देवी प्रतिमाओं की पूजा वाले देश में जिंदा देवियां बदहाल

संपादकीय
21 सितंबर 2017


भारत के एक बड़े हिस्से में बड़ी आस्था से मनाया जा रहा त्योहार नवरात्रि आज से शुरू हुआ है, और इन नौ दिनों में देश भर के देवी-मंदिरों में तो पूजा-अर्चना होगी ही, जगह-जगह सार्वजनिक पंडाल लगाकर देवी प्रतिमाएं भी स्थापित की जाएंगी। अलग-अलग प्रदेशों में रीति-रिवाज अलग हो सकते हैं, लेकिन यह शक्ति की प्रतीक महिला की पूजा सभी जगहों पर है। अब सवाल यह उठता है कि हर बरस साल में दो बार नौ-नौ दिनों तक देवी की उपासना, पूजा-अर्चना करने वाले हिन्दुओं के जीवन में जिंदा देवियों की क्या जगह है?
आज ही दो खबरें उत्तरप्रदेश की है कि किस तरह एक हिन्दू लड़की को भाजपा की एक नेता पीट रही है कि वह किसी दूसरे धर्म के लड़के से प्यार करती है। वहीं पर भाजपा के सांसद साक्षी महराज यह कह रहे हैं कि मोटरसाइकिलों पर लड़के-लड़कियों के चिपककर साथ बैठने की वजह से बलात्कार की घटनाएं बढ़ती हैं। तीसरी खबर है कि राजस्थान के अलवर में एक हिन्दू बाबा, फलाहारी महाराज को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस उसके आश्रम और अस्पताल में तैनात है, उस पर छत्तीसगढ़ की एक कानून की छात्रा ने बलात्कार की रिपोर्ट लिखाई है। पंजाब-हरियाणा से एक खबर और है कि वहां एक स्कूल के शौचालय में किस तरह एक छोटी बच्ची के साथ बलात्कार किया गया है। इससे परे देश भर में जगह-जगह शायद हर घंटे किसी न किसी लड़की या महिला से बलात्कार की रिपोर्ट सामने आती है, और हमारा अंदाज यह है कि ऐसे दर्जनों बलात्कार मेें से कोई एक मामला ही पुलिस तक पहुंच पाता है।
यह देश लड़कियों और महिलाओं के मामले में इस कदर अमानवीय हो गया है कि दुनिया भर में इसे लेकर यहां आने वाले पर्यटकों के बीच दहशत भी रहती है, और खुद देश के भीतर बच्चियों के मां-बाप चैन से सो नहीं पाते हैं कि वे किस भरोसे से बच्चियों को स्कूल भेजें, किस भरोसे से उन्हें खेलकूद के मुकाबलों में दूसरे शहर भेजें, या कि पढऩे के लिए बाहर भेजें। इस देश में बलात्कार किसी बुरे सपने से भी अधिक बुरी ऊंचाईयों पर पहुंच चुका है, और ऐसा लगता है कि यह इस देश के लोगों का एक राष्ट्रीय शगल हो गया है। सरकारों में, अदालतों में पहुंचने वाली शिकायतों का हाल यह है कि बरसों तक किसी को सजा नहीं हो पाती है, और अभी इस बरस देश की सबसे चर्चित बलात्कार की खबर वाले बाबा राम रहीम को उसके किए बलात्कारों के पन्द्रह बरस बाद सजा हो पाई। और भारत की अदालती व्यवस्था के मुताबिक निचली अदालत से हुई इस सजा के खिलाफ अभी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक बाबा के जाने की संभावना या आशंका बची हुई ही है।
छत्तीसगढ़ में हर कुछ महीनों में ऐसी खबर सामने आती है कि किस तांत्रिक ने या किस बाबा ने किसी लड़की या महिला से भूत उतारने के नाम पर, या कि कोई और झांसा देकर उसके साथ बलात्कार किया। ऐसे बहुत से मामले धर्म से जुड़े होते हैं, और आस्थावान लोगों के होते हैं। ऐसे लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि देवी पर इस देश के धर्मालु लोगों की आस्था उन्हें जिंदा देवियों के साथ कोई जुर्म करने से जरा भी नहीं रोक पाती है। लोगों को अपनी आस्था को अंधविश्वास में नहीं बदलने देना चाहिए क्योंकि धर्म किसी को बेहतर इंसान नहीं बना पाता, बल्कि धर्म लोगों को एक प्रायश्चित करके पापमुक्ति का मौका देता है जिससे कि धर्मालु लोगों की छाती पर से उनके अपराध का बोझ हट जाता है। इसलिए लोगों को सावधान रहना चाहिए कि यह देश प्रतिमाओं की देवियों की पूजा तो अच्छे से करता है, लेकिन जिंदा देवियों के लिए इसके मन में अधिक सम्मान नहीं है। इसलिए लोगों को बहुत सावधान रहने की जरूरत है, और खासकर जितने किस्म के बाबा, धर्मगुरू, तांत्रिक हैं, उनसे खास तौर पर सावधान रहना चाहिए क्योंकि वे अंधविश्वास बढ़ाकर, झांसा देकर लोगों को हर तरह से लूटने की अतिरिक्त ताकत रखते हैं।

देश के बाहर राहुल की कही बातों को गलत कैसे कहा जाए...

संपादकीय
20 सितंबर 2017


कांग्रेस उपाध्यक्ष और भावी अध्यक्ष राहुल गांधी पर यह तोहमत लग रही है कि वे अमरीकी विश्वविद्यालयों में मंच और माईक से भारत के घरेलू मुद्दों के बारे में बोल रहे हैं, और देश को बदनाम कर रहे हैं। लेकिन ऐसा कहने वालों की याददाश्त कुछ कमजोर है और वे यह भूल रहे हैं कि प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने जब पहली बार अमरीका जैसे देशों का वीजा पाया, तो वहां के बहुत बड़े-बड़े सभागृहों में प्रवासी भारतीयों के बीच उन्होंने भारत की पिछले साठ-सत्तर बरस की सभी सरकारों के कामकाज को खारिज कर दिया था, जिसमें छह बरस की अटल सरकार का काम भी शामिल था, और उस जनता पार्टी सरकार का काम भी शामिल था जिसमें जनसंघ एक सबसे बड़ा घटक दल था, और जिसमें अटल-अडवानी जैसे दिग्गज जनसंघी मंत्री थे। आजादी के बाद से भारत सरकार के सारे कामकाज को मोदी ने इतनी बार खारिज किया, इतने देशों में जाकर खारिज किया कि इस बारे में उसी वक्त उनकी भारत में बड़ी आलोचना भी हुई थी। आज तो राहुल गांधी किसी सरकारी कुर्सी पर नहीं हैं, और उनका कहा हुआ तो महज विपक्ष के एक नेता का कहा हुआ है, और वे मोदी सरकार के पिछले तीन बरस के काजकाज को लेकर ही बोल रहे हैं, देश में आजादी के बाद से आई कई कांगे्रस-विरोधी केंद्र सरकारों को खारिज नहीं कर रहे हैं।
इसलिए हम राहुल को आज किसी तोहमत का हकदार नहीं पाते क्योंकि किसी विदेश का लोकतंत्र परंपराओं को न तो रातोंरात बनाता है, और न ही रातोंरात पाता है। भारतीय लोकतंत्र की परंपराएं लंबे समय में जाकर बनी थीं, और उनको पिछले तीन बरस में बड़ी रफ्तार से तबाह किया गया है। राहुल गांधी ने भारत में असहिष्णुता बढऩे जैसे कुछ मामलों को उठाया है, जो कि कोई भांडाफोड़ नहीं है, देश के अलावा दुनिया में जगह-जगह अमनपसंद लोग लगातार इस मुद्दे को उठाते रहे हैं, और लोकतंत्र में इसे सरकार विरोधी या देश विरोधी काम मानना गलत है। यह मुद्दा देश की अदालतों में भी बार-बार उठ रहा है और सुप्रीम कोर्ट के अलावा बहुत से हाईकोर्ट देश के हाल पर फिक्र जाहिर कर चुके हैं। गायों को लेकर केंद्र सरकार ने जैसे कानून बनाए और जिस तरह भाजपा के राज वाले कई राज्यों में गाय के नाम पर गुंडागर्दी करने वाले लोगों ने अभूतपूर्व हिंसा की, उसे लेकर सुप्रीम कोर्ट को अभी पूरे देश में हर जिले में अफसरों पर जिम्मेदारी तय करने का हुक्म देना पड़ा।
हमारा ख्याल है कि लोकतंत्र में अच्छी परंपराओं को स्थापित करना चाहिए जिनमें यह भी शामिल होना चाहिए कि अपने से पहले की सरकारों के कामकाज को उस तरह खारिज न किया जाए जिस तरह आज केंद्र सरकार के बहुत से लोग कर रहे हैं। भारत अपने बहुत से लोकतांत्रिक मूल्यों को खो रहा है, और पिछले आम चुनाव में मतदाताओं के बहुमत से मिले समर्थन को ऐसा करने की एक मंजूरी मानकर चल रहा है। जबकि चुनाव में मिली हुई जीत लोकतंत्र को खत्म करने के लिए, देश से सद्भाव को खत्म करने के लिए मंजूरी नहीं होती है। राहुल गांधी को देश के बाहर देश के मुद्दे न उठाने की सलाह देने का हक उन्हीं को हो सकता है जिन्होंने देश के बाहर देश की पिछली सरकारों के खिलाफ कुछ न कहा हो।

म्यांमार के शरणार्थियों के लिए दरवाजे बंद करके भारत इतिहास में जगह खो रहा है...

