी रहनी चाहिए। लेकिन इनको भूलकर जब लोग अपनी धार्मिक या धर्मान्ध मान्यताओं को दूसरों पर हिंसा के साथ थोपने पर आमादा हो जाते हैं, तो वे इस बात के लिए भी जवाबदेह हो जाते हैं कि फलाहारी बाबा ने महज फल खाते हुए बलात्कार कैसे किया? यह वह देश है जिसमें बड़े-बड़े धार्मिक और राजनीतिक नेता सार्वजनिक रूप से तर्क देते हैं कि नूडल्स खाने से लोग बलात्कारी हो जाते हैं। नूडल्स यानी सेंवई, अब चूंकि सेंवई लंबी होती है, तो मानो इससे लोगों की बलात्कार की इच्छा भी लंबी होने लगे। धर्मान्धता से उपजे इस वैज्ञानिक सिद्धांत के कुछ ही समय के भीतर इसी धर्मान्धता की एक दूसरी उपज रामदेव ने रातों-रात आयुर्वेद की दुकान से नूडल्स भी बेचना शुरू कर दिया, मानो वह आयुर्वेद के ग्रंथों में दर्ज सामान है। अब चूंकि उसी धर्मान्ध सोच वाला रामदेव नूडल्स बेच रहा है, तो अब उससे बलात्कार की प्रेरणा मिलना बंद हो गया है।
लेकिन आसाराम से लेकर राम रहीम तक, और अब इस फलाहारी तक यह सिलसिला चलने से एक बात तो अच्छी हो गई है कि बाबाओं का पाखंड जनता के सामने अच्छी तरह उजागर होते चल रहा है, और सारे के सारे अंधविश्वासी एकमुश्त अक्ल न भी पा सकें, उनमें से कुछ हिस्सा तो चौकन्ना होगा, और अपने परिवार के लोगों को बलात्कार से बचाने के बारे में सोचेगा। आज देश की अदालतों को यह भी सोचने की जरूरत है कि जो मां-बाप अपने नाबालिग बच्चों को ऐसे बाबाओं की सेवा करने के लिए भेज देते हैं, क्या वे भी सजा के हकदार नहीं हैं?
फलाहारी-बलात्कारी यह शब्द तुकबंदी सा लगता है, और जितने लोग मांसाहार का विरोध करते हैं उनको इस मामले की कतरनें भेजनी चाहिए, खासकर उन लोगों को जो कि गाय के नाम पर इंसानों की हत्या को जायज ठहराते हैं।

देवी प्रतिमाओं की पूजा वाले देश में जिंदा देवियां बदहाल

संपादकीय
21 सितंबर 2017


भारत के एक बड़े हिस्से में बड़ी आस्था से मनाया जा रहा त्योहार नवरात्रि आज से शुरू हुआ है, और इन नौ दिनों में देश भर के देवी-मंदिरों में तो पूजा-अर्चना होगी ही, जगह-जगह सार्वजनिक पंडाल लगाकर देवी प्रतिमाएं भी स्थापित की जाएंगी। अलग-अलग प्रदेशों में रीति-रिवाज अलग हो सकते हैं, लेकिन यह शक्ति की प्रतीक महिला की पूजा सभी जगहों पर है। अब सवाल यह उठता है कि हर बरस साल में दो बार नौ-नौ दिनों तक देवी की उपासना, पूजा-अर्चना करने वाले हिन्दुओं के जीवन में जिंदा देवियों की क्या जगह है?
आज ही दो खबरें उत्तरप्रदेश की है कि किस तरह एक हिन्दू लड़की को भाजपा की एक नेता पीट रही है कि वह किसी दूसरे धर्म के लड़के से प्यार करती है। वहीं पर भाजपा के सांसद साक्षी महराज यह कह रहे हैं कि मोटरसाइकिलों पर लड़के-लड़कियों के चिपककर साथ बैठने की वजह से बलात्कार की घटनाएं बढ़ती हैं। तीसरी खबर है कि राजस्थान के अलवर में एक हिन्दू बाबा, फलाहारी महाराज को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस उसके आश्रम और अस्पताल में तैनात है, उस पर छत्तीसगढ़ की एक कानून की छात्रा ने बलात्कार की रिपोर्ट लिखाई है। पंजाब-हरियाणा से एक खबर और है कि वहां एक स्कूल के शौचालय में किस तरह एक छोटी बच्ची के साथ बलात्कार किया गया है। इससे परे देश भर में जगह-जगह शायद हर घंटे किसी न किसी लड़की या महिला से बलात्कार की रिपोर्ट सामने आती है, और हमारा अंदाज यह है कि ऐसे दर्जनों बलात्कार मेें से कोई एक मामला ही पुलिस तक पहुंच पाता है।
यह देश लड़कियों और महिलाओं के मामले में इस कदर अमानवीय हो गया है कि दुनिया भर में इसे लेकर यहां आने वाले पर्यटकों के बीच दहशत भी रहती है, और खुद देश के भीतर बच्चियों के मां-बाप चैन से सो नहीं पाते हैं कि वे किस भरोसे से बच्चियों को स्कूल भेजें, किस भरोसे से उन्हें खेलकूद के मुकाबलों में दूसरे शहर भेजें, या कि पढऩे के लिए बाहर भेजें। इस देश में बलात्कार किसी बुरे सपने से भी अधिक बुरी ऊंचाईयों पर पहुंच चुका है, और ऐसा लगता है कि यह इस देश के लोगों का एक राष्ट्रीय शगल हो गया है। सरकारों में, अदालतों में पहुंचने वाली शिकायतों का हाल यह है कि बरसों तक किसी को सजा नहीं हो पाती है, और अभी इस बरस देश की सबसे चर्चित बलात्कार की खबर वाले बाबा राम रहीम को उसके किए बलात्कारों के पन्द्रह बरस बाद सजा हो पाई। और भारत की अदालती व्यवस्था के मुताबिक निचली अदालत से हुई इस सजा के खिलाफ अभी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक बाबा के जाने की संभावना या आशंका बची हुई ही है।
छत्तीसगढ़ में हर कुछ महीनों में ऐसी खबर सामने आती है कि किस तांत्रिक ने या किस बाबा ने किसी लड़की या महिला से भूत उतारने के नाम पर, या कि कोई और झांसा देकर उसके साथ बलात्कार किया। ऐसे बहुत से मामले धर्म से जुड़े होते हैं, और आस्थावान लोगों के होते हैं। ऐसे लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि देवी पर इस देश के धर्मालु लोगों की आस्था उन्हें जिंदा देवियों के साथ कोई जुर्म करने से जरा भी नहीं रोक पाती है। लोगों को अपनी आस्था को अंधविश्वास में नहीं बदलने देना चाहिए क्योंकि धर्म किसी को बेहतर इंसान नहीं बना पाता, बल्कि धर्म लोगों को एक प्रायश्चित करके पापमुक्ति का मौका देता है जिससे कि धर्मालु लोगों की छाती पर से उनके अपराध का बोझ हट जाता है। इसलिए लोगों को सावधान रहना चाहिए कि यह देश प्रतिमाओं की देवियों की पूजा तो अच्छे से करता है, लेकिन जिंदा देवियों के लिए इसके मन में अधिक सम्मान नहीं है। इसलिए लोगों को बहुत सावधान रहने की जरूरत है, और खासकर जितने किस्म के बाबा, धर्मगुरू, तांत्रिक हैं, उनसे खास तौर पर सावधान रहना चाहिए क्योंकि वे अंधविश्वास बढ़ाकर, झांसा देकर लोगों को हर तरह से लूटने की अतिरिक्त ताकत रखते हैं।

देश के बाहर राहुल की कही बातों को गलत कैसे कहा जाए...

संपादकीय
20 सितंबर 2017


कांग्रेस उपाध्यक्ष और भावी अध्यक्ष राहुल गांधी पर यह तोहमत लग रही है कि वे अमरीकी विश्वविद्यालयों में मंच और माईक से भारत के घरेलू मुद्दों के बारे में बोल रहे हैं, और देश को बदनाम कर रहे हैं। लेकिन ऐसा कहने वालों की याददाश्त कुछ कमजोर है और वे यह भूल रहे हैं कि प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने जब पहली बार अमरीका जैसे देशों का वीजा पाया, तो वहां के बहुत बड़े-बड़े सभागृहों में प्रवासी भारतीयों के बीच उन्होंने भारत की पिछले साठ-सत्तर बरस की सभी सरकारों के कामकाज को खारिज कर दिया था, जिसमें छह बरस की अटल सरकार का काम भी शामिल था, और उस जनता पार्टी सरकार का काम भी शामिल था जिसमें जनसंघ एक सबसे बड़ा घटक दल था, और जिसमें अटल-अडवानी जैसे दिग्गज जनसंघी मंत्री थे। आजादी के बाद से भारत सरकार के सारे कामकाज को मोदी ने इतनी बार खारिज किया, इतने देशों में जाकर खारिज किया कि इस बारे में उसी वक्त उनकी भारत में बड़ी आलोचना भी हुई थी। आज तो राहुल गांधी किसी सरकारी कुर्सी पर नहीं हैं, और उनका कहा हुआ तो महज विपक्ष के एक नेता का कहा हुआ है, और वे मोदी सरकार के पिछले तीन बरस के काजकाज को लेकर ही बोल रहे हैं, देश में आजादी के बाद से आई कई कांगे्रस-विरोधी केंद्र सरकारों को खारिज नहीं कर रहे हैं।
इसलिए हम राहुल को आज किसी तोहमत का हकदार नहीं पाते क्योंकि किसी विदेश का लोकतंत्र परंपराओं को न तो रातोंरात बनाता है, और न ही रातोंरात पाता है। भारतीय लोकतंत्र की परंपराएं लंबे समय में जाकर बनी थीं, और उनको पिछले तीन बरस में बड़ी रफ्तार से तबाह किया गया है। राहुल गांधी ने भारत में असहिष्णुता बढऩे जैसे कुछ मामलों को उठाया है, जो कि कोई भांडाफोड़ नहीं है, देश के अलावा दुनिया में जगह-जगह अमनपसंद लोग लगातार इस मुद्दे को उठाते रहे हैं, और लोकतंत्र में इसे सरकार विरोधी या देश विरोधी काम मानना गलत है। यह मुद्दा देश की अदालतों में भी बार-बार उठ रहा है और सुप्रीम कोर्ट के अलावा बहुत से हाईकोर्ट देश के हाल पर फिक्र जाहिर कर चुके हैं। गायों को लेकर केंद्र सरकार ने जैसे कानून बनाए और जिस तरह भाजपा के राज वाले कई राज्यों में गाय के नाम पर गुंडागर्दी करने वाले लोगों ने अभूतपूर्व हिंसा की, उसे लेकर सुप्रीम कोर्ट को अभी पूरे देश में हर जिले में अफसरों पर जिम्मेदारी तय करने का हुक्म देना पड़ा।
हमारा ख्याल है कि लोकतंत्र में अच्छी परंपराओं को स्थापित करना चाहिए जिनमें यह भी शामिल होना चाहिए कि अपने से पहले की सरकारों के कामकाज को उस तरह खारिज न किया जाए जिस तरह आज केंद्र सरकार के बहुत से लोग कर रहे हैं। भारत अपने बहुत से लोकतांत्रिक मूल्यों को खो रहा है, और पिछले आम चुनाव में मतदाताओं के बहुमत से मिले समर्थन को ऐसा करने की एक मंजूरी मानकर चल रहा है। जबकि चुनाव में मिली हुई जीत लोकतंत्र को खत्म करने के लिए, देश से सद्भाव को खत्म करने के लिए मंजूरी नहीं होती है। राहुल गांधी को देश के बाहर देश के मुद्दे न उठाने की सलाह देने का हक उन्हीं को हो सकता है जिन्होंने देश के बाहर देश की पिछली सरकारों के खिलाफ कुछ न कहा हो।

म्यांमार के शरणार्थियों के लिए दरवाजे बंद करके भारत इतिहास में जगह खो रहा है...