संपादकीय
19 सितंबर 2017


सुप्रीम कोर्ट में केन्द्र सरकार ने कहा है कि म्यांमार से आ रहे रोहिंग्या शरणार्थी देश की सुरक्षा के लिए खतरा हैं, और सरकार उन्हें बाहर निकालने जा रही है। सरकार ने अदालत से यह भी अनुरोध किया है कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है, और अदालत इसमें दखल न दे। आज पूरी दुनिया के सामने रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों की जो हालत है, उसे लेकर सबके दिल दहले हुए हैं। म्यांमार में सत्तारूढ़, नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित, आंग-सान-सू-ची की सरकार जिस तरह इन मुस्लिमों के खिलाफ फौज और बौद्ध समुदाय की हिंसा को बढ़ावा दे रही है, उसे पूरी दुनिया शर्मनाक मान रही है, यह एक अलग बात है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अभी म्यांमार हो आए, लेकिन उन्होंने वहां के इस अमानवीय पहलू पर सू-ची से मुलाकात में चर्चा भी नहीं की। अब सरकार का अदालत में हलफनामा और भी निराश करता है क्योंकि अभी पिछले बरसों में लगातार योरप के दर्जन भर देशों ने, और कनाडा ने जिस तरह सीरिया और इराक, लीबिया और दूसरे युद्धग्रस्त देशों से आ रहे शरणार्थियों के लिए अपने दरवाजे खोले हैं, उससे दुनिया मेें सभ्य लोकतंत्र की परिपक्वता स्थापित होती है। ये शरणार्थी तो ऐसे देशों से पहुंचे थे, पहुंच रहे हैं, जहां पर आईएसआईएस और अलकायदा जैसे खतरनाक आतंकी संगठन राज कर रहे हैं, और इनके आतंकी घुसपैठिये शरणार्थियों के बीच योरप के देशों में पहुंचने का एक बहुत बड़ा खतरा है। दूसरी तरफ भारत से म्यांमार की सरहद लगी हुई है, और वहां बड़े पैमाने पर चल रहे सरकारी और बौद्ध हिंसा के कत्लेआम से बचकर जो मुस्लिम आ रहे हैं, उनके लिए दरवाजे बंद करना एक अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी से कतराना है।
भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को कहा है कि इन शरणार्थियों में पाकिस्तान के आतंकी संगठनों के एजेंट भी शामिल हैं, इसलिए देश की सुरक्षा के लिए इनको रोकना भी जरूरी है और आ चुके शरणाथियों को निकालना भी जरूरी है। हमारा मानना है कि अंतरराष्ट्रीय कानून और समझौतों के तहत भी भारत को उदारता दिखानी चाहिए, और पड़ोसी होने के नाते यह इंसानियत भी दिखानी चाहिए कि बड़े पैमाने पर मारे जा रहे लोगों को अपने देश में जगह दे, और फिर चाहे तो इन्हें एक अलग हिफाजत और निगरानी में रखे। पाक आतंकी संगठनों के भारत में एजेंट इन्हीं शरणार्थियों के बीच नहीं घुसेंगे, वे तो कश्मीर और दूसरे इलाकों में वैसे भी लगातार काम करते हैं, और उनकी की हुई आतंकी घटनाएं सामने आती रहती हैं।
भारत का शरणार्थियों के मामले में बहुत लंबा और गौरवशाली इतिहास रहा है। चीन के तिब्बत इलाके के शरणार्थियों और उनके मुखिया दलाई लामा को भारत ने पूरा सम्मान देकर केन्द्र सरकार के खर्च पर जगह दी, और देश में कई जगहों पर तिब्बती शरणार्थियों को रखा गया, जिनमें छत्तीसगढ़ भी शामिल है। इसके बाद म्यांमार के शरणार्थी भी बरसों से भारत मेें रहते आ रहे हैं जो कि रोहिंग्या मुस्लिम नहीं थे, और बौद्ध धर्म के भी थे। फिर 1971 की याद सबको है जब पाकिस्तान की सरकार पूर्वी पाकिस्तान के इलाके में जुल्म ढा रही थी, और वहां से लाखों शरणार्थी भारत में आ रहे थे, तब भारत ने न सिर्फ उन्हें जगह दी, उन्हें बसाया, बल्कि एक फौजी दखल देकर पूर्वी पाकिस्तान के इलाके में पाकिस्तानी फौज को टक्कर दी, उसका आत्मसमर्पण करवाया, और बांग्लादेश बनवाया। भारत में दूसरे और कई देशों के शरणार्थियों को जगह दी गई जिनमें फिलीस्तीन से आने वाले छात्र-छात्राओं को कॉलेजों में दाखिला भी दिलवाया गया।
आज भारत की सरकार अगर महज एक कारोबारी की तरह नफा-नुकसान देखते हुए, हिसाब करके इंसानियत को भूल जाएगी, तो यह बात भी इतिहास में दर्ज होते चल रही है। भारत को एक बड़े देश की जिम्मेदारी निभाते हुए, और अपने गौरवशाली इतिहास का ध्यान रखते हुए म्यांमार के शरणार्थियों को जगह देनी चाहिए। ऐसा न करके भारत इतिहास में अपनी जगह खोने जा रहा है। 

सूक्तियों से मिले साहस से ही चल सकती है सच की लड़ाई

18 सितंबर 2017

बहुत से अखबारनवीसों से लेकर अखबारों में हर हफ्ते कॉलम लिखने वालों तक और सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति या विचार के लिए अभियान चलाने वालों तक, कलम के सिपाहियों से लेकर कलम के भाड़े के हत्यारों तक, इनका हौसला थकता ही नहीं है। वे पूरे वक्त अपने मकसद के लिए, या कि अपने रोजगार के लिए जुटे रहते हैं, और ऐसा करते हुए वे सच और झूठ का फर्क करने में अपना वक्त बर्बाद नहीं करते। जब हिटलर के सूचना मंत्री से लेकर अब तक यह माना जाता है कि एक झूठ को अगर काफी बार दुहरा दिया जाए, तो वह सच में तब्दील होने लगता है, या कम से कम सच का एहसास तो कराने लगता है। नतीजा यह है कि लोग सोचे-समझे, मकसदभरे झूठ को बार-बार दुहरा कर उससे सच बनाने में लगे रहते हैं। लोग झूठ को पकड़ भी लेते हैं, तो भी उन्हें शर्म नहीं लगती, क्योंकि वे शर्मिंदगी के हकदार अकेले नहीं रहते, और उनकी तरह और बहुत से लोग इसी काम में लगे रहते हैं।

लेकिन सच के बारे में यह कहा जाता है कि उसे अपने अस्तित्व को साबित करने में देर लगती है, खासी देर लगती है, बड़ी मेहनत भी लगती है, लेकिन फिर भी वह साबित तो हो ही जाता है, और आखिर में वह खड़ा रहता है। सवाल यह है कि यह खासी देर कितनी लंबी होती है, और इस बीच में झूठ की फसल जंगल की घास की तरह कितनी फैल चुकी रहती है, और आम लोग उस घास में कितने उलझते चलते हैं, उसके आरपार सच को देखने में उन्हें कितना वक्त लग जाता है, ये तमाम बातें परेशान करती हैं।
फिर दूसरी बात यह भी कि झूठ का कारोबार करने वालों के पास झूठों की फौज की एक वर्दी भी होती है, और टोली की ताकत भी। ऐसी गिरोहबंदी के मुकाबले सच बोलने वाले अक्सर किसी हमलावर मकसद के बिना होते हैं, उन्हें किसी वर्दी की ताकत भी नहीं होती, और न ही किसी गिरोह से उन्हें हिफाजत मिली होती है। नतीजा यह होता है कि सच का झंडा लेकर चलने वाले अक्सर अकेले दिखते हैं, और बहुतों को यह भी लगता है कि उनमें कोई दिमागी नुक्स है कि वे चैन से बैठने के बजाय यूं बेचैन फिरते हैं। आमतौर पर सच के लिए लडऩे वाले ऐसे लोग दुनिया में अकेले पडऩे लगते हैं, और बहुत से मामलों में सच की तकलीफ का बोझ उठाते परिवार के भीतर भी वे अकेले होने लगते हैं।
जिस तरह विज्ञान कथाओं की कुछ फिल्मों में मशीनी मानव दिखाए जाते हैं कि किस तरह वे गिनती में बढ़ते चलते हैं, और फौज सरीखे होकर इंसानों पर टूट पड़ते हैं, कुछ उसी तरह झूठ के भाड़े के हत्यारे फायदा पाते हुए इन दिनों सोशल मीडिया पर हमलावर बने हुए हैं, और पैसों की ताकत से उनकी गिनती बढ़ती चल रही है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने मिलकर विचारों के मुकाबले को ऐसा बना रखा है कि स्टेडियम में बैठे, मुकाबला देखते लोगों की गिनती फरेब की तरह बढ़ाकर दिखाई जा सकती है, और जनमत के आकार को अंधाधुंध बड़ा या छोटा साबित किया जा सकता है। यह कुछ उसी तरह का है जिस तरह कि कसरत की कुछ मशीनों, या शरीर को किसी आकार में ढाल देने का दावा करने वाले खाने-पीने के सामानों के इश्तहार होते हैं, जो कि हकीकत से परे हसरत की तस्वीरें दिखाते हैं, और ग्राहक जुटाते हैं।
सच और झूठ पर भरोसा रखने वाले लोगों की अलग-अलग गिनती भी मुमकिन नहीं होती, क्योंकि झूठ का झंडा लेकर चलने वाले बहुत से लोगों को भी इस बात का एहसास होता है कि असल में सच क्या है। वे झंडे के झूठ पर सचमुच ही खुद भरोसा नहीं करते, लेकिन एक पेशे की तरह, या कि एक नफरतजीवी मकसद के चलते वे उस झूठ को सच करार देते हुए एक अभियान चलाते हैं। ऐसे लोगों को झूठ पर भरोसा रखने वाला नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वे झंडा तो झूठ का लिए चलते हैं, लेकिन अपने मन के भीतर उन्हें हकीकत का सच भी मालूम होता है। इसलिए सोशल मीडिया पर जो दिखता है, या कि आज के मीडिया के टीवी स्क्रीन पर, अखबारी पन्नों पर जो दिखता है, जरूरी नहीं है कि लिखने और लिखाने वाले लोगों का खुद का उस पर भरोसा हो। यह बात सही है कि मीडिया के एक बड़े तबके के लिए प्रॉस्टीट्यूट जैसी गाली जोड़कर, प्रेस को प्रेस्टीट्यूट करार देने का काम मोदी सरकार के एक बड़बोले फौजी बददिमागी मंत्री जनरल वी.के. सिंह ने किया था, लेकिन आज मीडिया और सोशल मीडिया की जो हालत है, उसमें यह शब्द बहुत नाजायज नहीं है, यह एक अलग बात हो सकती है कि कौन सा तबका इस शब्द का ज्यादा बड़ा हकदार है। यह तमगा उन लोगों पर बेहतर सजता है जो रोज झूठ का गुब्बारा फुलाने के कारोबार में लगे हुए हैं।
अभी मुझे इस बात का ठीक-ठीक अंदाज नहीं है कि मीडिया और सोशल मीडिया पर सच और झूठ को देख और सुनकर पाठकों और दर्शकों का कितना हिस्सा झूठ-सच का फर्क कर पाता है, और कितना झांसे में आ जाता है। यह अंदाज इसलिए आसान नहीं है कि विचारधारा को समर्पित, नफरतजीवी, किसी नामौजूद दुश्मन के खिलाफ लडऩे को आमादा लोग जब किसी झूठ को सच मानते हुए दिखते हैं, तो यह समझ नहीं पड़ता कि वे झूठ को सचमुच सच मान रहे हैं, या कि वे उसे सच मानते हुए दिखना भर चाहते हैं। यह पूरा सिलसिला कुछ जटिल है, और कुछ उलझा हुआ है, बदनीयत से लदा हुआ है, और अनुपातहीन अधिक ताकत से लैस भी है। इसलिए किसी संक्रामक रोग की तरह, किसी कम्प्यूटर वायरस की तरह, गणेश के दूध पीने की अफवाह की तरह, झूठ पर जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे, सच की तरह, सच मानकर भरोसा करने वाले लोगों के बीच फर्क कर पाना नामुमकिन सा है।
लेकिन इंसानी सोच में जो एक आम बात है, उसके मुताबिक नफरत लोगों को बड़ी रफ्तार से जोड़ लेती है। मोहब्बत जब तक प्रेम का ढाई आखर लिख पाती है, तब तक नफरत झूठ के पर्चे छापकर शहर के हर चौराहे पर बांट चुकी होती है। सच को सोशल मीडिया की जंग के लिए मानो 80 रूपए लीटर का पेट्रोल मिलता है, और झूठ को अपनी लड़ाई के लिए 31 रूपए लीटर मिल जाता है जो कि दुनिया के बाजार में उसकी कीमत है। यह गैरबराबरी की लड़ाई कई बार सच का हौसला पस्त करती है, और वैसे में सच को लेकर कही गई सूक्तियां काम आती हैं जो हौसले को चार कदम और चलने को कहती हैं। लेकिन सच यह है कि ऐसे चार कदम उस डॉक्टरी दिलासे की तरह रहते हैं जो कि चार हफ्ते बाद कटने वाले प्लास्टर को लेकर मरीज को बस कुछ दिन और का भरोसा दिलाते चलते हैं। गैरबराबरी की यह लड़ाई अंतहीन भी दिखती है, लेकिन दुनिया का इतिहास गवाह है कि कोई लड़ाई कभी अंतहीन नहीं होती।