संपादकीय
19 सितंबर 2017


सुप्रीम कोर्ट में केन्द्र सरकार ने कहा है कि म्यांमार से आ रहे रोहिंग्या शरणार्थी देश की सुरक्षा के लिए खतरा हैं, और सरकार उन्हें बाहर निकालने जा रही है। सरकार ने अदालत से यह भी अनुरोध किया है कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है, और अदालत इसमें दखल न दे। आज पूरी दुनिया के सामने रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों की जो हालत है, उसे लेकर सबके दिल दहले हुए हैं। म्यांमार में सत्तारूढ़, नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित, आंग-सान-सू-ची की सरकार जिस तरह इन मुस्लिमों के खिलाफ फौज और बौद्ध समुदाय की हिंसा को बढ़ावा दे रही है, उसे पूरी दुनिया शर्मनाक मान रही है, यह एक अलग बात है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अभी म्यांमार हो आए, लेकिन उन्होंने वहां के इस अमानवीय पहलू पर सू-ची से मुलाकात में चर्चा भी नहीं की। अब सरकार का अदालत में हलफनामा और भी निराश करता है क्योंकि अभी पिछले बरसों में लगातार योरप के दर्जन भर देशों ने, और कनाडा ने जिस तरह सीरिया और इराक, लीबिया और दूसरे युद्धग्रस्त देशों से आ रहे शरणार्थियों के लिए अपने दरवाजे खोले हैं, उससे दुनिया मेें सभ्य लोकतंत्र की परिपक्वता स्थापित होती है। ये शरणार्थी तो ऐसे देशों से पहुंचे थे, पहुंच रहे हैं, जहां पर आईएसआईएस और अलकायदा जैसे खतरनाक आतंकी संगठन राज कर रहे हैं, और इनके आतंकी घुसपैठिये शरणार्थियों के बीच योरप के देशों में पहुंचने का एक बहुत बड़ा खतरा है। दूसरी तरफ भारत से म्यांमार की सरहद लगी हुई है, और वहां बड़े पैमाने पर चल रहे सरकारी और बौद्ध हिंसा के कत्लेआम से बचकर जो मुस्लिम आ रहे हैं, उनके लिए दरवाजे बंद करना एक अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी से कतराना है।
भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को कहा है कि इन शरणार्थियों में पाकिस्तान के आतंकी संगठनों के एजेंट भी शामिल हैं, इसलिए देश की सुरक्षा के लिए इनको रोकना भी जरूरी है और आ चुके शरणाथियों को निकालना भी जरूरी है। हमारा मानना है कि अंतरराष्ट्रीय कानून और समझौतों के तहत भी भारत को उदारता दिखानी चाहिए, और पड़ोसी होने के नाते यह इंसानियत भी दिखानी चाहिए कि बड़े पैमाने पर मारे जा रहे लोगों को अपने देश में जगह दे, और फिर चाहे तो इन्हें एक अलग हिफाजत और निगरानी में रखे। पाक आतंकी संगठनों के भारत में एजेंट इन्हीं शरणार्थियों के बीच नहीं घुसेंगे, वे तो कश्मीर और दूसरे इलाकों में वैसे भी लगातार काम करते हैं, और उनकी की हुई आतंकी घटनाएं सामने आती रहती हैं।
भारत का शरणार्थियों के मामले में बहुत लंबा और गौरवशाली इतिहास रहा है। चीन के तिब्बत इलाके के शरणार्थियों और उनके मुखिया दलाई लामा को भारत ने पूरा सम्मान देकर केन्द्र सरकार के खर्च पर जगह दी, और देश में कई जगहों पर तिब्बती शरणार्थियों को रखा गया, जिनमें छत्तीसगढ़ भी शामिल है। इसके बाद म्यांमार के शरणार्थी भी बरसों से भारत मेें रहते आ रहे हैं जो कि रोहिंग्या मुस्लिम नहीं थे, और बौद्ध धर्म के भी थे। फिर 1971 की याद सबको है जब पाकिस्तान की सरकार पूर्वी पाकिस्तान के इलाके में जुल्म ढा रही थी, और वहां से लाखों शरणार्थी भारत में आ रहे थे, तब भारत ने न सिर्फ उन्हें जगह दी, उन्हें बसाया, बल्कि एक फौजी दखल देकर पूर्वी पाकिस्तान के इलाके में पाकिस्तानी फौज को टक्कर दी, उसका आत्मसमर्पण करवाया, और बांग्लादेश बनवाया। भारत में दूसरे और कई देशों के शरणार्थियों को जगह दी गई जिनमें फिलीस्तीन से आने वाले छात्र-छात्राओं को कॉलेजों में दाखिला भी दिलवाया गया।
आज भारत की सरकार अगर महज एक कारोबारी की तरह नफा-नुकसान देखते हुए, हिसाब करके इंसानियत को भूल जाएगी, तो यह बात भी इतिहास में दर्ज होते चल रही है। भारत को एक बड़े देश की जिम्मेदारी निभाते हुए, और अपने गौरवशाली इतिहास का ध्यान रखते हुए म्यांमार के शरणार्थियों को जगह देनी चाहिए। ऐसा न करके भारत इतिहास में अपनी जगह खोने जा रहा है। 

सूक्तियों से मिले साहस से ही चल सकती है सच की लड़ाई

18 सितंबर 2017

बहुत से अखबारनवीसों से लेकर अखबारों में हर हफ्ते कॉलम लिखने वालों तक और सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति या विचार के लिए अभियान चलाने वालों तक, कलम के सिपाहियों से लेकर कलम के भाड़े के हत्यारों तक, इनका हौसला थकता ही नहीं है। वे पूरे वक्त अपने मकसद के लिए, या कि अपने रोजगार के लिए जुटे रहते हैं, और ऐसा करते हुए वे सच और झूठ का फर्क करने में अपना वक्त बर्बाद नहीं करते। जब हिटलर के सूचना मंत्री से लेकर अब तक यह माना जाता है कि एक झूठ को अगर काफी बार दुहरा दिया जाए, तो वह सच में तब्दील होने लगता है, या कम से कम सच का एहसास तो कराने लगता है। नतीजा यह है कि लोग सोचे-समझे, मकसदभरे झूठ को बार-बार दुहरा कर उससे सच बनाने में लगे रहते हैं। लोग झूठ को पकड़ भी लेते हैं, तो भी उन्हें शर्म नहीं लगती, क्योंकि वे शर्मिंदगी के हकदार अकेले नहीं रहते, और उनकी तरह और बहुत से लोग इसी काम में लगे रहते हैं।

लेकिन सच के बारे में यह कहा जाता है कि उसे अपने अस्तित्व को साबित करने में देर लगती है, खासी देर लगती है, बड़ी मेहनत भी लगती है, लेकिन फिर भी वह साबित तो हो ही जाता है, और आखिर में वह खड़ा रहता है। सवाल यह है कि यह खासी देर कितनी लंबी होती है, और इस बीच में झूठ की फसल जंगल की घास की तरह कितनी फैल चुकी रहती है, और आम लोग उस घास में कितने उलझते चलते हैं, उसके आरपार सच को देखने में उन्हें कितना वक्त लग जाता है, ये तमाम बातें परेशान करती हैं।
फिर दूसरी बात यह भी कि झूठ का कारोबार करने वालों के पास झूठों की फौज की एक वर्दी भी होती है, और टोली की ताकत भी। ऐसी गिरोहबंदी के मुकाबले सच बोलने वाले अक्सर किसी हमलावर मकसद के बिना होते हैं, उन्हें किसी वर्दी की ताकत भी नहीं होती, और न ही किसी गिरोह से उन्हें हिफाजत मिली होती है। नतीजा यह होता है कि सच का झंडा लेकर चलने वाले अक्सर अकेले दिखते हैं, और बहुतों को यह भी लगता है कि उनमें कोई दिमागी नुक्स है कि वे चैन से बैठने के बजाय यूं बेचैन फिरते हैं। आमतौर पर सच के लिए लडऩे वाले ऐसे लोग दुनिया में अकेले पडऩे लगते हैं, और बहुत से मामलों में सच की तकलीफ का बोझ उठाते परिवार के भीतर भी वे अकेले होने लगते हैं।
जिस तरह विज्ञान कथाओं की कुछ फिल्मों में मशीनी मानव दिखाए जाते हैं कि किस तरह वे गिनती में बढ़ते चलते हैं, और फौज सरीखे होकर इंसानों पर टूट पड़ते हैं, कुछ उसी तरह झूठ के भाड़े के हत्यारे फायदा पाते हुए इन दिनों सोशल मीडिया पर हमलावर बने हुए हैं, और पैसों की ताकत से उनकी गिनती बढ़ती चल रही है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने मिलकर विचारों के मुकाबले को ऐसा बना रखा है कि स्टेडियम में बैठे, मुकाबला देखते लोगों की गिनती फरेब की तरह बढ़ाकर दिखाई जा सकती है, और जनमत के आकार को अंधाधुंध बड़ा या छोटा साबित किया जा सकता है। यह कुछ उसी तरह का है जिस तरह कि कसरत की कुछ मशीनों, या शरीर को किसी आकार में ढाल देने का दावा करने वाले खाने-पीने के सामानों के इश्तहार होते हैं, जो कि हकीकत से परे हसरत की तस्वीरें दिखाते हैं, और ग्राहक जुटाते हैं।
सच और झूठ पर भरोसा रखने वाले लोगों की अलग-अलग गिनती भी मुमकिन नहीं होती, क्योंकि झूठ का झंडा लेकर चलने वाले बहुत से लोगों को भी इस बात का एहसास होता है कि असल में सच क्या है। वे झंडे के झूठ पर सचमुच ही खुद भरोसा नहीं करते, लेकिन एक पेशे की तरह, या कि एक नफरतजीवी मकसद के चलते वे उस झूठ को सच करार देते हुए एक अभियान चलाते हैं। ऐसे लोगों को झूठ पर भरोसा रखने वाला नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वे झंडा तो झूठ का लिए चलते हैं, लेकिन अपने मन के भीतर उन्हें हकीकत का सच भी मालूम होता है। इसलिए सोशल मीडिया पर जो दिखता है, या कि आज के मीडिया के टीवी स्क्रीन पर, अखबारी पन्नों पर जो दिखता है, जरूरी नहीं है कि लिखने और लिखाने वाले लोगों का खुद का उस पर भरोसा हो। यह बात सही है कि मीडिया के एक बड़े तबके के लिए प्रॉस्टीट्यूट जैसी गाली जोड़कर, प्रेस को प्रेस्टीट्यूट करार देने का काम मोदी सरकार के एक बड़बोले फौजी बददिमागी मंत्री जनरल वी.के. सिंह ने किया था, लेकिन आज मीडिया और सोशल मीडिया की जो हालत है, उसमें यह शब्द बहुत नाजायज नहीं है, यह एक अलग बात हो सकती है कि कौन सा तबका इस शब्द का ज्यादा बड़ा हकदार है। यह तमगा उन लोगों पर बेहतर सजता है जो रोज झूठ का गुब्बारा फुलाने के कारोबार में लगे हुए हैं।
अभी मुझे इस बात का ठीक-ठीक अंदाज नहीं है कि मीडिया और सोशल मीडिया पर सच और झूठ को देख और सुनकर पाठकों और दर्शकों का कितना हिस्सा झूठ-सच का फर्क कर पाता है, और कितना झांसे में आ जाता है। यह अंदाज इसलिए आसान नहीं है कि विचारधारा को समर्पित, नफरतजीवी, किसी नामौजूद दुश्मन के खिलाफ लडऩे को आमादा लोग जब किसी झूठ को सच मानते हुए दिखते हैं, तो यह समझ नहीं पड़ता कि वे झूठ को सचमुच सच मान रहे हैं, या कि वे उसे सच मानते हुए दिखना भर चाहते हैं। यह पूरा सिलसिला कुछ जटिल है, और कुछ उलझा हुआ है, बदनीयत से लदा हुआ है, और अनुपातहीन अधिक ताकत से लैस भी है। इसलिए किसी संक्रामक रोग की तरह, किसी कम्प्यूटर वायरस की तरह, गणेश के दूध पीने की अफवाह की तरह, झूठ पर जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे, सच की तरह, सच मानकर भरोसा करने वाले लोगों के बीच फर्क कर पाना नामुमकिन सा है।
लेकिन इंसानी सोच में जो एक आम बात है, उसके मुताबिक नफरत लोगों को बड़ी रफ्तार से जोड़ लेती है। मोहब्बत जब तक प्रेम का ढाई आखर लिख पाती है, तब तक नफरत झूठ के पर्चे छापकर शहर के हर चौराहे पर बांट चुकी होती है। सच को सोशल मीडिया की जंग के लिए मानो 80 रूपए लीटर का पेट्रोल मिलता है, और झूठ को अपनी लड़ाई के लिए 31 रूपए लीटर मिल जाता है जो कि दुनिया के बाजार में उसकी कीमत है। यह गैरबराबरी की लड़ाई कई बार सच का हौसला पस्त करती है, और वैसे में सच को लेकर कही गई सूक्तियां काम आती हैं जो हौसले को चार कदम और चलने को कहती हैं। लेकिन सच यह है कि ऐसे चार कदम उस डॉक्टरी दिलासे की तरह रहते हैं जो कि चार हफ्ते बाद कटने वाले प्लास्टर को लेकर मरीज को बस कुछ दिन और का भरोसा दिलाते चलते हैं। गैरबराबरी की यह लड़ाई अंतहीन भी दिखती है, लेकिन दुनिया का इतिहास गवाह है कि कोई लड़ाई कभी अंतहीन नहीं होती।

देश में वीआईपी अदालतों की तुरंत जरूरत है इंसाफ के लिए

संपादकीय
18 सितंबर 2017


जिस तरह हिंदुस्तान की राजनीति में होता है, ठीक उसी तरह पड़ोस के पाकिस्तान में भ्रष्टाचार की वजह से हटाए गए प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पत्नी ने उनकी सीट से उपचुनाव जीतने के बाद कहा। उन्होंने कहा कि जनता की अदालत में सुप्रीम कोर्ट का फैसला खारिज हो गया है, और जनता की नजर में आज भी नवाज शरीफ प्रधानमंत्री है। भारत में अधिकतर नेता भ्रष्टाचार के मामलों में, या दूसरे खूंखार अपराधों में फंसने पर भी यही तर्क देते हैं कि वे अदालती फैसले के खिलाफ जनता की अदालत में जाएंगे। दूसरी तरफ जब जनता की अदालत उन्हें खारिज कर देती है, तो वे कानून या चुनाव आयोग की अदालत में जाने की बात करने लगते हैं। कुल मिलाकर बात यह है कि धरती पर उपलब्ध किसी भी तरह की अदालत से अपनी मनमर्जी का फैसला मिलने तक वे अपनी लड़ाई जारी ही बताते हैं।
हमारा यह मानना है कि जिस तरह पाकिस्तान की अदालत ने भ्रष्टाचार के मामले में प्रधानमंत्री को हटाने की हिम्मत दिखाई है, भारत की अदालतों को भी ताकतवर तबकों के मामलों में हिम्मत दिखाने की जरूरत है। आज तो हालत यह है कि नेताओं की कुछ बरसों में ही आसमान पर पहुंच गई दौलत का हिसाब मांगने पर भी सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग या सरकार नजरें चुरा रहे हैं। लोग इस बात की खुलकर चर्चा भी नहीं करना चाहते कि नेताओं के पास अनुपातहीन दौलत आई कहां से है? ऐसे में न तो भ्रष्टाचार कम होने का कोई आसार है और न ही चुनावों में कालाधन कम हो सकता, सत्ता पर बैठे हुए लोगों के अपराध भी कम नहीं हो सकते।
पहली बार भारतीय सुप्रीम कोर्ट में यह सोच सामने आई है कि नेताओं की अनुपातहीन संपत्ति के मामले 3 या 6 महीने में निपटाए जाएं। हम बरसों से यह मांग कर रहे हैं कि देश में ऐसी वीआईपी अदालतें बनाई जानी चाहिए, जहां पर सांसद- विधायक, या उनके और उनके ऊपर के निर्धारित दर्जों के लोगों के भ्रष्टाचार के मामलों की सुनवाई तेजी से हो। ऐसा न होने पर किसी भी तरह के अपराध के मामले निपट ही नहीं पाते हैं, अगर उनमें किसी ताकतवर नेता या अफसर को सजा का खतरा दिख रहा हो। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, क्योंकि ताकतवर लोग अगर मुजरिम हैं, और वे सत्ता पर भी हैं, तो वे आम नागरिकों के मुकाबले हजारों गुना अधिक बड़े जुर्म करने की ताकत रखते हैं। इसलिए देश में आम और खास का फर्क अगर करना हो, तो अदालती सुनवाई में सबसे पहले करना चाहिए। ऐसी फास्टट्रैक अदालतें तुरंत बनानी चाहिए, जो कि बड़े अफसर, बड़े नेता, बड़े जज और एक सीमा से अधिक सम्पन्नता वाले लोगों के मामलों को सुने। 

चाहे जिसे नफा-नुकसान हो कुनबापरस्ती पर चर्चा हो...