देश में वीआईपी अदालतों की तुरंत जरूरत है इंसाफ के लिए

संपादकीय
18 सितंबर 2017


जिस तरह हिंदुस्तान की राजनीति में होता है, ठीक उसी तरह पड़ोस के पाकिस्तान में भ्रष्टाचार की वजह से हटाए गए प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पत्नी ने उनकी सीट से उपचुनाव जीतने के बाद कहा। उन्होंने कहा कि जनता की अदालत में सुप्रीम कोर्ट का फैसला खारिज हो गया है, और जनता की नजर में आज भी नवाज शरीफ प्रधानमंत्री है। भारत में अधिकतर नेता भ्रष्टाचार के मामलों में, या दूसरे खूंखार अपराधों में फंसने पर भी यही तर्क देते हैं कि वे अदालती फैसले के खिलाफ जनता की अदालत में जाएंगे। दूसरी तरफ जब जनता की अदालत उन्हें खारिज कर देती है, तो वे कानून या चुनाव आयोग की अदालत में जाने की बात करने लगते हैं। कुल मिलाकर बात यह है कि धरती पर उपलब्ध किसी भी तरह की अदालत से अपनी मनमर्जी का फैसला मिलने तक वे अपनी लड़ाई जारी ही बताते हैं।
हमारा यह मानना है कि जिस तरह पाकिस्तान की अदालत ने भ्रष्टाचार के मामले में प्रधानमंत्री को हटाने की हिम्मत दिखाई है, भारत की अदालतों को भी ताकतवर तबकों के मामलों में हिम्मत दिखाने की जरूरत है। आज तो हालत यह है कि नेताओं की कुछ बरसों में ही आसमान पर पहुंच गई दौलत का हिसाब मांगने पर भी सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग या सरकार नजरें चुरा रहे हैं। लोग इस बात की खुलकर चर्चा भी नहीं करना चाहते कि नेताओं के पास अनुपातहीन दौलत आई कहां से है? ऐसे में न तो भ्रष्टाचार कम होने का कोई आसार है और न ही चुनावों में कालाधन कम हो सकता, सत्ता पर बैठे हुए लोगों के अपराध भी कम नहीं हो सकते।
पहली बार भारतीय सुप्रीम कोर्ट में यह सोच सामने आई है कि नेताओं की अनुपातहीन संपत्ति के मामले 3 या 6 महीने में निपटाए जाएं। हम बरसों से यह मांग कर रहे हैं कि देश में ऐसी वीआईपी अदालतें बनाई जानी चाहिए, जहां पर सांसद- विधायक, या उनके और उनके ऊपर के निर्धारित दर्जों के लोगों के भ्रष्टाचार के मामलों की सुनवाई तेजी से हो। ऐसा न होने पर किसी भी तरह के अपराध के मामले निपट ही नहीं पाते हैं, अगर उनमें किसी ताकतवर नेता या अफसर को सजा का खतरा दिख रहा हो। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, क्योंकि ताकतवर लोग अगर मुजरिम हैं, और वे सत्ता पर भी हैं, तो वे आम नागरिकों के मुकाबले हजारों गुना अधिक बड़े जुर्म करने की ताकत रखते हैं। इसलिए देश में आम और खास का फर्क अगर करना हो, तो अदालती सुनवाई में सबसे पहले करना चाहिए। ऐसी फास्टट्रैक अदालतें तुरंत बनानी चाहिए, जो कि बड़े अफसर, बड़े नेता, बड़े जज और एक सीमा से अधिक सम्पन्नता वाले लोगों के मामलों को सुने। 

चाहे जिसे नफा-नुकसान हो कुनबापरस्ती पर चर्चा हो...

संपादकीय
17 सितंबर 2017


अभी अमरीका के एक बड़़े प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में राहुल गांधी ने अपने भाषण के बीच भारत के वंशवाद को लेकर कुछ बातें कहीं, जो कि उनकी अपनी वंशवादी विरासत की वकालत करने वाली भी थीं, और भारतीय राजनीति से लेकर भारतीय फिल्मों तक अलग-अलग तरह के वंशवाद का जिक्र करने वाली भी थीं। नतीजा यह निकला कि इन दिनों ट्विटर पर मुखर ऋषि कपूर ने तुरंत ही जवाबी हमला किया, और उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने राहुल के बयान का जिक्र किए बिना वंशवाद पर कहा- मैं पहले भी यह बात कहते आया हूं, लेकिन अब यह बात कहने में हिचकिचा रहा हूं क्योंकि अब मैं राजनीति से बाहर हूं। भारतीय लोकतंत्र में डायनेस्टी (वंशवाद) नेस्टी (शरारती, बुरा, अप्रिय, बदमजा) है लेकिन यह कुछ लोगों को टेस्टी (मजेदार) लगता है, और यह हमारे लोकतंत्र की कमजोरी है। उनके इस बयान को लेकर कांग्रेस पार्टी के कुछ नेताओं ने उन पर हमला करना शुरू कर दिया है और उन्हें याद दिलाया है कि उपराष्ट्रपति बनने के बाद उन्हें दलगत राजनीति में इस तरह की अवांछित बातें नहीं करनी चाहिए, वरना दूसरे लोग भी उनके प्रति एक संवैधानिक शिष्टाचार और सम्मान भूल जाएंगे।
वेंकैया नायडू के बयान में ऐसी कोई बुरी बात नहीं है जो कि उपराष्ट्रपति के ओहदे के खिलाफ जाती हो। कुनबापरस्ती की तोहमत अकेली कांग्रेस पार्टी पर नहीं लगती है, यह देश के दर्जनों नेताओं की दर्जन भर से अधिक पार्टियों पर माकूल बैठने वाली तोहमत है, और लोकतंत्र के भीतर इसकी चर्चा करना नाजायज नहीं है। कांग्रेस तो देश की सबसे बड़ी कुनबापरस्त पार्टी होने के नाते वंशवाद की तोहमत सबसे अधिक झेलने की सबसे अधिक हकदार पार्टी है ही, लेकिन वह अकेली नहीं है, और कुनबापरस्ती के मामले में सबसे बुरी भी नहीं है। इसका एक लंबा इतिहास है, जिसे या तो कैलेंडर के मुताबिक देखा जा सकता है, या कि देश के नक्शे के मुताबिक देखा जा सकता है जो कि शायद अधिक आसान होगा। बात कश्मीर से शुरू करें, तो वहां अभी दूसरी पीढ़ी की मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने तीसरी पीढ़ी के मुख्यमंत्री से सत्ता हासिल की है। वहां से जरा नीचे उतरें, तो पंजाब की कुख्यात कुनबापरस्ती है जिसमें प्रदेश के हितों पर लंबे अरसे से काले बादल छाए हुए हैं, और उनके दामाद तक छाए हुए हैं जो कि हर तरह की तोहमतों से घिरा हुआ कुनबा रहा है। इसी पंजाब से जो हरियाणा अलग राज्य बना है, उस हरियाणा में कुनबापरस्ती न सिर्फ कांग्रेस की रही है, बल्कि उसका दूसरा सबसे बड़ा कुनबा, चौधरी देवीलाल, उनकी औलादें अभी जेल में हैं, मुख्यमंत्री रहते हुए किए गए अपने बड़े भयानक भ्रष्टाचार की वजह से, और बाहर लोगों का अंदाज है कि हजारों करोड़ की दौलत मालिक के बरी होकर आने की राह देख रही है। बगल के उत्तराखंड में जाएं तो कांग्रेस की कुनबापरस्ती भाजपा तक फैली हुई दिखती है, इंदिरा के मंत्री रहे हेमवतीनंदन बहुगुणा के बेटा-बेटी कांग्रेस को खून निकलने तक दुहकर अब उसे डुबाकर दोनों ही भाजपा में चले गए हैं।
यहां से कुछ आगे बढ़ें तो बिहार में लालू यादव की भयानक अश्लील कुनबापरस्ती है जिसमें परिवार से बाहर किसी लोकतंत्र की कोई गुंजाइश नहीं है। बगल के उत्तरप्रदेश में मुलायम सिंह का कुनबा इस तरह सत्ता पर काबिज रहा और उसे इस तरह जकड़कर बैठा रहा कि कुनबे के भीतर ही विपक्ष भी खड़ा होने लगा, और कई रगों का एक ही खून बिखरने लगा। लेकिन एक दूसरी कुनबापरस्ती को भी देखने की जरूरत है जो कि उत्तरप्रदेश में सत्ता पर काबिज रह चुकीं मायावती की है। बहुजन समाज पार्टी में अपने नेता कांशीराम की सबसे करीबी रहते हुए मायावती ने एक नए राजनीतिक कुनबे की विरासत पाई, ठीक उसी तरह की जिस तरह कि दूर दक्षिण में एमजीआर से उनकी सबसे करीबी जयललिता ने पाई थी। यहां पर कुनबे का रक्त संबंध धरा रहा, और उससे परे सबसे करीबी को विरासत मिली जिससे कि पार्टी उसी एक कमरे में जारी रही।
पूरब की तरफ आगे बढ़ते हुए पहले अगर मध्यप्रदेश को देखें तो बड़े लंबे समय तक रविशंकर शुक्ल और उनके दो बेटे, अर्जुन सिंह और उनका बेटा, दिग्विजय सिंह और उनके भाई, ऐसे ढेरों परिवार सत्ता पर काबिज रहे। कुछ नीचे ओडिशा में पटनायक परिवार की दूसरी पीढ़ी चल रही है, उधर पश्चिम में जाएं तो महाराष्ट्र में  पवार से लेकर दूसरे अनगिनत कुनबे दूसरी और तीसरी पीढ़ी की राजनीति कर रहे हैं। आन्ध्र में कांग्रेस विरोधी राजनीति करने वाले एन.टी. रामाराव का दामादवाद आज राज कर रहा है, और उसका बेटावाद सत्ता में दाखिल हो चुका है। यह लिस्ट पूरी नहीं बन सकती क्योंकि यहां जगह सीमित है, और नेताजी की अंतिम इच्छा, मेरे बाद मेरा बच्चा, यह हसरत भारतीय लोकतंत्र में असीमित है।
भारतीय जनता पार्टी के भीतर गिनाने के लिए सिंधिया जैसे दो-चार परिवार हो सकते हैं जिनकी दूसरी पीढ़ी राजनीति में है, लेकिन पूरी की पूरी पार्टी कभी भी किसी एक परिवार की गुलाम नहीं रही, और वंशवाद से मोटे तौर पर आजाद रही। इसलिए भाजपा से आए हुए वेंकैया नायडू किसी पार्टी पर हमला न करते हुए भी पूरी ईमानदारी से वंशवाद के खिलाफ सोच सकते हैं, और बोल सकते हैं, उसमें न कुछ नाजायज है, न कुछ अटपटा है, और न ही कुछ कांग्रेस पार्टी के अकेले के खिलाफ है। उपराष्ट्रपति बनने का यह मतलब नहीं है कि भारतीय लोकतंत्र को जो बातें खाए जा रही हैं, उनके बारे में चर्चा न की जाए। ऊपर हमने कुनबापरस्ती की जो लंबी लिस्ट गिनाई है, उसमें से बहुत से लोग वेंकैया नायडू की पिछली पार्टी, भाजपा के सहयोगी दलों की है। अगर किसी बहाने से ही सही, भारत की राजनीति में कुनबापरस्ती के खिलाफ एक चर्चा छिड़ सकती है, जिससे कि एक जनमत तैयार हो, तो उससे चाहे जिसे नफा हो, चाहे जिसे नुकसान हो, वह होना चाहिए। 

धर्म बेजुबान नन्हें बच्चों के हित ऊपर रखे, और संन्यास को नीचे

संपादकीय
16 सितंबर 2017


मध्यप्रदेश के नीमच के एक जैन पति-पत्नी की खबर पिछले दो-तीन दिनों से अखबारों में है कि वे तीन बरस की बेटी और सैकड़ों करोड़ की संपत्ति छोड़कर साधु-साध्वी जीवन अपनाने जा रहे हैं। जैन समाज में कम उम्र में संन्यास ले लेना अनोखी बात नहीं है, और किसी भी दूसरे धर्म के मुकाबले इस धर्म में ऐसी घटनाएं अधिक होती हैं। कुछ मामलों में तो समाज के भीतर, और समाज के बाहर से भी इस बात का विरोध हुआ कि किस तरह नाबालिग बच्चे संन्यास ले लेते हैं। कई बरस पहले नौ बरस की एक बच्ची जब जैन साध्वी बनी, तो लोग उसके खिलाफ अदालत तक गए थे, और इस प्रथा को अमानवीय बताया था।
लेकिन इस ताजा समाचार में एक दूसरी बात सोचने की है क्योंकि ये पति-पत्नी तो बालिग हैं, और उन्होंने सोच-समझकर पिछले कुछ बरसों से लगातार इस सन्यास की तरफ कदम बढ़ाना शुरू कर दिया था। अब सवाल यह उठता है कि तीन बरस की बेटी को उसके नाना के हवाले करके संन्यास लेने से क्या उस बच्ची के कुछ अधिकारों का भी हनन होता है? अभी हमें जितना याद पड़ता है, ऐसा कोई मामला कानून की अदालत में बहस में आया नहीं है जिसमें मां-बाप को कटघरे में खड़ा किया जाए कि वे बच्ची को छोड़कर कैसे जा सकते हैं? दूसरा यह भी है कि संन्यास की इन खबरों की वजह से तो यह सार्वजनिक रूप से घोषित और स्थापित हो गया है कि वे बच्ची को नाना के हवाले कर रहे हैं, वरना दूसरे बहुत से ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें मां-बाप बच्चों को बेच भी देते हैं, या कि उन्हें अनाथाश्रम में छोड़ देते हैं, या कि सड़कों पर ही छोड़कर चले जाते हैं, ट्रेन में बिठाकर चले जाते हैं। बच्चों की बिक्री से परे, बच्चों को छोड़ देने का कोई और तरीका अब तक सामने आया नहीं है जिसमें मां-बाप के खिलाफ कोई जुर्म बना हो। लेकिन बहुत सी बातें जो कि कल तक जुर्म नहीं रहती थीं, वे अब जुर्म के दायरे में आती हैं, और लोगों को याद होगा कि एक समय सतीप्रथा को पूरी तरह से सामाजिक मान्यता प्राप्त थी, लेकिन बाद में उसे जुर्म करार दिया गया।
इस नौजवान शादीशुदा जोड़े के संन्यास को लेकर यह सवाल उठता है कि क्या किसी धर्म या सम्प्रदाय में इतनी कम उम्र के बच्चों को दूसरों के भरोसे छोड़कर औपचारिक और घोषित संन्यास लेने को पंथ की मान्यता होनी चाहिए? मां-बाप में से कोई एक संन्यास ले तो दूसरे के भरोसे बच्चे की जिम्मेदारी हो सकती है, लेकिन दोनों ही एक साथ चले जाएं, तो उससे बच्चे पर, उसके रख-रखाव पर कैसा फर्क पड़ेगा यह सोचने की जरूरत है। हमारा यह मानना है कि धार्मिक रीति-रिवाज भी समय के साथ-साथ बदलते हैं, और देश और दुनिया में बदलती हुई सोच को देखते हुए भी कई धार्मिक प्रथाओं में बदलाव लाया जाता है। मुस्लिमों में हज पर जाने के लिए नियमों की एक लंबी लिस्ट है जिसे पूरा करने पर ही लोग हज जा सकते हैं। इसमें पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करना, परिवार की आर्थिक स्थिति इस तीर्थयात्रा के लायक रहना, और इस तरह की बहुत सी और बातें हैं जो कि पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करने के बाद ही धार्मिक मान्यता को पूरा करने की इजाजत देती हैं। हमारा ख्याल है कि नाबालिग बच्चों के संन्यास लेने पर पूरी रोक रहनी चाहिए, और बच्चों को इतनी कम उम्र में छोड़कर मां-बाप के संन्यासी बनने पर भी रोक रहनी चाहिए। आज किसी भी धर्म का काम किसी एक जोड़े के बिना चल सकता है, लेकिन किसी बच्चे का काम उसके मां-बाप के बिना नहीं चल सकता। इसलिए जब किसी धर्म पर यह जिम्मेदारी रहती है कि वह किन लोगों को संन्यास दिलाए, तो उसे जिम्मेदारी से यह सोचना-विचारना चाहिए कि किन लोगों को किन जिम्मेदारियों के पूरे हो जाने के बाद ही संन्यास की इजाजत दी जाए।
हम इस एक मामले को महज मिसाल के तौर पर लेकर यह चर्चा कर रहे हैं, और हमें इस परिवार के भीतर इस बच्ची के रख-रखाव को लेकर अलग से कोई जानकारी नहीं है। इस बच्ची के दोनों तरफ परिवार हैं, और संपन्न परिवार हैंं, इसलिए यह मामला उसे बेसहारा छोड़ देने जैसा नहीं है, लेकिन मां-बाप के जिंदा रहते मां-बाप के साए से एकदम इस तरह से अलग कर देना हमारे हिसाब से उस बच्ची के बुनियादी अधिकारों को छीनने सरीखा है, और किसी भी धर्म को ऐसा नहीं करना चाहिए। ऐसे लोगों को धर्म यह कह सकता है कि वे अपनी बच्ची के बालिग होने का इंतजार करें, और उसके बाद संन्यास के बारे में सोचें। संन्यासियों की कमी से किसी धर्म का काम ऐसा नहीं रूकता है कि एक जोड़ा पति-पत्नी संन्यासी न बनें तो धर्म का नुकसान हो जाएगा। इसलिए धर्म को सबसे पहले उस छोटी बच्ची के भले के बारे में सोचना चाहिए जो कि न अपनी मर्जी से इस दुनिया में आई है, और न ही मां-बाप को रोकने की उसकी कोई क्षमता है। जैन धर्म बड़ा अहिंसक माना जाता है, और हवा में न दिखने वाले कीटाणुओं तक को तकलीफ न देने की कोशिश करता है। ऐसे धर्म को अपने समुदाय के बेजुबान नन्हें बच्चों के हित को सबसे ऊपर रखना चाहिए, और संन्यास को उसके बहुत नीचे।

ऐसा होने पर गधे गाली खाने से बचेंगे, और बाबा लोग जेल...

संपादकीय
15 सितंबर 2017


अभी देश में यह बहस चल रही है कि कौन बाबा असली है, और कौन नकली। कुछ बाबाओं ने एक बैठक करके कुछ दूसरे बाबाओं को नकली घोषित कर दिया, तो जवाब में मानहानि के नोटिस की चर्चा है। अब एक नाबालिग के साथ बलात्कार के आरोप में बरसों से जेल में बंद, एक वक्त बापू कहलाने वाले, आसाराम से अभी मीडिया ने पूछा कि वे किस श्रेणी के बाबा हैं। तो इसके जवाब में आसाराम ने कहा कि वे गधों की श्रेणी में आते हैं। बरसों से जेल में बंद एक बुजुर्ग का आपा खोना समझ में आता है क्योंकि आराम और इज्जत की लंबी जिंदगी के बाद जब ऐसी जेल नसीब होती है, और आगे का भविष्य अंधकारमय दिखता है, तो कोई भी अपना आपा खो सकते हैं। लेकिन फिर भी गधे से अपनी तुलना करना ठीक नहीं है, क्योंकि दुनिया में किसी भी गधे पर कभी बलात्कार का कोई मुकदमा नहीं चला है, और इंसानों से परे जानवरों की दुनिया में न तो इस तरह के बलात्कार होते हैं, और न ही जानवर अपनी प्रजातियों के नाबालिग बच्चों से ऐसी हरकत करते हैं। फिर भी जानवरों के अधिकारों के लिए लडऩे वाले लोग अब तक महज उनके साथ हिंसा के मामलों को लेकर लड़ते हैं, उन्हें गाली देने वाले लोगों के खिलाफ मुकदमा लडऩे का समय अभी किसी के पास आया नहीं है।
लेकिन आसाराम ने चाहे झल्लाहट में यह बात कही हो, और चाहे अपने को गधा कहने के पीछे उनकी नीयत गधे को एक बेवकूफ जानवर साबित करने की रही हो, हकीकत यही है कि सेक्स के बहुत से अपराधों में जो लोग पकड़ाते हैं, वे गधे तो नहीं रहते, बेवकूफ जरूर रहते हैं। आज हिन्दुस्तान में सेक्स की खरीद-बिक्री गैरकानूनी है, और इस पर सजा हो सकती है। लेकिन दुनिया के दर्जनों ऐसे देश हैं जहां पर इसे कानूनी दर्जा मिला हुआ है, और बैंकाक जैसे भारत के पास के कुछ देश ऐसे भी हैं जहां पर सेक्स-पर्यटन एक बड़ा कारोबार है। ऐसे में भारत के जो अतिसंपन्न लोग हैं, वे अगर अपनी सेक्स-जरूरतों के लिए नाबालिग लड़कियों या अनुयायी महिलाओं पर हमला करते हैं, तो इसके बजाय बेहतर यह होता कि वे दुनिया के दूसरे देशों में चले जाते, और वहां सेक्स खरीदकर अपनी जरूरत पूरी कर लेते। इससे भारत में उनका आडंबर भी बचे रह जाता, भारत की मासूम बच्चियां भी बची रह जातीं, और दुनिया के दूसरे देशों में सेक्स-कर्मियों को एक ग्राहक भी मिल गया होता। हमको इस बात का पक्का भरोसा है कि अगर इन बाबाओं जितनी दौलत किसी गधे के पास होती, और उस गधे की ऐसी सेक्स जरूरतें होतीं, तो वह गधा उन देशों में चले जाता जहां सेक्स खरीदना कानूनी है, और मजे करके लौट आता। लेकिन इंसानों में समझ गधे से कुछ कम ही है, इसलिए सैकड़ों करोड़ की, शायद हजारों करोड़ की दौलत वाले लोग भी बलात्कार के जुर्म में जेल में हैं।
दरअसल होता यह है कि जब किसी बहुत कामयाब और मशहूर, लोकप्रिय या भक्तों से घिरे हुए इंसान को कानून का खतरा समझना बंद हो जाता है, तो फिर वे ऐसी चूक कर बैठते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि देश का कानून उनके ऊपर लागू नहीं होता। ऐसी बददिमाग और बेदिमाग ताकत दुनिया के दूसरे देशों में इस्तेमाल नहीं होती, खासकर जहां पर लोकतंत्र मजबूत है, और अदालतों को खरीदना मुमकिन नहीं है। यही वजह है कि भारत में लोकतंत्र की कमजोरी की वजह से अरबपति-खरबपति लोग भी बलात्कार के मामलों में जेल में हैं। हमारी सलाह तो देश की सरकार और जनता को यह है कि वेश्यावृत्ति को भारत में कानूनी दर्जा देना चाहिए, ताकि ऐसे संभावित बलात्कारियों से बाकी लोगों को बचाव मिल सके। वेश्यावृत्ति को कानूनी बनाने से वेश्याओं को भी बहुत बड़ी सामाजिक और कानूनी सुरक्षा मिलेगी जो कि आज बिल्कुल भी नहीं है। आज पुलिस, दूसरे सरकारी अमले, इलाके के गुंडे, और कई मामलों में स्थानीय नेता, ये सब वेश्याओं से उगाही करते हैं, और अपना बदन बेचकर मिलने वाली उसकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा इन लोगों पर लुट जाता है। इसलिए सेक्स-अपराधों को घटाने के लिए, और सेक्स-कर्मियों को सुरक्षा देने के लिए भारत में वेश्यावृत्ति को कानूनी बनाने की जरूरत है। कहने के लिए हिन्दुस्तान की संस्कृति में भी नगरवधुओं की पुरानी परंपरा है, और सैकड़ों बरस से इसे दुनिया का सबसे पुराना पेशा कहा भी जाता है, लेकिन सरकारों में इतना नैतिक साहस नहीं रहता है कि वे वेश्यावृत्ति को कानूनी बनाने जैसा फैसला ले सकें। ऐसा होने पर गधे गाली खाने से बचेंगे, और बाबा लोग जेल जाने से। 

दानवाकार बुलेट ट्रेन योजना गरीब देश की प्राथमिकता?