संपादकीय
17 सितंबर 2017


अभी अमरीका के एक बड़़े प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में राहुल गांधी ने अपने भाषण के बीच भारत के वंशवाद को लेकर कुछ बातें कहीं, जो कि उनकी अपनी वंशवादी विरासत की वकालत करने वाली भी थीं, और भारतीय राजनीति से लेकर भारतीय फिल्मों तक अलग-अलग तरह के वंशवाद का जिक्र करने वाली भी थीं। नतीजा यह निकला कि इन दिनों ट्विटर पर मुखर ऋषि कपूर ने तुरंत ही जवाबी हमला किया, और उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने राहुल के बयान का जिक्र किए बिना वंशवाद पर कहा- मैं पहले भी यह बात कहते आया हूं, लेकिन अब यह बात कहने में हिचकिचा रहा हूं क्योंकि अब मैं राजनीति से बाहर हूं। भारतीय लोकतंत्र में डायनेस्टी (वंशवाद) नेस्टी (शरारती, बुरा, अप्रिय, बदमजा) है लेकिन यह कुछ लोगों को टेस्टी (मजेदार) लगता है, और यह हमारे लोकतंत्र की कमजोरी है। उनके इस बयान को लेकर कांग्रेस पार्टी के कुछ नेताओं ने उन पर हमला करना शुरू कर दिया है और उन्हें याद दिलाया है कि उपराष्ट्रपति बनने के बाद उन्हें दलगत राजनीति में इस तरह की अवांछित बातें नहीं करनी चाहिए, वरना दूसरे लोग भी उनके प्रति एक संवैधानिक शिष्टाचार और सम्मान भूल जाएंगे।
वेंकैया नायडू के बयान में ऐसी कोई बुरी बात नहीं है जो कि उपराष्ट्रपति के ओहदे के खिलाफ जाती हो। कुनबापरस्ती की तोहमत अकेली कांग्रेस पार्टी पर नहीं लगती है, यह देश के दर्जनों नेताओं की दर्जन भर से अधिक पार्टियों पर माकूल बैठने वाली तोहमत है, और लोकतंत्र के भीतर इसकी चर्चा करना नाजायज नहीं है। कांग्रेस तो देश की सबसे बड़ी कुनबापरस्त पार्टी होने के नाते वंशवाद की तोहमत सबसे अधिक झेलने की सबसे अधिक हकदार पार्टी है ही, लेकिन वह अकेली नहीं है, और कुनबापरस्ती के मामले में सबसे बुरी भी नहीं है। इसका एक लंबा इतिहास है, जिसे या तो कैलेंडर के मुताबिक देखा जा सकता है, या कि देश के नक्शे के मुताबिक देखा जा सकता है जो कि शायद अधिक आसान होगा। बात कश्मीर से शुरू करें, तो वहां अभी दूसरी पीढ़ी की मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने तीसरी पीढ़ी के मुख्यमंत्री से सत्ता हासिल की है। वहां से जरा नीचे उतरें, तो पंजाब की कुख्यात कुनबापरस्ती है जिसमें प्रदेश के हितों पर लंबे अरसे से काले बादल छाए हुए हैं, और उनके दामाद तक छाए हुए हैं जो कि हर तरह की तोहमतों से घिरा हुआ कुनबा रहा है। इसी पंजाब से जो हरियाणा अलग राज्य बना है, उस हरियाणा में कुनबापरस्ती न सिर्फ कांग्रेस की रही है, बल्कि उसका दूसरा सबसे बड़ा कुनबा, चौधरी देवीलाल, उनकी औलादें अभी जेल में हैं, मुख्यमंत्री रहते हुए किए गए अपने बड़े भयानक भ्रष्टाचार की वजह से, और बाहर लोगों का अंदाज है कि हजारों करोड़ की दौलत मालिक के बरी होकर आने की राह देख रही है। बगल के उत्तराखंड में जाएं तो कांग्रेस की कुनबापरस्ती भाजपा तक फैली हुई दिखती है, इंदिरा के मंत्री रहे हेमवतीनंदन बहुगुणा के बेटा-बेटी कांग्रेस को खून निकलने तक दुहकर अब उसे डुबाकर दोनों ही भाजपा में चले गए हैं।
यहां से कुछ आगे बढ़ें तो बिहार में लालू यादव की भयानक अश्लील कुनबापरस्ती है जिसमें परिवार से बाहर किसी लोकतंत्र की कोई गुंजाइश नहीं है। बगल के उत्तरप्रदेश में मुलायम सिंह का कुनबा इस तरह सत्ता पर काबिज रहा और उसे इस तरह जकड़कर बैठा रहा कि कुनबे के भीतर ही विपक्ष भी खड़ा होने लगा, और कई रगों का एक ही खून बिखरने लगा। लेकिन एक दूसरी कुनबापरस्ती को भी देखने की जरूरत है जो कि उत्तरप्रदेश में सत्ता पर काबिज रह चुकीं मायावती की है। बहुजन समाज पार्टी में अपने नेता कांशीराम की सबसे करीबी रहते हुए मायावती ने एक नए राजनीतिक कुनबे की विरासत पाई, ठीक उसी तरह की जिस तरह कि दूर दक्षिण में एमजीआर से उनकी सबसे करीबी जयललिता ने पाई थी। यहां पर कुनबे का रक्त संबंध धरा रहा, और उससे परे सबसे करीबी को विरासत मिली जिससे कि पार्टी उसी एक कमरे में जारी रही।
पूरब की तरफ आगे बढ़ते हुए पहले अगर मध्यप्रदेश को देखें तो बड़े लंबे समय तक रविशंकर शुक्ल और उनके दो बेटे, अर्जुन सिंह और उनका बेटा, दिग्विजय सिंह और उनके भाई, ऐसे ढेरों परिवार सत्ता पर काबिज रहे। कुछ नीचे ओडिशा में पटनायक परिवार की दूसरी पीढ़ी चल रही है, उधर पश्चिम में जाएं तो महाराष्ट्र में  पवार से लेकर दूसरे अनगिनत कुनबे दूसरी और तीसरी पीढ़ी की राजनीति कर रहे हैं। आन्ध्र में कांग्रेस विरोधी राजनीति करने वाले एन.टी. रामाराव का दामादवाद आज राज कर रहा है, और उसका बेटावाद सत्ता में दाखिल हो चुका है। यह लिस्ट पूरी नहीं बन सकती क्योंकि यहां जगह सीमित है, और नेताजी की अंतिम इच्छा, मेरे बाद मेरा बच्चा, यह हसरत भारतीय लोकतंत्र में असीमित है।
भारतीय जनता पार्टी के भीतर गिनाने के लिए सिंधिया जैसे दो-चार परिवार हो सकते हैं जिनकी दूसरी पीढ़ी राजनीति में है, लेकिन पूरी की पूरी पार्टी कभी भी किसी एक परिवार की गुलाम नहीं रही, और वंशवाद से मोटे तौर पर आजाद रही। इसलिए भाजपा से आए हुए वेंकैया नायडू किसी पार्टी पर हमला न करते हुए भी पूरी ईमानदारी से वंशवाद के खिलाफ सोच सकते हैं, और बोल सकते हैं, उसमें न कुछ नाजायज है, न कुछ अटपटा है, और न ही कुछ कांग्रेस पार्टी के अकेले के खिलाफ है। उपराष्ट्रपति बनने का यह मतलब नहीं है कि भारतीय लोकतंत्र को जो बातें खाए जा रही हैं, उनके बारे में चर्चा न की जाए। ऊपर हमने कुनबापरस्ती की जो लंबी लिस्ट गिनाई है, उसमें से बहुत से लोग वेंकैया नायडू की पिछली पार्टी, भाजपा के सहयोगी दलों की है। अगर किसी बहाने से ही सही, भारत की राजनीति में कुनबापरस्ती के खिलाफ एक चर्चा छिड़ सकती है, जिससे कि एक जनमत तैयार हो, तो उससे चाहे जिसे नफा हो, चाहे जिसे नुकसान हो, वह होना चाहिए। 

धर्म बेजुबान नन्हें बच्चों के हित ऊपर रखे, और संन्यास को नीचे

संपादकीय
16 सितंबर 2017


मध्यप्रदेश के नीमच के एक जैन पति-पत्नी की खबर पिछले दो-तीन दिनों से अखबारों में है कि वे तीन बरस की बेटी और सैकड़ों करोड़ की संपत्ति छोड़कर साधु-साध्वी जीवन अपनाने जा रहे हैं। जैन समाज में कम उम्र में संन्यास ले लेना अनोखी बात नहीं है, और किसी भी दूसरे धर्म के मुकाबले इस धर्म में ऐसी घटनाएं अधिक होती हैं। कुछ मामलों में तो समाज के भीतर, और समाज के बाहर से भी इस बात का विरोध हुआ कि किस तरह नाबालिग बच्चे संन्यास ले लेते हैं। कई बरस पहले नौ बरस की एक बच्ची जब जैन साध्वी बनी, तो लोग उसके खिलाफ अदालत तक गए थे, और इस प्रथा को अमानवीय बताया था।
लेकिन इस ताजा समाचार में एक दूसरी बात सोचने की है क्योंकि ये पति-पत्नी तो बालिग हैं, और उन्होंने सोच-समझकर पिछले कुछ बरसों से लगातार इस सन्यास की तरफ कदम बढ़ाना शुरू कर दिया था। अब सवाल यह उठता है कि तीन बरस की बेटी को उसके नाना के हवाले करके संन्यास लेने से क्या उस बच्ची के कुछ अधिकारों का भी हनन होता है? अभी हमें जितना याद पड़ता है, ऐसा कोई मामला कानून की अदालत में बहस में आया नहीं है जिसमें मां-बाप को कटघरे में खड़ा किया जाए कि वे बच्ची को छोड़कर कैसे जा सकते हैं? दूसरा यह भी है कि संन्यास की इन खबरों की वजह से तो यह सार्वजनिक रूप से घोषित और स्थापित हो गया है कि वे बच्ची को नाना के हवाले कर रहे हैं, वरना दूसरे बहुत से ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें मां-बाप बच्चों को बेच भी देते हैं, या कि उन्हें अनाथाश्रम में छोड़ देते हैं, या कि सड़कों पर ही छोड़कर चले जाते हैं, ट्रेन में बिठाकर चले जाते हैं। बच्चों की बिक्री से परे, बच्चों को छोड़ देने का कोई और तरीका अब तक सामने आया नहीं है जिसमें मां-बाप के खिलाफ कोई जुर्म बना हो। लेकिन बहुत सी बातें जो कि कल तक जुर्म नहीं रहती थीं, वे अब जुर्म के दायरे में आती हैं, और लोगों को याद होगा कि एक समय सतीप्रथा को पूरी तरह से सामाजिक मान्यता प्राप्त थी, लेकिन बाद में उसे जुर्म करार दिया गया।
इस नौजवान शादीशुदा जोड़े के संन्यास को लेकर यह सवाल उठता है कि क्या किसी धर्म या सम्प्रदाय में इतनी कम उम्र के बच्चों को दूसरों के भरोसे छोड़कर औपचारिक और घोषित संन्यास लेने को पंथ की मान्यता होनी चाहिए? मां-बाप में से कोई एक संन्यास ले तो दूसरे के भरोसे बच्चे की जिम्मेदारी हो सकती है, लेकिन दोनों ही एक साथ चले जाएं, तो उससे बच्चे पर, उसके रख-रखाव पर कैसा फर्क पड़ेगा यह सोचने की जरूरत है। हमारा यह मानना है कि धार्मिक रीति-रिवाज भी समय के साथ-साथ बदलते हैं, और देश और दुनिया में बदलती हुई सोच को देखते हुए भी कई धार्मिक प्रथाओं में बदलाव लाया जाता है। मुस्लिमों में हज पर जाने के लिए नियमों की एक लंबी लिस्ट है जिसे पूरा करने पर ही लोग हज जा सकते हैं। इसमें पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करना, परिवार की आर्थिक स्थिति इस तीर्थयात्रा के लायक रहना, और इस तरह की बहुत सी और बातें हैं जो कि पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करने के बाद ही धार्मिक मान्यता को पूरा करने की इजाजत देती हैं। हमारा ख्याल है कि नाबालिग बच्चों के संन्यास लेने पर पूरी रोक रहनी चाहिए, और बच्चों को इतनी कम उम्र में छोड़कर मां-बाप के संन्यासी बनने पर भी रोक रहनी चाहिए। आज किसी भी धर्म का काम किसी एक जोड़े के बिना चल सकता है, लेकिन किसी बच्चे का काम उसके मां-बाप के बिना नहीं चल सकता। इसलिए जब किसी धर्म पर यह जिम्मेदारी रहती है कि वह किन लोगों को संन्यास दिलाए, तो उसे जिम्मेदारी से यह सोचना-विचारना चाहिए कि किन लोगों को किन जिम्मेदारियों के पूरे हो जाने के बाद ही संन्यास की इजाजत दी जाए।
हम इस एक मामले को महज मिसाल के तौर पर लेकर यह चर्चा कर रहे हैं, और हमें इस परिवार के भीतर इस बच्ची के रख-रखाव को लेकर अलग से कोई जानकारी नहीं है। इस बच्ची के दोनों तरफ परिवार हैं, और संपन्न परिवार हैंं, इसलिए यह मामला उसे बेसहारा छोड़ देने जैसा नहीं है, लेकिन मां-बाप के जिंदा रहते मां-बाप के साए से एकदम इस तरह से अलग कर देना हमारे हिसाब से उस बच्ची के बुनियादी अधिकारों को छीनने सरीखा है, और किसी भी धर्म को ऐसा नहीं करना चाहिए। ऐसे लोगों को धर्म यह कह सकता है कि वे अपनी बच्ची के बालिग होने का इंतजार करें, और उसके बाद संन्यास के बारे में सोचें। संन्यासियों की कमी से किसी धर्म का काम ऐसा नहीं रूकता है कि एक जोड़ा पति-पत्नी संन्यासी न बनें तो धर्म का नुकसान हो जाएगा। इसलिए धर्म को सबसे पहले उस छोटी बच्ची के भले के बारे में सोचना चाहिए जो कि न अपनी मर्जी से इस दुनिया में आई है, और न ही मां-बाप को रोकने की उसकी कोई क्षमता है। जैन धर्म बड़ा अहिंसक माना जाता है, और हवा में न दिखने वाले कीटाणुओं तक को तकलीफ न देने की कोशिश करता है। ऐसे धर्म को अपने समुदाय के बेजुबान नन्हें बच्चों के हित को सबसे ऊपर रखना चाहिए, और संन्यास को उसके बहुत नीचे।

ऐसा होने पर गधे गाली खाने से बचेंगे, और बाबा लोग जेल...

संपादकीय
15 सितंबर 2017


अभी देश में यह बहस चल रही है कि कौन बाबा असली है, और कौन नकली। कुछ बाबाओं ने एक बैठक करके कुछ दूसरे बाबाओं को नकली घोषित कर दिया, तो जवाब में मानहानि के नोटिस की चर्चा है। अब एक नाबालिग के साथ बलात्कार के आरोप में बरसों से जेल में बंद, एक वक्त बापू कहलाने वाले, आसाराम से अभी मीडिया ने पूछा कि वे किस श्रेणी के बाबा हैं। तो इसके जवाब में आसाराम ने कहा कि वे गधों की श्रेणी में आते हैं। बरसों से जेल में बंद एक बुजुर्ग का आपा खोना समझ में आता है क्योंकि आराम और इज्जत की लंबी जिंदगी के बाद जब ऐसी जेल नसीब होती है, और आगे का भविष्य अंधकारमय दिखता है, तो कोई भी अपना आपा खो सकते हैं। लेकिन फिर भी गधे से अपनी तुलना करना ठीक नहीं है, क्योंकि दुनिया में किसी भी गधे पर कभी बलात्कार का कोई मुकदमा नहीं चला है, और इंसानों से परे जानवरों की दुनिया में न तो इस तरह के बलात्कार होते हैं, और न ही जानवर अपनी प्रजातियों के नाबालिग बच्चों से ऐसी हरकत करते हैं। फिर भी जानवरों के अधिकारों के लिए लडऩे वाले लोग अब तक महज उनके साथ हिंसा के मामलों को लेकर लड़ते हैं, उन्हें गाली देने वाले लोगों के खिलाफ मुकदमा लडऩे का समय अभी किसी के पास आया नहीं है।
लेकिन आसाराम ने चाहे झल्लाहट में यह बात कही हो, और चाहे अपने को गधा कहने के पीछे उनकी नीयत गधे को एक बेवकूफ जानवर साबित करने की रही हो, हकीकत यही है कि सेक्स के बहुत से अपराधों में जो लोग पकड़ाते हैं, वे गधे तो नहीं रहते, बेवकूफ जरूर रहते हैं। आज हिन्दुस्तान में सेक्स की खरीद-बिक्री गैरकानूनी है, और इस पर सजा हो सकती है। लेकिन दुनिया के दर्जनों ऐसे देश हैं जहां पर इसे कानूनी दर्जा मिला हुआ है, और बैंकाक जैसे भारत के पास के कुछ देश ऐसे भी हैं जहां पर सेक्स-पर्यटन एक बड़ा कारोबार है। ऐसे में भारत के जो अतिसंपन्न लोग हैं, वे अगर अपनी सेक्स-जरूरतों के लिए नाबालिग लड़कियों या अनुयायी महिलाओं पर हमला करते हैं, तो इसके बजाय बेहतर यह होता कि वे दुनिया के दूसरे देशों में चले जाते, और वहां सेक्स खरीदकर अपनी जरूरत पूरी कर लेते। इससे भारत में उनका आडंबर भी बचे रह जाता, भारत की मासूम बच्चियां भी बची रह जातीं, और दुनिया के दूसरे देशों में सेक्स-कर्मियों को एक ग्राहक भी मिल गया होता। हमको इस बात का पक्का भरोसा है कि अगर इन बाबाओं जितनी दौलत किसी गधे के पास होती, और उस गधे की ऐसी सेक्स जरूरतें होतीं, तो वह गधा उन देशों में चले जाता जहां सेक्स खरीदना कानूनी है, और मजे करके लौट आता। लेकिन इंसानों में समझ गधे से कुछ कम ही है, इसलिए सैकड़ों करोड़ की, शायद हजारों करोड़ की दौलत वाले लोग भी बलात्कार के जुर्म में जेल में हैं।
दरअसल होता यह है कि जब किसी बहुत कामयाब और मशहूर, लोकप्रिय या भक्तों से घिरे हुए इंसान को कानून का खतरा समझना बंद हो जाता है, तो फिर वे ऐसी चूक कर बैठते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि देश का कानून उनके ऊपर लागू नहीं होता। ऐसी बददिमाग और बेदिमाग ताकत दुनिया के दूसरे देशों में इस्तेमाल नहीं होती, खासकर जहां पर लोकतंत्र मजबूत है, और अदालतों को खरीदना मुमकिन नहीं है। यही वजह है कि भारत में लोकतंत्र की कमजोरी की वजह से अरबपति-खरबपति लोग भी बलात्कार के मामलों में जेल में हैं। हमारी सलाह तो देश की सरकार और जनता को यह है कि वेश्यावृत्ति को भारत में कानूनी दर्जा देना चाहिए, ताकि ऐसे संभावित बलात्कारियों से बाकी लोगों को बचाव मिल सके। वेश्यावृत्ति को कानूनी बनाने से वेश्याओं को भी बहुत बड़ी सामाजिक और कानूनी सुरक्षा मिलेगी जो कि आज बिल्कुल भी नहीं है। आज पुलिस, दूसरे सरकारी अमले, इलाके के गुंडे, और कई मामलों में स्थानीय नेता, ये सब वेश्याओं से उगाही करते हैं, और अपना बदन बेचकर मिलने वाली उसकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा इन लोगों पर लुट जाता है। इसलिए सेक्स-अपराधों को घटाने के लिए, और सेक्स-कर्मियों को सुरक्षा देने के लिए भारत में वेश्यावृत्ति को कानूनी बनाने की जरूरत है। कहने के लिए हिन्दुस्तान की संस्कृति में भी नगरवधुओं की पुरानी परंपरा है, और सैकड़ों बरस से इसे दुनिया का सबसे पुराना पेशा कहा भी जाता है, लेकिन सरकारों में इतना नैतिक साहस नहीं रहता है कि वे वेश्यावृत्ति को कानूनी बनाने जैसा फैसला ले सकें। ऐसा होने पर गधे गाली खाने से बचेंगे, और बाबा लोग जेल जाने से। 

दानवाकार बुलेट ट्रेन योजना गरीब देश की प्राथमिकता?

संपादकीय
14 सितंबर 2017


मुंबई से अहमदाबाद के बीच चलने के लिए देश की पहली बुलेट ट्रेन का भूमिपूजन आज जापान और भारत के प्रधानमंत्रियों ने मिलकर अहमदाबाद में किया। बुलेट ट्रेन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की शुरुआती घोषणाओं में से एक थी और इसे भारत के बहुत से अर्थशास्त्री और जानकार लोग एक दैत्याकार और बिना जरूरत का अहंकार भी बताते हैं। कई लोगों ने विश्लेषण करके यह बताया है कि मुंबई और अहमदाबाद के बीच अनगिनत उड़ानें हैं, और रेलगाडिय़ां हैं। पांच बरस बाद जब बुलेट ट्रेन एक लाख दस हजार करोड़ की लागत से शुरू होगी, तब उसकी रफ्तार आज की ट्रेन और आज की प्लेन के बीच की होगी, और ऐसा ही उसका भाड़ा होगा, हवाई किराए से थोड़ा कम। लोग इस बात पर हैरान हैं कि इतनी बड़ी लागत केवल समय को कम करने के लिए लगाना क्या ठीक है? लेकिन दूसरी तरफ प्रधानमंत्री सहित कुछ दूसरे समर्थकों का यह कहना है कि बुलेट ट्रेन से इन दो महानगरों के बीच के दस और शहर भी जुड़ेंगे, और इन दर्जन भर शहरों की जिंदगी, उनके रोजगार, और उनके कारोबार पर बहुत बड़ा असर पड़ेगा। मोदी का यह भी कहना है कि जितने कम ब्याज पर, लगभग बिना ब्याज के यह पूरा प्रोजेक्ट जापान से बहुत रियायती किश्तों पर मिल रहा है, और भारत को मानो यह मुफ्त ही मिल रही है। उनका यह भी अंदाज है कि इससे सीधे-सीधे और आर्थिक गतिविधियां बढऩे से दसियों हजार रोजगार बढ़ेंगे, और देश में एक नई टेक्नॉलॉजी भी आ जाएगी।
हमारा ख्याल है कि ऐसे दानवाकार प्रोजेक्ट लोगों की जिंदगी में कोई अभूतपूर्व और नई सहूलियत लाने वाले हों, तो उनका एक महत्व हो सकता है। लेकिन महज समय घटाना अभूतपूर्व नहीं कहा जा सकता। आज देश में निजी विमान कंपनियां आने वाले बरसों में सैकड़ों विमान अपने बेड़े में जोडऩे जा रही हैं। आज भी हवाई सफर का मुकाबला बहुत से लोगों के फायदे का साबित हो रहा है, और विमानतलों पर मध्यम वर्ग के लोगों की भीड़ दिखती है। दूसरी तरफ रेलगाडिय़ों के भाड़े को इस तरह से बढ़ाया गया है कि बहुत सी गाडिय़ों में भाड़ा विमान से भी अधिक पडऩे लगा है, और वे खाली चलने लगी हैं। इसलिए ट्रेन और प्लेन का यह मुकाबला पांच बरस में खुले बाजार के मुकाबले के चलते कहां पहुंचेगा इसका कोई ठिकाना नहीं है। फिर मोदी की यह बात सही नहीं है कि यह ट्रेन भारत को मुफ्त में मिल रही है। यह ट्रेन भारत को कुल एक फीसदी ब्याज पर मिल रही है, इतना ही ठीक है, बाकी तो सच यह है कि जापान अगले पचास बरस तक भारत से इस कर्ज को वसूलता रहेगा, और इस पूरी बुलेट ट्रेन योजना को जापान ही बनाने जा रहा है जिससे वहां की कंपनियों को सीधे कारोबार मिलेगा, वहां के हजारों लोगों को रोजगार मिलेगा, और यह एक कारोबारी-साहूकार की लुभावनी योजना सरीखी है।
अब जब यह साफ है कि भारत अगले पचास बरस तक इस एक लाख दस हजार करोड़ के कर्ज को पटाते रहेगा, तो यह पैसा मोदी के बाकी कार्यकाल के बाद भी सैंतालीस बरस तक पटाया जाता रहेगा। और इतनी बड़ी लागत से देश में और कौन-कौन सी उत्पादक योजनाएं बन सकती थीं जिनसे करोड़ों लोगों को रोजगार मिलता, और हजारों करोड़ का मुनाफा भी हुआ रहता। भाजपा और मोदी सरकार बार-बार यह कहते हैं कि सरकार को कोई भी कारोबार नहीं करना चाहिए, और सारे कारोबार का निजीकरण होना चाहिए, ऐसे में सरकार देश का यह सबसे बड़ा अकेला कारोबार शुरू करने जा रही है जिससे मुंबई-अहमदाबाद के बीच महज कुछ हजार मुसाफिर ही तेज सफर का फायदा रोज पाएंगे, बाकी लोगों के लिए तो इससे धीमी ट्रेन भी बनी रहेगी, और इससे तेज प्लेन भी बने रहेंगे, और इन दोनों की गिनती भी 2022 तक बढ़ती भी रहेगी। यह लागत देश में सिर्फ रफ्तार बढ़ाने के लिए बहुत अधिक लग रही है, और सरकार का इससे रोजगार-कारोबार बढऩे का अंदाज कहीं वैसा ही साबित न हो जैसा कि नोटबंदी से कालेधन के सामने आने और देश की कमाई होने का अंदाज पूरी तरह, और बुरी तरह गलत साबित हुआ। किसी नेता या सरकार की निजी प्रतिष्ठा के लिए तो ऐसी दानवाकार योजना ठीक हो सकती है कि इतिहास में वह उनके नाम से दर्ज होगी, लेकिन देश की आम जनता के लिए इतनी बड़ी रकम की कोई योजना जब तक ठोस फायदे साबित करने वाली न हो, वह देश की प्राथमिकता नहीं हो सकती है। 