संपादकीय
14 सितंबर 2017


मुंबई से अहमदाबाद के बीच चलने के लिए देश की पहली बुलेट ट्रेन का भूमिपूजन आज जापान और भारत के प्रधानमंत्रियों ने मिलकर अहमदाबाद में किया। बुलेट ट्रेन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की शुरुआती घोषणाओं में से एक थी और इसे भारत के बहुत से अर्थशास्त्री और जानकार लोग एक दैत्याकार और बिना जरूरत का अहंकार भी बताते हैं। कई लोगों ने विश्लेषण करके यह बताया है कि मुंबई और अहमदाबाद के बीच अनगिनत उड़ानें हैं, और रेलगाडिय़ां हैं। पांच बरस बाद जब बुलेट ट्रेन एक लाख दस हजार करोड़ की लागत से शुरू होगी, तब उसकी रफ्तार आज की ट्रेन और आज की प्लेन के बीच की होगी, और ऐसा ही उसका भाड़ा होगा, हवाई किराए से थोड़ा कम। लोग इस बात पर हैरान हैं कि इतनी बड़ी लागत केवल समय को कम करने के लिए लगाना क्या ठीक है? लेकिन दूसरी तरफ प्रधानमंत्री सहित कुछ दूसरे समर्थकों का यह कहना है कि बुलेट ट्रेन से इन दो महानगरों के बीच के दस और शहर भी जुड़ेंगे, और इन दर्जन भर शहरों की जिंदगी, उनके रोजगार, और उनके कारोबार पर बहुत बड़ा असर पड़ेगा। मोदी का यह भी कहना है कि जितने कम ब्याज पर, लगभग बिना ब्याज के यह पूरा प्रोजेक्ट जापान से बहुत रियायती किश्तों पर मिल रहा है, और भारत को मानो यह मुफ्त ही मिल रही है। उनका यह भी अंदाज है कि इससे सीधे-सीधे और आर्थिक गतिविधियां बढऩे से दसियों हजार रोजगार बढ़ेंगे, और देश में एक नई टेक्नॉलॉजी भी आ जाएगी।
हमारा ख्याल है कि ऐसे दानवाकार प्रोजेक्ट लोगों की जिंदगी में कोई अभूतपूर्व और नई सहूलियत लाने वाले हों, तो उनका एक महत्व हो सकता है। लेकिन महज समय घटाना अभूतपूर्व नहीं कहा जा सकता। आज देश में निजी विमान कंपनियां आने वाले बरसों में सैकड़ों विमान अपने बेड़े में जोडऩे जा रही हैं। आज भी हवाई सफर का मुकाबला बहुत से लोगों के फायदे का साबित हो रहा है, और विमानतलों पर मध्यम वर्ग के लोगों की भीड़ दिखती है। दूसरी तरफ रेलगाडिय़ों के भाड़े को इस तरह से बढ़ाया गया है कि बहुत सी गाडिय़ों में भाड़ा विमान से भी अधिक पडऩे लगा है, और वे खाली चलने लगी हैं। इसलिए ट्रेन और प्लेन का यह मुकाबला पांच बरस में खुले बाजार के मुकाबले के चलते कहां पहुंचेगा इसका कोई ठिकाना नहीं है। फिर मोदी की यह बात सही नहीं है कि यह ट्रेन भारत को मुफ्त में मिल रही है। यह ट्रेन भारत को कुल एक फीसदी ब्याज पर मिल रही है, इतना ही ठीक है, बाकी तो सच यह है कि जापान अगले पचास बरस तक भारत से इस कर्ज को वसूलता रहेगा, और इस पूरी बुलेट ट्रेन योजना को जापान ही बनाने जा रहा है जिससे वहां की कंपनियों को सीधे कारोबार मिलेगा, वहां के हजारों लोगों को रोजगार मिलेगा, और यह एक कारोबारी-साहूकार की लुभावनी योजना सरीखी है।
अब जब यह साफ है कि भारत अगले पचास बरस तक इस एक लाख दस हजार करोड़ के कर्ज को पटाते रहेगा, तो यह पैसा मोदी के बाकी कार्यकाल के बाद भी सैंतालीस बरस तक पटाया जाता रहेगा। और इतनी बड़ी लागत से देश में और कौन-कौन सी उत्पादक योजनाएं बन सकती थीं जिनसे करोड़ों लोगों को रोजगार मिलता, और हजारों करोड़ का मुनाफा भी हुआ रहता। भाजपा और मोदी सरकार बार-बार यह कहते हैं कि सरकार को कोई भी कारोबार नहीं करना चाहिए, और सारे कारोबार का निजीकरण होना चाहिए, ऐसे में सरकार देश का यह सबसे बड़ा अकेला कारोबार शुरू करने जा रही है जिससे मुंबई-अहमदाबाद के बीच महज कुछ हजार मुसाफिर ही तेज सफर का फायदा रोज पाएंगे, बाकी लोगों के लिए तो इससे धीमी ट्रेन भी बनी रहेगी, और इससे तेज प्लेन भी बने रहेंगे, और इन दोनों की गिनती भी 2022 तक बढ़ती भी रहेगी। यह लागत देश में सिर्फ रफ्तार बढ़ाने के लिए बहुत अधिक लग रही है, और सरकार का इससे रोजगार-कारोबार बढऩे का अंदाज कहीं वैसा ही साबित न हो जैसा कि नोटबंदी से कालेधन के सामने आने और देश की कमाई होने का अंदाज पूरी तरह, और बुरी तरह गलत साबित हुआ। किसी नेता या सरकार की निजी प्रतिष्ठा के लिए तो ऐसी दानवाकार योजना ठीक हो सकती है कि इतिहास में वह उनके नाम से दर्ज होगी, लेकिन देश की आम जनता के लिए इतनी बड़ी रकम की कोई योजना जब तक ठोस फायदे साबित करने वाली न हो, वह देश की प्राथमिकता नहीं हो सकती है। 

डिजिटल तकनीक इस्तेमाल में सावधानी सिखाना जरूरी

संपादकीय
13 सितंबर 2017


एक खबर है जिसकी सच्चाई परखना अभी बाकी है, लेकिन वह खतरनाक है और हिन्दुस्तान के डिजिटल-राह पर बढऩे में एक बड़ा रोड़ा और खतरा साबित हो सकती है। एक किसी छोटे दुकानदार ने पेटीएम से भुगतान लेना शुरू किया, और जब उसने अपने बैंक खाते में रकम डालने की कोशिश की, तो साढ़े 17 लाख रूपए की रकम गायब हो गई। ऐसी चार घटनाएं, और उसकी चार लाख जगहों पर पढ़ी गई खबरों से हो सकता है कि लोग कैशलेस होने का इरादा छोड़ दें। आज भी रात-दिन ये खबरें आती हैं कि किस तरह किसी के एटीएम कार्ड से जालसाजी हो गई, और उसकी जिंदगी भर की जमा पूंजी लुट गई। जब लोगों के बीच साक्षरता और जागरूकता की तैयारी डिजिटल होने की नहीं है, तब आंधी-तूफान की रफ्तार से डिजिटलीकरण के खतरे कम नहीं हैं। और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में ही जहां मुख्यमंत्री ने यह तय किया है कि कुछ महीनों में ही दस लाख लोगों को डिजिटल लेन-देन के हिसाब से तैयार किया जाएगा, तो ऐसी कई तरह की ठगी के बारे में भी सोचना होगा। और लोगों के घर जाकर नोट लूटकर लाना आसान नहीं होता है, लेकिन ऑनलाईन किसी की भी जानकारी को हासिल करना भी आसान है, और उसे लूट लेना भी आसान है।   इस मुद्दे पर हमने पहले भी लिखा है कि केन्द्र सरकार को एक ऐसी योजना लानी चाहिए कि कैशलेस और डिजिटल लेन-देन में जो लोग ठगी या जुर्म के शिकार होते हैं, उनकी भरपाई करने के लिए एक बीमा योजना लाई जाए, उसके बिना यह पूरा सिलसिला जनता के हितों के खिलाफ जाएगा।
आज छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में साइबर जुर्म से निपटने के लिए पुलिस भी तैयार नहीं है, और साइबर अपराध दर्ज तो हो जाते हैं, लेकिन मुजरिमों तक पहुंचकर लूट को वापिस लाने के मामले बहुत कम हैं। इसलिए आज जब सरकार लोगों के डिजिटल-शिक्षण के काम को युद्धस्तर पर शुरू कर रही है, तो पहले से ही लोगों को सावधानी सिखाना जरूरी है, और ऐसा सिखाने वाले लोगों को भी पुलिस या दूसरी जांच एजेंसियों से प्रशिक्षण दिलवाना जरूरी है, ताकि पहले वे खुद समझें, और फिर प्लास्टिक इस्तेमाल करने वाले, फोन से भुगतान करने वाले लोगों को समझा सकें। यह काम आसान नहीं होगा, क्योंकि चारों तरफ फैले हुए छोटे-छोटे दुकानदारों और छोटे-छोटे ग्राहकों को संगठित रूप से सिखाने का मौका भी आसान नहीं होगा। और आज जब बाजार पूरी तरह चौपट है, तो ऐसे में किसी छोटे दुकानदार को प्रशिक्षण के लिए किसी जगह बुलाना भी उसके जख्मों पर नमक छिड़कने की तरह का होगा। इसलिए सरकार को अखबार, टीवी, और सीधे जनसंपर्क से भी लोगों को जुर्म से सावधान रहने का प्रशिक्षण देना पड़ेगा। आज तो जो बुजुर्ग लोग हैं, वे भी अपने बचपन से पहले सिक्के, और फिर नोट देखते और इस्तेमाल करते आए हैं। और इसलिए वे इसमें धोखे से आमतौर पर बचना जानते हैं। लेकिन हम अखबारों में जब साइबर धोखाधड़ी की खबरें पढ़ते हैं, तो दिखता है कि बहुत पढ़े-लिखे और पेशेवर, परिपक्व और कामयाब लोग भी ठगी के शिकार हो रहे हैं। इसलिए आज जब लोगों को मोबाइल बैंकिंग, क्रेडिट और डेबिट कार्ड, फोन से भुगतान जैसे कई चीजों की तरफ मोड़ा जा रहा है, तो ऐसी तमाम सावधानी बहुत जरूरी है क्योंकि लोगों का भरोसा इस नई तकनीक पर अगर बैठ नहीं पाया, तो इसका इस्तेमाल कामयाब भी नहीं होगा, और लोग सुरक्षित भी नहीं रहेंगे। 