डिजिटल तकनीक इस्तेमाल में सावधानी सिखाना जरूरी

संपादकीय
13 सितंबर 2017


एक खबर है जिसकी सच्चाई परखना अभी बाकी है, लेकिन वह खतरनाक है और हिन्दुस्तान के डिजिटल-राह पर बढऩे में एक बड़ा रोड़ा और खतरा साबित हो सकती है। एक किसी छोटे दुकानदार ने पेटीएम से भुगतान लेना शुरू किया, और जब उसने अपने बैंक खाते में रकम डालने की कोशिश की, तो साढ़े 17 लाख रूपए की रकम गायब हो गई। ऐसी चार घटनाएं, और उसकी चार लाख जगहों पर पढ़ी गई खबरों से हो सकता है कि लोग कैशलेस होने का इरादा छोड़ दें। आज भी रात-दिन ये खबरें आती हैं कि किस तरह किसी के एटीएम कार्ड से जालसाजी हो गई, और उसकी जिंदगी भर की जमा पूंजी लुट गई। जब लोगों के बीच साक्षरता और जागरूकता की तैयारी डिजिटल होने की नहीं है, तब आंधी-तूफान की रफ्तार से डिजिटलीकरण के खतरे कम नहीं हैं। और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में ही जहां मुख्यमंत्री ने यह तय किया है कि कुछ महीनों में ही दस लाख लोगों को डिजिटल लेन-देन के हिसाब से तैयार किया जाएगा, तो ऐसी कई तरह की ठगी के बारे में भी सोचना होगा। और लोगों के घर जाकर नोट लूटकर लाना आसान नहीं होता है, लेकिन ऑनलाईन किसी की भी जानकारी को हासिल करना भी आसान है, और उसे लूट लेना भी आसान है।   इस मुद्दे पर हमने पहले भी लिखा है कि केन्द्र सरकार को एक ऐसी योजना लानी चाहिए कि कैशलेस और डिजिटल लेन-देन में जो लोग ठगी या जुर्म के शिकार होते हैं, उनकी भरपाई करने के लिए एक बीमा योजना लाई जाए, उसके बिना यह पूरा सिलसिला जनता के हितों के खिलाफ जाएगा।
आज छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में साइबर जुर्म से निपटने के लिए पुलिस भी तैयार नहीं है, और साइबर अपराध दर्ज तो हो जाते हैं, लेकिन मुजरिमों तक पहुंचकर लूट को वापिस लाने के मामले बहुत कम हैं। इसलिए आज जब सरकार लोगों के डिजिटल-शिक्षण के काम को युद्धस्तर पर शुरू कर रही है, तो पहले से ही लोगों को सावधानी सिखाना जरूरी है, और ऐसा सिखाने वाले लोगों को भी पुलिस या दूसरी जांच एजेंसियों से प्रशिक्षण दिलवाना जरूरी है, ताकि पहले वे खुद समझें, और फिर प्लास्टिक इस्तेमाल करने वाले, फोन से भुगतान करने वाले लोगों को समझा सकें। यह काम आसान नहीं होगा, क्योंकि चारों तरफ फैले हुए छोटे-छोटे दुकानदारों और छोटे-छोटे ग्राहकों को संगठित रूप से सिखाने का मौका भी आसान नहीं होगा। और आज जब बाजार पूरी तरह चौपट है, तो ऐसे में किसी छोटे दुकानदार को प्रशिक्षण के लिए किसी जगह बुलाना भी उसके जख्मों पर नमक छिड़कने की तरह का होगा। इसलिए सरकार को अखबार, टीवी, और सीधे जनसंपर्क से भी लोगों को जुर्म से सावधान रहने का प्रशिक्षण देना पड़ेगा। आज तो जो बुजुर्ग लोग हैं, वे भी अपने बचपन से पहले सिक्के, और फिर नोट देखते और इस्तेमाल करते आए हैं। और इसलिए वे इसमें धोखे से आमतौर पर बचना जानते हैं। लेकिन हम अखबारों में जब साइबर धोखाधड़ी की खबरें पढ़ते हैं, तो दिखता है कि बहुत पढ़े-लिखे और पेशेवर, परिपक्व और कामयाब लोग भी ठगी के शिकार हो रहे हैं। इसलिए आज जब लोगों को मोबाइल बैंकिंग, क्रेडिट और डेबिट कार्ड, फोन से भुगतान जैसे कई चीजों की तरफ मोड़ा जा रहा है, तो ऐसी तमाम सावधानी बहुत जरूरी है क्योंकि लोगों का भरोसा इस नई तकनीक पर अगर बैठ नहीं पाया, तो इसका इस्तेमाल कामयाब भी नहीं होगा, और लोग सुरक्षित भी नहीं रहेंगे। 

धान बोनस और सूखा राहत से परे भी सोचने की जरूरत

संपादकीय
12 सितंबर 2017


छत्तीसगढ़ में किसानों को धान बोनस का मुद्दा सत्तारूढ़ भाजपा को एक बहुत बड़ा लुभावना चुनावी मुद्दा भी लग रहा है, और कांग्रेस इस बात को लेकर परेशान भी है कि उसके हाथ से एक बड़ा मुद्दा निकल गया है जिसका विकल्प ढूंढना कुछ मुश्किल होगा। लेकिन किसानों के मुद्दे महज धान बोनस पर खत्म नहीं हो रहे हैं, बहुत से और पहलू हैं जिन पर सत्ता और विपक्ष दोनों को राजनीति से परे जाकर खुली चर्चा करनी चाहिए और समस्याओं का समाधान निकालना चाहिए। आज जिस वक्त हम ये लिख रहे हैं, उसी वक्त राज्य मंत्रिमंडल ने प्रदेश की दो तिहाई तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किया है क्योंकि वक्त पर बारिश नहीं हुई, और किसानों ने सूख रही फसल को चरने के लिए जानवरों को खेतों में छोड़ दिया है। ऐसी नौबत से अकेले सरकार नहीं जूझ सकती, और विपक्ष को भी बड़ी बारीकी से एक-एक खेत, और एक-एक किसान को मुआवजा दिलवाने के लिए अपनी क्षमता का इस्तेमाल करना चाहिए।
आज न सिर्फ छत्तीसगढ़ में बल्कि पूरे देश में फसल बीमा योजना में बीमा कंपनियों की धांधली पकड़ा रही है। छत्तीसगढ़ में भी जो बातें सामने आई हैं, उनके मुताबिक बीमा कंपनियों को बारिश और मौसम के लिए हर इलाके में जितनी-जितनी दूर पर मॉनीटर लगाने थे, उन्होंने नहीं लगाए। नतीजा यह हुआ कि मौसम के रिकॉर्ड के साथ मुआवजे को जोडऩा मुमकिन नहीं हो पाया, और कहीं-कहीं पर पूरे-पूरे जिले में एक ही तरह के आंकड़े इस्तेमाल किए गए जिससे कि सूखे खेतों को सूखा दर्ज नहीं किया जा सका। दूसरी तरफ अभी बालोद में किसानों का प्रदर्शन सामने आया जो कि 2015 से चले आ रहा है और उनका कहना है कि फसल बीमा के रिकॉर्ड में उनकी जमीनों के खसरा नंबर सरकारी कर्मचारियों ने गलत दर्ज किए, और आज उनके बीमा का निपटारा नहीं हो पा रहा है।
इसके अलावा भी कई और किस्म की दिक्कतें छत्तीसगढ़ की फसल को लेकर सामने आती हैं। कई जगहों पर नकली या घटिया बीज, कई जगहों पर नकली या घटिया खाद की शिकायतें सामने आती हैं। फिर जगह-जगह यह भी सामने आया है कि लो-वोल्टेज की वजह से कहीं पंप नहीं चल रहे, और कहीं पर बिजली लंबे-लंबे समय के लिए बंद है। बैंकों से लोन समय पर नहीं मिलता, और सरकार से खेती की मशीनें किराए पर लेने में दिक्कत जाती है। ऐसी अनगिनत दिक्कतें किसान को परेशान करती हैं, और सिर्फ धान खरीदी या कि धान बोनस से ये दिक्कतें दूर नहीं होने वाली हैं। सरकार को खेती से जुड़े हुए सभी मामलों के अपने विभागों के काम को बेहतर करना होगा, और जिस तरह केन्द्र सरकार में बिजली, कोयला, और रेलगाड़ी के विभागों को जोड़कर एक साथ बिजली की दिक्कतों को निपटाया जाता है, उसी तरह राज्य में कृषि, सिंचाई, राजस्व, बिजली जैसे विभागों को मिलाकर प्रदेश की किसानी-दिक्कतों को निपटाना चाहिए।
लेकिन आज सूखे और बोनस की चर्चा के बीच दीर्घकालीन बात धरी रह जाती है। हम पहले भी कई बार लिख चुके हैं कि किसान की अर्थव्यवस्था खेतों से परे भी रहनी चाहिए, तभी वे भूखे मरने से बचेंगे। इसके लिए डेयरी से लेकर पशु-पक्षी पालन, और मधुमक्खी पालन से लेकर मशरूम तक, कई तरह के दूसरे काम खेती-किसानी के साथ जोडऩे चाहिए। जिन इलाकों में ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े हुए ऐसे काम चलते हैं, वहां से सूखे में भी किसानों और मजदूरों को काम की तलाश में प्रदेश छोड़कर बाहर नहीं जाना पड़ता। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में खेती को अलग से नहीं देखा जान चाहिए, और सभी तरह की दूसरी ग्रामोद्योग गतिविधियों को किसानों से, उनके परिवारों से जोड़कर उनकी उत्पादकता बढ़ानी चाहिए। इसी से उनकी हालत सुधरेगी, वे आत्महत्या से बचेंगे, और प्रदेश की कुल उत्पादकता में भी उससे बढ़ोत्तरी होगी। 