धान बोनस और सूखा राहत से परे भी सोचने की जरूरत

संपादकीय
12 सितंबर 2017


छत्तीसगढ़ में किसानों को धान बोनस का मुद्दा सत्तारूढ़ भाजपा को एक बहुत बड़ा लुभावना चुनावी मुद्दा भी लग रहा है, और कांग्रेस इस बात को लेकर परेशान भी है कि उसके हाथ से एक बड़ा मुद्दा निकल गया है जिसका विकल्प ढूंढना कुछ मुश्किल होगा। लेकिन किसानों के मुद्दे महज धान बोनस पर खत्म नहीं हो रहे हैं, बहुत से और पहलू हैं जिन पर सत्ता और विपक्ष दोनों को राजनीति से परे जाकर खुली चर्चा करनी चाहिए और समस्याओं का समाधान निकालना चाहिए। आज जिस वक्त हम ये लिख रहे हैं, उसी वक्त राज्य मंत्रिमंडल ने प्रदेश की दो तिहाई तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किया है क्योंकि वक्त पर बारिश नहीं हुई, और किसानों ने सूख रही फसल को चरने के लिए जानवरों को खेतों में छोड़ दिया है। ऐसी नौबत से अकेले सरकार नहीं जूझ सकती, और विपक्ष को भी बड़ी बारीकी से एक-एक खेत, और एक-एक किसान को मुआवजा दिलवाने के लिए अपनी क्षमता का इस्तेमाल करना चाहिए।
आज न सिर्फ छत्तीसगढ़ में बल्कि पूरे देश में फसल बीमा योजना में बीमा कंपनियों की धांधली पकड़ा रही है। छत्तीसगढ़ में भी जो बातें सामने आई हैं, उनके मुताबिक बीमा कंपनियों को बारिश और मौसम के लिए हर इलाके में जितनी-जितनी दूर पर मॉनीटर लगाने थे, उन्होंने नहीं लगाए। नतीजा यह हुआ कि मौसम के रिकॉर्ड के साथ मुआवजे को जोडऩा मुमकिन नहीं हो पाया, और कहीं-कहीं पर पूरे-पूरे जिले में एक ही तरह के आंकड़े इस्तेमाल किए गए जिससे कि सूखे खेतों को सूखा दर्ज नहीं किया जा सका। दूसरी तरफ अभी बालोद में किसानों का प्रदर्शन सामने आया जो कि 2015 से चले आ रहा है और उनका कहना है कि फसल बीमा के रिकॉर्ड में उनकी जमीनों के खसरा नंबर सरकारी कर्मचारियों ने गलत दर्ज किए, और आज उनके बीमा का निपटारा नहीं हो पा रहा है।
इसके अलावा भी कई और किस्म की दिक्कतें छत्तीसगढ़ की फसल को लेकर सामने आती हैं। कई जगहों पर नकली या घटिया बीज, कई जगहों पर नकली या घटिया खाद की शिकायतें सामने आती हैं। फिर जगह-जगह यह भी सामने आया है कि लो-वोल्टेज की वजह से कहीं पंप नहीं चल रहे, और कहीं पर बिजली लंबे-लंबे समय के लिए बंद है। बैंकों से लोन समय पर नहीं मिलता, और सरकार से खेती की मशीनें किराए पर लेने में दिक्कत जाती है। ऐसी अनगिनत दिक्कतें किसान को परेशान करती हैं, और सिर्फ धान खरीदी या कि धान बोनस से ये दिक्कतें दूर नहीं होने वाली हैं। सरकार को खेती से जुड़े हुए सभी मामलों के अपने विभागों के काम को बेहतर करना होगा, और जिस तरह केन्द्र सरकार में बिजली, कोयला, और रेलगाड़ी के विभागों को जोड़कर एक साथ बिजली की दिक्कतों को निपटाया जाता है, उसी तरह राज्य में कृषि, सिंचाई, राजस्व, बिजली जैसे विभागों को मिलाकर प्रदेश की किसानी-दिक्कतों को निपटाना चाहिए।
लेकिन आज सूखे और बोनस की चर्चा के बीच दीर्घकालीन बात धरी रह जाती है। हम पहले भी कई बार लिख चुके हैं कि किसान की अर्थव्यवस्था खेतों से परे भी रहनी चाहिए, तभी वे भूखे मरने से बचेंगे। इसके लिए डेयरी से लेकर पशु-पक्षी पालन, और मधुमक्खी पालन से लेकर मशरूम तक, कई तरह के दूसरे काम खेती-किसानी के साथ जोडऩे चाहिए। जिन इलाकों में ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े हुए ऐसे काम चलते हैं, वहां से सूखे में भी किसानों और मजदूरों को काम की तलाश में प्रदेश छोड़कर बाहर नहीं जाना पड़ता। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में खेती को अलग से नहीं देखा जान चाहिए, और सभी तरह की दूसरी ग्रामोद्योग गतिविधियों को किसानों से, उनके परिवारों से जोड़कर उनकी उत्पादकता बढ़ानी चाहिए। इसी से उनकी हालत सुधरेगी, वे आत्महत्या से बचेंगे, और प्रदेश की कुल उत्पादकता में भी उससे बढ़ोत्तरी होगी। 

मिले-जुले मकसद के लिए भी अलग-अलग करने की जरूरत

11 सितंबर 2017

कांग्रेस पार्टी के चर्चित और विवादास्पद नेता दिग्विजय सिंह ने कल ट्विटर पर प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ बनाए गए एक पोस्टर को री-ट्वीट करके एक बार फिर मधुमक्खियों के छत्ते में हाथ डाल दिया है। भाजपा के लोग तो मोदी के खिलाफ हल्की जुबान वाले इस पोस्टर को लेकर बिफरे हुए हैं ही, खुद कांग्रेस पार्टी के लोग कुछ परेशान हैं कि परेशानियों में घिरी हुई भाजपा को दिग्विजय हमलावर होने का एक मौका दे बैठे हैं। दरअसल सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने का एक नशा और नतीजा यह भी होता है कि लोग दूसरों की पोस्ट को आगे बढ़ाते हुए यह अहसास भूल जाते हैं कि आगे बढ़ाने के लिए तो वे अकेले जिम्मेदार हैं ही। और ऐसा महज दिग्विजय के साथ होता हो, ऐसा भी नहीं है, हमारे जैसे कई लोग भी कई बार ऐसे उत्साह के शिकार हो जाते हैं, जो कि बाद में तब भारी पड़ता है जब लोग बढ़ाई गई बात की पूरी जिम्मेदारी बढ़ाने वाले पर तय कर देते हैं। और ऐसा होना भी चाहिए, क्योंकि किसी आलोचना या निंदा के कार्टून, पोस्टर, या कमेंट को बनाने की जिम्मेदारी ही बनाने वाले पर आ सकती है, और बढ़ाने की जिम्मेदारी तो बढ़ाने वाले पर ही रहेगी।
दिग्विजय सिंह के साथ एक दिक्कत यह है कि वे एक राष्ट्रीय पार्टी के एक प्रमुख नेता होते हुए भी एक सामाजिक कार्यकर्ता की तरह बहुत से ऐसे फैसले लेते हैं जो कि उनकी पार्टी को पूरी तरह बर्दाश्त नहीं होते। जब कोई पार्टी बड़ी होती है, तो उसके भीतर कई तरह की बातों का ख्याल रखना होता है। एक एनजीओ के काम करने के तौर-तरीके, और एक राजनीतिक पार्टी की शैली में बड़ा फर्क हो सकता है। कोई एनजीओ लोगों के बीच वोटों के लिए नहीं जाता है, उसे हद से हद कुछ सरकारों तक, कुछ कंपनियों तक, या कुछ अंतरराष्ट्रीय संगठनों तक नोटों के लिए जाना होता है। इन दोनों की बेबसी बिल्कुल अलग-अलग होती है। लेकिन जब एनजीओ के लोग राजनीति में शामिल होने लगते हैं, जैसा कि योगेन्द्र यादव जैसे लोगों के साथ हुआ, या कि राजनीति के लोग एनजीओ में पहुंचकर उनके आंदोलन में शरीक होने लगते हैं, जैसा कि दिग्विजय के साथ कई बार होता है, तो ये दोनों ही तबके अपनी बुनियादी पहचान के भीतर कुछ तकलीफ पाने लगते हैं।
लेकिन यह बात सिर्फ इन्हीं दोनों तबकों तक सीमित नहीं है, बहुत से दूसरे ऐसे दायरे हैं जिनके लोग जब दूसरे दायरों में काम करने लगते हैं तो किसी न किसी दायरे का नुकसान होता है। इन दिनों बहुत से ऐसे जर्नलिस्ट हैं जो कि एक्टिविस्ट की तरह भी काम करते हैं, वे अपने लिखने या कहने में भी एक्टिविस्ट होने लगते हैं, और सड़कों पर कुछ मुद्दों के लिए लगातार लड़ाई भी लड़ते हैं। कुछ लोगों का यह मिला-जुला काम इतना बढ़ जाता है कि वे एक जर्नलिस्ट की साख खो बैठते हैं, और किसी बैनर का डंडा थाम लेते हैं। ऐसे में यह दिक्कत भी होती है कि उनके किस काम को जर्नलिस्ट का काम माना जाए, और किस काम को एक्टिविस्ट का काम माना जाए। इससे दोनों ही दायरों का नुकसान होता है, किसी एक जर्नलिस्ट के एक्टिविस्ट होने से बाकी गैरएक्टिविस्ट जर्नलिस्ट उस आंदोलन या मुद्दे से कतराने भी लगते हैं कि वह तो फलां जर्नलिस्ट या फलां मीडिया की नेतागिरी का अड्डा है।
लेकिन अगर कोई जर्नलिस्ट कुछ जलते-सुलगते मुद्दों पर सड़कों पर साथ नहीं उतर आते तो बहुत से एक्टिविस्ट यह मानकर चलते हैं कि उन मुद्दों पर उनकी सैद्धांतिक सहमति ही नहीं है। यह बात समझने में चूक कर बैठते हैं कि लोगों के, अलग-अलग पेशे या तबके के लोगों के, सिद्धांत एक हो सकते हैं, लेकिन उस मंजिल तक पहुंचने के उनके रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं। कोई अखबारनवीस अपने विचारों को लिखकर उस मंजिल तक पहुंच सकते हैं, और कोई एक्टिविस्ट सड़कों पर आंदोलन करके, अदालतों तक अपील करके, सोशल मीडिया पर अभियान छेड़कर भी उसी मंजिल तक पहुंच सकते हैं। इसलिए इस जिद से बचने की जरूरत है कि एक मंजिल के राही एक ही राह से चलकर जाएं।
लोकतंत्र एक बहुत ही विविधताओं से भरा हुआ तंत्र भी है। लोकतंत्र के तीन तथाकथित स्तंभों से परे भी बहुत से और स्तंभ रहते हैं जो कि लोकतंत्र को मजबूती से खड़ा रहने में मदद करते हैं, इनमें एनजीओ भी हो सकते हैं, बिना किसी संगठन के काम करने वाले अकेले जागरूक नागरिक भी हो सकते हैं जिनके बारे में कई लोग यह मान बैठते हैं कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। हमने इस देश में बहुत बड़े-बड़े कई फैसलों के पीछे अदालत तक पहुंचने वाले अकेले लोगों को देखा है जिन्होंने बिना किसी संगठन, बिना किसी पार्टी, और बिना किसी तबके के अकेले जनहित की कानूनी लड़ाई लड़ी, और पूरे देश को फायदा पहुंचाने वाला फैसला पाया।
लेकिन हम फिर आज की शुरुआती चर्चा पर लौटें तो दिग्विजय सिंह की पोस्ट, जिसे उन्होंने बाद में खुद ही सोशल मीडिया से हटा दिया, वह किसी ने ओछे शब्दों और गालियों  के सहारे गढ़ी थी। अब आज जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश और विदेश के मीडिया की इस आलोचना से घिर गए हैं कि वे सोशल मीडिया पर ऐसे लोगों को फॉलो करते हैं जो कि दूसरों को हत्या और बलात्कार की धमकी देते हैं, जो दूसरों को गालियां देते हैं, तो ऐसे में दिग्विजय सिंह ने नासमझी की एक हरकत से लोगों का ध्यान मोदी की तरफ से हटाकर अपनी तरफ खींच लिया है, और मीडिया-सोशल मीडिया पर चल रहे मुद्दे को पटरी से उतार दिया है। अगर हम देखें कि क्या कोई राजनीतिक दल एक राजनीतिक फैसले के तहत अपनी ही ट्रेन को पटरी से इस तरह उतारता, तो दिग्विजय की गलती समझ आती है। और यह भी समझ आता है कि कांग्रेस पार्टी ने धीरे-धीरे करके किस तरह दिग्विजय सिंह के गैरजरूरी और नाजायज बयानों को अपने लिए असुविधा का पाया, और उन्हें धीरे-धीरे हाशिए पर कर दिया। दिग्विजय सिंह के भीतर साम्प्रदायिक संगठनों और आरएसएस से लडऩे की एक अमर इच्छाशक्ति है, लेकिन यह लड़ाई हमेशा ही जरूरी नहीं होती, कांग्रेस के हित में नहीं होती, और कई बार यह बेमौके की, गलत मुद्दों पर छेड़ी हुई, और गलत जुबान में लड़ी जा रही भी साबित होती है। दिग्विजय सिंह का ओसामा-बिन-लादेन को ओसामाजी कहना उनकी एक मामूली चूक हो सकती है, लेकिन वह कांग्रेस को बहुत भारी पड़ती है। यहां पर यह बात साफ होती है कि एक संगठन का दायरा और उस संगठन के हिस्से किसी व्यक्ति का निजी दायरा भी आपस में टकरा सकते हैं, और दोनों को अपनी-अपनी सीमाएं समझना चाहिए।
देश के कुछ जलते हुए मुद्दों पर लोगों को साथ आने की जरूरत लग सकती है, लेकिन हमारा अभी भी यह मानना है कि तबके अलग-अलग दायरों में रहकर अपने मकसद में अधिक कामयाब हो सकते हैं। अभी कर्नाटक की पत्रकार गौरी लंकेश के कत्ल के बाद जब चारों तरफ विरोध-प्रदर्शन हुआ, तो दिल्ली में प्रेस क्लब में पत्रकारों के साथ-साथ एनजीओ के लोग और राजनीति के लोग भी शामिल हुए। कार्यक्रम खत्म होने के कुछ घंटों के भीतर ही यह आवाज उठने लगी कि मीडिया के मुद्दों पर ऐसे किसी विरोध-प्रदर्शन में मीडिया से बाहर के लोगों को शामिल नहीं किया जाना चाहिए। यह बात एक तरीके से तब ठीक है जबकि कोई कार्यक्रम या विरोध-प्रदर्शन मीडिया के झंडे तले हो रहा है, उसमें तो सचमुच ही बाहर के लोगों को शामिल नहीं होना चाहिए। और अगर सबको मिलकर यह काम करना है तो फिर वह एक अलग बैनरतले होना चाहिए, न कि मीडिया के नाम पर।
लोगों को यह समझने की जरूरत है कि लोकतंत्र के लिए काम करते हुए किसी भी तबके को न तो अपनी पहचान खोनी चाहिए, न अपना दायरा भूलना चाहिए, और न ही उनको किसी दूसरे दायरे की पहचान ओढ़कर काम करना चाहिए। लोगों की विश्वसनीयता उसी हालत में कायम रहती है जब वे अपना खुद का काम अपनी खुद की पहचान के साथ करते हैं। ऐसा करके ही वे एक मिले-जुले मकसद के लिए कुछ अधिक कर सकते हैं।

बच्चों पर सेक्स हमलों से बचाव के लिए बड़ी जागरूकता जरूरी

संपादकीय
11 सितंबर 2017


दिल्ली और उसके आसपास के हादसे कुछ बड़ी खबरें बनते हैं क्योंकि वहीं पर बड़े अखबार, बड़े टीवी चैनल, देश की सबसे बड़ी अदालत, देश की सबसे बड़ी सरकार, और देश के बाकी तमाम किस्म के सबसे बड़े ओहदे भी बसते हैं। जिस तरह इंसान के शरीर में सिर के सबसे करीब लगने वाली चोट का सबसे अधिक असर होता है, उसी तरह देश की राजधानी की बातें बाकी देश के मुकाबले अधिक मायने रखती हैं। और जैसे-जैसे हादसे महानगरों से दूरी पर होते हैं, उनका महत्व घटते जाता है। लेकिन हादसे तो हादसे होते हैं, और इनके अधिक चर्चा में आने से इतना तो होता है कि देश भर का ध्यान उनकी तरफ जाता है, और ऐसे मौके पर समझदार तबकों को कोशिश करके उनके मुद्दों पर एक व्यापक और बड़ी चर्चा करवानी चाहिए ताकि देश में भी खतरों पर फिक्र हो सके और लोग चौकन्ने हो सके, कुछ रास्ता ढूंढा जा सके।
दिल्ली के बगल गुडग़ांव में अभी एक स्कूल में छोटे से बच्चे को बलात्कार की कोशिश के बाद स्कूल के बस कंडक्टर ने ही मार डाला।  और दिल्ली में एक स्कूल में एक बच्ची से बलात्कार हुआ। इन दो घटनाओं से सबक लेते हुए देश भर में बाकी सरकारों, बाकी स्कूलों, और बाकी मां-बाप को भी अपने-अपने इंतजाम दुरूस्त कर लेने चाहिए। आज स्कूलें घरों से बहुत दूर-दूर हो गई हैं, और बच्चे हर दिन औसतन घंटे-दो घंटे तो सफर करते ही हैं। ऐसे में उनकी हिफाजत एक आसान बात नहीं होती, और सरकार के नियम-कायदे, उसकी नसीहतें सब धरे रह जाते हैं, और स्कूलें, बहुत महंगी स्कूलें भी लापरवाह साबित होती हैं। अभी गुडग़ांव में जिस स्कूल में यह बलात्कार-हत्या का मामला सामने आया है वह देश की सबसे बड़ी और चर्चित स्कूलों की एक चेन है, और उसकी मालकिन देश के सबसे ताकतवर नेताओं से परिचित भी है। हम इस मौके पर उस मालकिन की राजनीतिक पार्टी और नेताओं के साथ उसकी शिष्टाचार मुलाकातों की तस्वीरों को महत्वपूर्ण नहीं मानते जो कि रोजाना सामने आ रही हैं। लेकिन हम इस बात को महत्वपूर्ण मानते हैं कि इस स्कूल ने जहां-जहां गलती की है और गलत काम किए हैं, वहां-वहां उसे सजा मिलनी चाहिए।
लेकिन एक दूसरे मुद्दे पर भी चर्चा जरूरी है कि सरकार स्कूल और मां-बाप के अलावा खुद बच्चों के भीतर जागरूकता कैसे पैदा की जाए। हो सकता है कि अभी के दो हादसों में बच्चे कुछ अधिक छोटे हों और उनके लिए किसी हिंसा का मुकाबला करना मुमकिन न हो, लेकिन देश में बच्चों के यौन शोषण के खिलाफ बच्चों में एक व्यापक जागरूकता की जरूरत है क्योंकि उन पर ऐसे सेक्स हमले न सिर्फ स्कूल या खेल के मैदान में हो सकते हैं, बल्कि घर में भी हो सकते हैं। कल ही कोई खबर आई है कि मां-बाप पड़ोस में बैठने गए थे, और घर पर रह गई अकेली बच्ची के साथ पड़ोसी ने बलात्कार किया। इसलिए बच्चों को जागरूक करना जरूरी है कि परिवार के सदस्य, पड़ोस के लोग, स्कूल या दूसरी जगहों के लोग उन्हें अगर किसी तरह से छूते हैं, तो उन्हें क्या करना है। भारत में किसी भी तरह की सेक्स शिक्षा, शरीर शिक्षा, या जागरूकता की बात करना झंडों-डंडों को न्यौता देना हो जाता है, और दकियानूसी लोग ऐसा माहौल खड़ा करने लगते हैं कि ये सारे सेक्स अपराध भारत में नहीं होते, और ये पश्चिमी संस्कृति हैं। हकीकत यह है कि दकियानूसी देश में ऐसी बातें अधिक होती हैं क्योंकि पश्चिमी देशों में तो मां-बाप भी चौकन्ने रहते हैं और बच्चों को भी सावधानी सिखाई जाती है। भारत ऐसे बचाव से अछूता है। लेकिन अब ऐसे हादसों को देखते हुए यह जरूरी है कि लोग कई तरह के अलग-अलग मंचों पर इस मुद्दे पर चर्चा करें, और मां-बाप से लेकर बच्चों तक सबकी सावधानी को बढ़ावा दें।