मिले-जुले मकसद के लिए भी अलग-अलग करने की जरूरत

11 सितंबर 2017

कांग्रेस पार्टी के चर्चित और विवादास्पद नेता दिग्विजय सिंह ने कल ट्विटर पर प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ बनाए गए एक पोस्टर को री-ट्वीट करके एक बार फिर मधुमक्खियों के छत्ते में हाथ डाल दिया है। भाजपा के लोग तो मोदी के खिलाफ हल्की जुबान वाले इस पोस्टर को लेकर बिफरे हुए हैं ही, खुद कांग्रेस पार्टी के लोग कुछ परेशान हैं कि परेशानियों में घिरी हुई भाजपा को दिग्विजय हमलावर होने का एक मौका दे बैठे हैं। दरअसल सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने का एक नशा और नतीजा यह भी होता है कि लोग दूसरों की पोस्ट को आगे बढ़ाते हुए यह अहसास भूल जाते हैं कि आगे बढ़ाने के लिए तो वे अकेले जिम्मेदार हैं ही। और ऐसा महज दिग्विजय के साथ होता हो, ऐसा भी नहीं है, हमारे जैसे कई लोग भी कई बार ऐसे उत्साह के शिकार हो जाते हैं, जो कि बाद में तब भारी पड़ता है जब लोग बढ़ाई गई बात की पूरी जिम्मेदारी बढ़ाने वाले पर तय कर देते हैं। और ऐसा होना भी चाहिए, क्योंकि किसी आलोचना या निंदा के कार्टून, पोस्टर, या कमेंट को बनाने की जिम्मेदारी ही बनाने वाले पर आ सकती है, और बढ़ाने की जिम्मेदारी तो बढ़ाने वाले पर ही रहेगी।
दिग्विजय सिंह के साथ एक दिक्कत यह है कि वे एक राष्ट्रीय पार्टी के एक प्रमुख नेता होते हुए भी एक सामाजिक कार्यकर्ता की तरह बहुत से ऐसे फैसले लेते हैं जो कि उनकी पार्टी को पूरी तरह बर्दाश्त नहीं होते। जब कोई पार्टी बड़ी होती है, तो उसके भीतर कई तरह की बातों का ख्याल रखना होता है। एक एनजीओ के काम करने के तौर-तरीके, और एक राजनीतिक पार्टी की शैली में बड़ा फर्क हो सकता है। कोई एनजीओ लोगों के बीच वोटों के लिए नहीं जाता है, उसे हद से हद कुछ सरकारों तक, कुछ कंपनियों तक, या कुछ अंतरराष्ट्रीय संगठनों तक नोटों के लिए जाना होता है। इन दोनों की बेबसी बिल्कुल अलग-अलग होती है। लेकिन जब एनजीओ के लोग राजनीति में शामिल होने लगते हैं, जैसा कि योगेन्द्र यादव जैसे लोगों के साथ हुआ, या कि राजनीति के लोग एनजीओ में पहुंचकर उनके आंदोलन में शरीक होने लगते हैं, जैसा कि दिग्विजय के साथ कई बार होता है, तो ये दोनों ही तबके अपनी बुनियादी पहचान के भीतर कुछ तकलीफ पाने लगते हैं।
लेकिन यह बात सिर्फ इन्हीं दोनों तबकों तक सीमित नहीं है, बहुत से दूसरे ऐसे दायरे हैं जिनके लोग जब दूसरे दायरों में काम करने लगते हैं तो किसी न किसी दायरे का नुकसान होता है। इन दिनों बहुत से ऐसे जर्नलिस्ट हैं जो कि एक्टिविस्ट की तरह भी काम करते हैं, वे अपने लिखने या कहने में भी एक्टिविस्ट होने लगते हैं, और सड़कों पर कुछ मुद्दों के लिए लगातार लड़ाई भी लड़ते हैं। कुछ लोगों का यह मिला-जुला काम इतना बढ़ जाता है कि वे एक जर्नलिस्ट की साख खो बैठते हैं, और किसी बैनर का डंडा थाम लेते हैं। ऐसे में यह दिक्कत भी होती है कि उनके किस काम को जर्नलिस्ट का काम माना जाए, और किस काम को एक्टिविस्ट का काम माना जाए। इससे दोनों ही दायरों का नुकसान होता है, किसी एक जर्नलिस्ट के एक्टिविस्ट होने से बाकी गैरएक्टिविस्ट जर्नलिस्ट उस आंदोलन या मुद्दे से कतराने भी लगते हैं कि वह तो फलां जर्नलिस्ट या फलां मीडिया की नेतागिरी का अड्डा है।
लेकिन अगर कोई जर्नलिस्ट कुछ जलते-सुलगते मुद्दों पर सड़कों पर साथ नहीं उतर आते तो बहुत से एक्टिविस्ट यह मानकर चलते हैं कि उन मुद्दों पर उनकी सैद्धांतिक सहमति ही नहीं है। यह बात समझने में चूक कर बैठते हैं कि लोगों के, अलग-अलग पेशे या तबके के लोगों के, सिद्धांत एक हो सकते हैं, लेकिन उस मंजिल तक पहुंचने के उनके रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं। कोई अखबारनवीस अपने विचारों को लिखकर उस मंजिल तक पहुंच सकते हैं, और कोई एक्टिविस्ट सड़कों पर आंदोलन करके, अदालतों तक अपील करके, सोशल मीडिया पर अभियान छेड़कर भी उसी मंजिल तक पहुंच सकते हैं। इसलिए इस जिद से बचने की जरूरत है कि एक मंजिल के राही एक ही राह से चलकर जाएं।
लोकतंत्र एक बहुत ही विविधताओं से भरा हुआ तंत्र भी है। लोकतंत्र के तीन तथाकथित स्तंभों से परे भी बहुत से और स्तंभ रहते हैं जो कि लोकतंत्र को मजबूती से खड़ा रहने में मदद करते हैं, इनमें एनजीओ भी हो सकते हैं, बिना किसी संगठन के काम करने वाले अकेले जागरूक नागरिक भी हो सकते हैं जिनके बारे में कई लोग यह मान बैठते हैं कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। हमने इस देश में बहुत बड़े-बड़े कई फैसलों के पीछे अदालत तक पहुंचने वाले अकेले लोगों को देखा है जिन्होंने बिना किसी संगठन, बिना किसी पार्टी, और बिना किसी तबके के अकेले जनहित की कानूनी लड़ाई लड़ी, और पूरे देश को फायदा पहुंचाने वाला फैसला पाया।
लेकिन हम फिर आज की शुरुआती चर्चा पर लौटें तो दिग्विजय सिंह की पोस्ट, जिसे उन्होंने बाद में खुद ही सोशल मीडिया से हटा दिया, वह किसी ने ओछे शब्दों और गालियों  के सहारे गढ़ी थी। अब आज जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश और विदेश के मीडिया की इस आलोचना से घिर गए हैं कि वे सोशल मीडिया पर ऐसे लोगों को फॉलो करते हैं जो कि दूसरों को हत्या और बलात्कार की धमकी देते हैं, जो दूसरों को गालियां देते हैं, तो ऐसे में दिग्विजय सिंह ने नासमझी की एक हरकत से लोगों का ध्यान मोदी की तरफ से हटाकर अपनी तरफ खींच लिया है, और मीडिया-सोशल मीडिया पर चल रहे मुद्दे को पटरी से उतार दिया है। अगर हम देखें कि क्या कोई राजनीतिक दल एक राजनीतिक फैसले के तहत अपनी ही ट्रेन को पटरी से इस तरह उतारता, तो दिग्विजय की गलती समझ आती है। और यह भी समझ आता है कि कांग्रेस पार्टी ने धीरे-धीरे करके किस तरह दिग्विजय सिंह के गैरजरूरी और नाजायज बयानों को अपने लिए असुविधा का पाया, और उन्हें धीरे-धीरे हाशिए पर कर दिया। दिग्विजय सिंह के भीतर साम्प्रदायिक संगठनों और आरएसएस से लडऩे की एक अमर इच्छाशक्ति है, लेकिन यह लड़ाई हमेशा ही जरूरी नहीं होती, कांग्रेस के हित में नहीं होती, और कई बार यह बेमौके की, गलत मुद्दों पर छेड़ी हुई, और गलत जुबान में लड़ी जा रही भी साबित होती है। दिग्विजय सिंह का ओसामा-बिन-लादेन को ओसामाजी कहना उनकी एक मामूली चूक हो सकती है, लेकिन वह कांग्रेस को बहुत भारी पड़ती है। यहां पर यह बात साफ होती है कि एक संगठन का दायरा और उस संगठन के हिस्से किसी व्यक्ति का निजी दायरा भी आपस में टकरा सकते हैं, और दोनों को अपनी-अपनी सीमाएं समझना चाहिए।
देश के कुछ जलते हुए मुद्दों पर लोगों को साथ आने की जरूरत लग सकती है, लेकिन हमारा अभी भी यह मानना है कि तबके अलग-अलग दायरों में रहकर अपने मकसद में अधिक कामयाब हो सकते हैं। अभी कर्नाटक की पत्रकार गौरी लंकेश के कत्ल के बाद जब चारों तरफ विरोध-प्रदर्शन हुआ, तो दिल्ली में प्रेस क्लब में पत्रकारों के साथ-साथ एनजीओ के लोग और राजनीति के लोग भी शामिल हुए। कार्यक्रम खत्म होने के कुछ घंटों के भीतर ही यह आवाज उठने लगी कि मीडिया के मुद्दों पर ऐसे किसी विरोध-प्रदर्शन में मीडिया से बाहर के लोगों को शामिल नहीं किया जाना चाहिए। यह बात एक तरीके से तब ठीक है जबकि कोई कार्यक्रम या विरोध-प्रदर्शन मीडिया के झंडे तले हो रहा है, उसमें तो सचमुच ही बाहर के लोगों को शामिल नहीं होना चाहिए। और अगर सबको मिलकर यह काम करना है तो फिर वह एक अलग बैनरतले होना चाहिए, न कि मीडिया के नाम पर।
लोगों को यह समझने की जरूरत है कि लोकतंत्र के लिए काम करते हुए किसी भी तबके को न तो अपनी पहचान खोनी चाहिए, न अपना दायरा भूलना चाहिए, और न ही उनको किसी दूसरे दायरे की पहचान ओढ़कर काम करना चाहिए। लोगों की विश्वसनीयता उसी हालत में कायम रहती है जब वे अपना खुद का काम अपनी खुद की पहचान के साथ करते हैं। ऐसा करके ही वे एक मिले-जुले मकसद के लिए कुछ अधिक कर सकते हैं।

बच्चों पर सेक्स हमलों से बचाव के लिए बड़ी जागरूकता जरूरी

संपादकीय
11 सितंबर 2017


दिल्ली और उसके आसपास के हादसे कुछ बड़ी खबरें बनते हैं क्योंकि वहीं पर बड़े अखबार, बड़े टीवी चैनल, देश की सबसे बड़ी अदालत, देश की सबसे बड़ी सरकार, और देश के बाकी तमाम किस्म के सबसे बड़े ओहदे भी बसते हैं। जिस तरह इंसान के शरीर में सिर के सबसे करीब लगने वाली चोट का सबसे अधिक असर होता है, उसी तरह देश की राजधानी की बातें बाकी देश के मुकाबले अधिक मायने रखती हैं। और जैसे-जैसे हादसे महानगरों से दूरी पर होते हैं, उनका महत्व घटते जाता है। लेकिन हादसे तो हादसे होते हैं, और इनके अधिक चर्चा में आने से इतना तो होता है कि देश भर का ध्यान उनकी तरफ जाता है, और ऐसे मौके पर समझदार तबकों को कोशिश करके उनके मुद्दों पर एक व्यापक और बड़ी चर्चा करवानी चाहिए ताकि देश में भी खतरों पर फिक्र हो सके और लोग चौकन्ने हो सके, कुछ रास्ता ढूंढा जा सके।
दिल्ली के बगल गुडग़ांव में अभी एक स्कूल में छोटे से बच्चे को बलात्कार की कोशिश के बाद स्कूल के बस कंडक्टर ने ही मार डाला।  और दिल्ली में एक स्कूल में एक बच्ची से बलात्कार हुआ। इन दो घटनाओं से सबक लेते हुए देश भर में बाकी सरकारों, बाकी स्कूलों, और बाकी मां-बाप को भी अपने-अपने इंतजाम दुरूस्त कर लेने चाहिए। आज स्कूलें घरों से बहुत दूर-दूर हो गई हैं, और बच्चे हर दिन औसतन घंटे-दो घंटे तो सफर करते ही हैं। ऐसे में उनकी हिफाजत एक आसान बात नहीं होती, और सरकार के नियम-कायदे, उसकी नसीहतें सब धरे रह जाते हैं, और स्कूलें, बहुत महंगी स्कूलें भी लापरवाह साबित होती हैं। अभी गुडग़ांव में जिस स्कूल में यह बलात्कार-हत्या का मामला सामने आया है वह देश की सबसे बड़ी और चर्चित स्कूलों की एक चेन है, और उसकी मालकिन देश के सबसे ताकतवर नेताओं से परिचित भी है। हम इस मौके पर उस मालकिन की राजनीतिक पार्टी और नेताओं के साथ उसकी शिष्टाचार मुलाकातों की तस्वीरों को महत्वपूर्ण नहीं मानते जो कि रोजाना सामने आ रही हैं। लेकिन हम इस बात को महत्वपूर्ण मानते हैं कि इस स्कूल ने जहां-जहां गलती की है और गलत काम किए हैं, वहां-वहां उसे सजा मिलनी चाहिए।
लेकिन एक दूसरे मुद्दे पर भी चर्चा जरूरी है कि सरकार स्कूल और मां-बाप के अलावा खुद बच्चों के भीतर जागरूकता कैसे पैदा की जाए। हो सकता है कि अभी के दो हादसों में बच्चे कुछ अधिक छोटे हों और उनके लिए किसी हिंसा का मुकाबला करना मुमकिन न हो, लेकिन देश में बच्चों के यौन शोषण के खिलाफ बच्चों में एक व्यापक जागरूकता की जरूरत है क्योंकि उन पर ऐसे सेक्स हमले न सिर्फ स्कूल या खेल के मैदान में हो सकते हैं, बल्कि घर में भी हो सकते हैं। कल ही कोई खबर आई है कि मां-बाप पड़ोस में बैठने गए थे, और घर पर रह गई अकेली बच्ची के साथ पड़ोसी ने बलात्कार किया। इसलिए बच्चों को जागरूक करना जरूरी है कि परिवार के सदस्य, पड़ोस के लोग, स्कूल या दूसरी जगहों के लोग उन्हें अगर किसी तरह से छूते हैं, तो उन्हें क्या करना है। भारत में किसी भी तरह की सेक्स शिक्षा, शरीर शिक्षा, या जागरूकता की बात करना झंडों-डंडों को न्यौता देना हो जाता है, और दकियानूसी लोग ऐसा माहौल खड़ा करने लगते हैं कि ये सारे सेक्स अपराध भारत में नहीं होते, और ये पश्चिमी संस्कृति हैं। हकीकत यह है कि दकियानूसी देश में ऐसी बातें अधिक होती हैं क्योंकि पश्चिमी देशों में तो मां-बाप भी चौकन्ने रहते हैं और बच्चों को भी सावधानी सिखाई जाती है। भारत ऐसे बचाव से अछूता है। लेकिन अब ऐसे हादसों को देखते हुए यह जरूरी है कि लोग कई तरह के अलग-अलग मंचों पर इस मुद्दे पर चर्चा करें, और मां-बाप से लेकर बच्चों तक सबकी सावधानी को बढ़ावा दें।

बलात्कारी बापू-बाबा भांडाफोड़ से देश को यह सबक लेना चाहिए

संपादकीय
10 सितंबर 2017


वैसे तो डेरा सच्चा सौदा के बलात्कारी बाबा राम रहीम के बारे में लिखने को अधिक कुछ नहीं बचा है क्योंकि पिछले कुछ हफ्तों में कई बार उस पर लिखा गया, लेकिन अब जब इस बाबा को चारों तरफ से धिक्कार मिल रही है, और डेरा की तलाशी में इस बाबा की ऐशगाह से साध्वियों के कमरों तक, छात्राओं के हॉस्टल तक सुरंग मिलने की खबरें आ रही हैं, तो इस पूरे सिलसिले पर फिर से एक नजर डालने की जरूरत है कि इससे देश को क्या सबक लेना चाहिए। इसके अलावा आज ही अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद में फर्जी बाबाओं की एक लिस्ट जारी की है जिसमें कई चर्चित बाबाओं में से आसाराम बापू, राधे मां, राम रहीम, निर्मल बाबा, स्वामी असीमानंद, आसाराम के बेटे नारायण सांई, रामपाल जैसे बहुत से लोगों के नाम जारी किए गए हैं, और कहा गया है कि इन लोगों को संत जैसी उपाधि देने के पहले एक प्रक्रिया से उनको आंका जाएगा। इस परिषद के अध्यक्ष महंत नरेन्द्र गिरी का कहना है कि इस बैठक के पहले तीन दिनों में तीन अलग-अलग मोबाइल नंबरों से उन्हें धमकी दी गई कि वे ऐसी कोई लिस्ट जारी न करें और फोन करने वालों ने खुद को आसाराम का शिष्य बताया है। यह बात अच्छी तरह दर्ज है कि आसाराम पर चल रहे नाबालिग से बलात्कार के मामले में बहुत से गवाहों की अब तक हत्या हो चुकी है, और उसी के चलते कई बरस से आसाराम को जमानत भी नहीं मिल पाई है, सारे गवाहों के बयान भी अदालत में दर्ज नहीं हो पाए हैं।
हम इन तमाम बातों को देखते हुए लोगों के सामने यह बात रखना चाहते हैं कि अपने परिवार के बालिग और नाबालिग लोगों को किसी भी धार्मिक या आध्यात्मिक गुरू के सामने पेश करने के पहले उनको यह समझ लेना चाहिए कि दुनिया में धर्म और अध्यात्म से जुड़े हुए लोगों का इतिहास ऐसे मामलों से भरा हुआ है। जब कभी अपने परिवार को लोग ऐसी जगहों पर ले जाते हैं, वे एक बहुत बड़ा खतरा मोल लेते हैं। कैथोलिक ईसाई धर्म के बड़े-बड़े पादरियों से लेकर दूसरे बहुत से धर्मों के लोगों तक को बच्चों से बलात्कार में पकड़ा गया है, भारत में बहुत से भगवाधारी और स्वघोषित संत या बाबा की सेक्स-फिल्में इंटरनेट पर भरी पड़ी हैं। आसाराम जिस नाबालिग बच्ची के साथ बलात्कार के आरोप में जेल में है, वह बच्ची भी आसाराम की संस्था द्वारा चलाई जा रही एक स्कूल की हॉस्टल की थी, और उसके मां-बाप आसाराम के भक्त थे। बाबा राम रहीम ने जिन साध्वियों के साथ बलात्कार करके 20 बरस की कैद हासिल की है, वे साध्वियां भी उस बाबा के भक्तों के परिवार की नाबालिग बच्चियां थीं, और उसी उम्र में आश्रम को सौंप दी गई थीं। इसलिए लोगों की आस्था उनके परिवारों के लिए भी जानलेवा साबित होती है।
जब तक हिन्दुस्तान में यह अंधविश्वास बने रहेगा कि ऐसे बाबाओं के प्रति हर तरह का समर्पण उन्हें पापों से मुक्ति दिला देगा, या कि स्वर्ग पहुंचा देगा, या कि ईश्वर से मिला देगा, तब तक ऐसे अंधभक्तों के परिवार भी खतरे में रहेंगे। धर्म और आध्यात्म का चोला पहनकर बहुत से लोग देह शोषण में जुट जाते हैं, और ऐसे हजारों में से कोई एक-दो मामले ही शिकायत और पुलिस-अदालत तक पहुंच पाते हैं। देश में अवैज्ञानिक सोच, अंधविश्वास, और धर्मान्धता के चलते लोग अपनी तर्कशक्ति, अपनी सामान्य समझबूझ खो बैठते हैं, और ऐसे बाबाओं, पाखंडियों, और स्वघोषित संतों के हाथों न सिर्फ खुद लुटते हैं, बल्कि अपने परिवार को भी झोंक देते हैं। यह सिलसिला इस ताजा बलात्कार कांड के खुलासे के बाद कुछ थमना चाहिए। चूंकि इन साध्वियों के साथ हुए बलात्कार को तो वापिस किया नहीं जा सकता, इसलिए अब केवल यही बात काम की हो सकती है कि ऐसे खतरों से देश के लोगों को अधिक से अधिक आगाह किया जाए, और देश की बाकी बच्चियों को, बच्चों को, महिलाओं को बचाया जाए। और बाबा राम रहीम के मामले में तो यह भी सामने आया है कि वह अपने भक्तों में से सैकड़ों नौजवानों को भी अपने एक ऑपरेशन थियेटर में डॉक्टरों से सर्जरी करवाकर नपुंसक बनवा देता था ताकि वे अपना सेक्स खोकर पूरी तरह इस बाबा के लिए ही समर्पित रहें। इसलिए हर उम्र और हर सेक्स के लोगों को हर तरह के बाबाओं से बचकर रहना चाहिए यह सबक आज देश की हवा में है, और राम रहीम कांड से अब देश में शुरू हुई इस नई चर्चा से एक जागरूकता आनी चाहिए, और ऐसे हर बाबा का भांडाफोड़ करने के लिए जागरूक लोगों को कैमरे-माइक्रोफोन सबका इस्तेमाल करके जनता का भला करना चाहिए।