बलात्कारी बापू-बाबा भांडाफोड़ से देश को यह सबक लेना चाहिए

संपादकीय
10 सितंबर 2017


वैसे तो डेरा सच्चा सौदा के बलात्कारी बाबा राम रहीम के बारे में लिखने को अधिक कुछ नहीं बचा है क्योंकि पिछले कुछ हफ्तों में कई बार उस पर लिखा गया, लेकिन अब जब इस बाबा को चारों तरफ से धिक्कार मिल रही है, और डेरा की तलाशी में इस बाबा की ऐशगाह से साध्वियों के कमरों तक, छात्राओं के हॉस्टल तक सुरंग मिलने की खबरें आ रही हैं, तो इस पूरे सिलसिले पर फिर से एक नजर डालने की जरूरत है कि इससे देश को क्या सबक लेना चाहिए। इसके अलावा आज ही अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद में फर्जी बाबाओं की एक लिस्ट जारी की है जिसमें कई चर्चित बाबाओं में से आसाराम बापू, राधे मां, राम रहीम, निर्मल बाबा, स्वामी असीमानंद, आसाराम के बेटे नारायण सांई, रामपाल जैसे बहुत से लोगों के नाम जारी किए गए हैं, और कहा गया है कि इन लोगों को संत जैसी उपाधि देने के पहले एक प्रक्रिया से उनको आंका जाएगा। इस परिषद के अध्यक्ष महंत नरेन्द्र गिरी का कहना है कि इस बैठक के पहले तीन दिनों में तीन अलग-अलग मोबाइल नंबरों से उन्हें धमकी दी गई कि वे ऐसी कोई लिस्ट जारी न करें और फोन करने वालों ने खुद को आसाराम का शिष्य बताया है। यह बात अच्छी तरह दर्ज है कि आसाराम पर चल रहे नाबालिग से बलात्कार के मामले में बहुत से गवाहों की अब तक हत्या हो चुकी है, और उसी के चलते कई बरस से आसाराम को जमानत भी नहीं मिल पाई है, सारे गवाहों के बयान भी अदालत में दर्ज नहीं हो पाए हैं।
हम इन तमाम बातों को देखते हुए लोगों के सामने यह बात रखना चाहते हैं कि अपने परिवार के बालिग और नाबालिग लोगों को किसी भी धार्मिक या आध्यात्मिक गुरू के सामने पेश करने के पहले उनको यह समझ लेना चाहिए कि दुनिया में धर्म और अध्यात्म से जुड़े हुए लोगों का इतिहास ऐसे मामलों से भरा हुआ है। जब कभी अपने परिवार को लोग ऐसी जगहों पर ले जाते हैं, वे एक बहुत बड़ा खतरा मोल लेते हैं। कैथोलिक ईसाई धर्म के बड़े-बड़े पादरियों से लेकर दूसरे बहुत से धर्मों के लोगों तक को बच्चों से बलात्कार में पकड़ा गया है, भारत में बहुत से भगवाधारी और स्वघोषित संत या बाबा की सेक्स-फिल्में इंटरनेट पर भरी पड़ी हैं। आसाराम जिस नाबालिग बच्ची के साथ बलात्कार के आरोप में जेल में है, वह बच्ची भी आसाराम की संस्था द्वारा चलाई जा रही एक स्कूल की हॉस्टल की थी, और उसके मां-बाप आसाराम के भक्त थे। बाबा राम रहीम ने जिन साध्वियों के साथ बलात्कार करके 20 बरस की कैद हासिल की है, वे साध्वियां भी उस बाबा के भक्तों के परिवार की नाबालिग बच्चियां थीं, और उसी उम्र में आश्रम को सौंप दी गई थीं। इसलिए लोगों की आस्था उनके परिवारों के लिए भी जानलेवा साबित होती है।
जब तक हिन्दुस्तान में यह अंधविश्वास बने रहेगा कि ऐसे बाबाओं के प्रति हर तरह का समर्पण उन्हें पापों से मुक्ति दिला देगा, या कि स्वर्ग पहुंचा देगा, या कि ईश्वर से मिला देगा, तब तक ऐसे अंधभक्तों के परिवार भी खतरे में रहेंगे। धर्म और आध्यात्म का चोला पहनकर बहुत से लोग देह शोषण में जुट जाते हैं, और ऐसे हजारों में से कोई एक-दो मामले ही शिकायत और पुलिस-अदालत तक पहुंच पाते हैं। देश में अवैज्ञानिक सोच, अंधविश्वास, और धर्मान्धता के चलते लोग अपनी तर्कशक्ति, अपनी सामान्य समझबूझ खो बैठते हैं, और ऐसे बाबाओं, पाखंडियों, और स्वघोषित संतों के हाथों न सिर्फ खुद लुटते हैं, बल्कि अपने परिवार को भी झोंक देते हैं। यह सिलसिला इस ताजा बलात्कार कांड के खुलासे के बाद कुछ थमना चाहिए। चूंकि इन साध्वियों के साथ हुए बलात्कार को तो वापिस किया नहीं जा सकता, इसलिए अब केवल यही बात काम की हो सकती है कि ऐसे खतरों से देश के लोगों को अधिक से अधिक आगाह किया जाए, और देश की बाकी बच्चियों को, बच्चों को, महिलाओं को बचाया जाए। और बाबा राम रहीम के मामले में तो यह भी सामने आया है कि वह अपने भक्तों में से सैकड़ों नौजवानों को भी अपने एक ऑपरेशन थियेटर में डॉक्टरों से सर्जरी करवाकर नपुंसक बनवा देता था ताकि वे अपना सेक्स खोकर पूरी तरह इस बाबा के लिए ही समर्पित रहें। इसलिए हर उम्र और हर सेक्स के लोगों को हर तरह के बाबाओं से बचकर रहना चाहिए यह सबक आज देश की हवा में है, और राम रहीम कांड से अब देश में शुरू हुई इस नई चर्चा से एक जागरूकता आनी चाहिए, और ऐसे हर बाबा का भांडाफोड़ करने के लिए जागरूक लोगों को कैमरे-माइक्रोफोन सबका इस्तेमाल करके जनता का भला करना चाहिए। 

नोबल शांति पुरस्कार का आतंक नाजायज

संपादकीय
9 सितंबर 2017


भारत के पड़ोस के म्यांमार में वहां के बौद्ध बहुसंख्यक लोग फौज और पुलिस में बौद्ध लोगों के साथ मिलकर धार्मिक अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुस्लिमों को देश से मारकर भगा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट यह कहती है कि उन्हें बड़ी संख्या में मार दिया गया है, और पूरा समुदाय बौद्ध-सरकारी हिंसा का शिकार है। म्यांमार में सरकार की मुखिया आंग-सान-सू-ची को 1991 में वहां की फौजी तानाशाही के खिलाफ बहुत लंबे लोकतांत्रिक संघर्ष के लिए नोबल शांति पुरस्कार भी दिया गया था, और अब यह मांग भी हो रही है कि वे जिस तरह रोहिंग्या मुस्लिमों की दसियों हजार हत्याओं को देखते हुए चुप हैं, लाखों के देश से निकाल दिए जाने को देखते हुए चुप हैं, और जिस तरह से उन्होंने यह तय किया है कि संयुक्त राष्ट्र की जांच टीम को देश में घुसने नहीं दिया जाएगा, उसे देखते हुए उनका नोबल शांति पुरस्कार वापिस लिया जाए। इस बारे में अभी-अभी खबर आई है कि नॉर्वे के नोबेल संस्थान का कहना है कि न तो पुरस्कार के संस्थापक अल्फ्रेड नोबेल के वसीयत के अनुसार और न ही नोबेल फाउंडेशन के नियमों के अनुसार प्राप्तकर्ताओं से पुरस्कार वापस लेने का कोई प्रावधान है। संस्थान ने कहा है कि एक बार नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किए जाने के बाद प्राप्तकर्ता से पुरस्कार वापस नहीं लिया जा सकता।
आज का यह मुद्दा म्यांमार पर केन्द्रित नहीं है, बल्कि इस पर केन्द्रित है कि सम्मान और पुरस्कार वापिस लेने का कोई प्रावधान होना चाहिए या नहीं? बहुत से लोगों को जीते जी सम्मान मिल जाते हैं, और उनकी बाकी जिंदगी में ही ऐसे कई मामले सामने आते हैं जो कि उस सम्मान के लिए अपमानजनक होते हैं। ऐसे में हमारा ख्याल है कि हर सम्मान के साथ यह शर्त जुड़ी रहनी चाहिए कि इस सम्मान का अपमान होने की नौबत में इसे वापिस लिया जा सकता है। इस बारे में भारत में फौज के नियम साफ हैं। अगर किसी फौजी को मिला हुआ सम्मान बाद में उसके किसी काम या उसके चाल-चलन की वजह से सम्मान के अपमान में बदलता दिखे, तो उसे वापिस लिया जा सकता है। आज भारत में जैसे सचिन तेंदुलकर जैसे कम उम्र के नौजवान क्रिकेट खिलाड़ी को भारत रत्न का देश का सबसे बड़ा सम्मान दिया गया है। उनकी अभी लंबी उम्र बाकी है, और अपनी शोहरत और कामयाबी के चलते वे अरबों के कारोबारी भी हो गए हैं, और हो सकता है कि आगे-पीछे उनको लेकर कोई अप्रिय चर्चा हो, और वे कोई गलती या गलत काम कर बैठें, तो उस हालत में उनका भारत रत्न कायम रहना ठीक नहीं होगा। पहले ऐसे बहुत से सम्मान मरने के बाद ही दिए जाते थे, और मौत के बाद किसी के गलत काम सामने आने की नौबत कम ही रहती थी, लेकिन जब जीते जी सम्मान मिल रहे हैं, तो उनको वापिस लेने का एक पुख्ता इंतजाम ही लोकतंत्र, इंसानियत, और सम्मान के सम्मान में जरूरी है।
आज दुनिया में यह भी माना जा रहा है कि आंग-सान-सू-ची के खिलाफ दुनिया में आज आवाज इसलिए नहीं उठ रही है कि लोग उनके नोबल पुरस्कार के दबाव में चुप हैं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि जिसने इतने लंबे समय तक लोकतांत्रिक लड़ाई लड़ी है, उसकी सत्ता के तहत हो रही हिंसा का कुछ सोच-समझकर ही विरोध करना होगा। हमारा ख्याल है कि किसी सम्मान या पुरस्कार के आतंक में लोगों की गलतियों या गलत कामों को अनदेखा करना ठीक नहीं है। लोगों को याद होगा कि किस तरह अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के पहले कार्यकाल में ही, बिना उनके किसी भी योगदान के किस तरह उन्हें खुद को हक्का-बक्का करने वाला नोबल शांति पुरस्कार घोषित कर दिया गया था, और बाद में उसके बारे में कुछ लोगों ने यह भी लिखा था कि शायद यह उनसे बाकी कार्यकाल में शांति की कोशिशों के लिए दिया गया एडवांस नोबल शांति पुरस्कार है। पुरस्कार और सम्मान लोगों के ऊपर गलत कामों से बचने के लिए एक नैतिक दबाव की तरह होने चाहिए, न कि उनके गलत कामों को बचाने के लिए एक ढाल की तरह। पुरस्कारों और सम्मानों की राजनीति वैसे भी विवादों से घिरी रहती है, और हमारा मानना है कि सम्मान प्राप्त लोगों को खुद भी उस सम्मान का सम्मान करना चाहिए, या फिर उनमें इतनी आत्मा बची रहनी चाहिए कि वे उसे लौटा दें।

देश में तीन बरस पढ़ाई वाले डॉक्टरों की बहुत जरूरत है

संपादकीय
8 सितंबर 2017


छत्तीसगढ़ में अभी कुछ दिन पहले राज्य सरकार ने आयुर्वेदिक डॉक्टरों को एलोपैथिक दवाइयां लिखने की इजाजत दे दी है। उनकी काफी समय से यह मांग चली आ रही थी, और पिछले एक-दो बरस में सरकारी अफसरों ने डॉक्टरों को उनकी पद्धति से बाहर जाकर दवाइयां लिखने पर रोका था, और तब से यह मांग जोर पकड़ रही थी। आयुर्वेद की पढ़ाई में कुछ हिस्सा एलोपैथिक दवाइयों का रहता है, और इसलिए बीएएमएस करने वाले डॉक्टर यह मांग करते हैं कि जरूरत के मुताबिक उन्हें एलोपैथिक दवाइयां लिखने दी जाएं। दूसरी तरफ एलोपैथिक डॉक्टरों का यह मानना रहता है कि उनकी पद्धति का इलाज करने लायक पढ़ाई बीएएमएस में नहीं करवाई जाती, इसलिए ऐसी इजाजत नहीं मिलनी चाहिए। अभी साल दो साल के पहले तक छत्तीसगढ़ में आयुर्वेद, होम्योपैथी, इलेक्ट्रिक होम्योपैथी और कई दूसरे किस्म की वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति कही जाने वाली पद्धतियों के डॉक्टर या गैरडॉक्टर इलाज करते आए थे, और वे धड़ल्ले से एलोपैथिक दवाइयां लिखते भी आए थे। नीम-हकीम कहे जाने वाले ऐसे बहुत से डॉक्टरों का कारोबार सरकार ने अभी बंद करवाया था, इसलिए अब औपचारिक रूप से आयुर्वेदिक डॉक्टरों ने एलोपैथी की इजाजत हासिल कर ली है। और इनके बाद अब होम्योपैथी के डॉक्टर मुख्यमंत्री तक पहुंचे हैं कि उन्हें भी इजाजत दी जाए।
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में गांव-गांव में मितानिनें भी मुख्यमंत्री दवा पेटी लेकर उसमें दी गई डेढ़ दर्जन जरूरी दवाओं के साथ इलाज करती हैं, और जरूरत पडऩे पर मरीजों को सरकारी अस्पताल तक ले भी जाती हैं। ऐसे में सभी पद्धतियों के डॉक्टरों का यह कहना है कि उनकी पढ़ाई मितानिनों से तो अधिक है जो कि शायद पांचवीं या आठवीं पास हो सकती हैं, और जिनका कोई लंबा-चौड़ा औपचारिक प्रशिक्षण भी नहीं हुआ है। ऐसे में हमें जोगी सरकार के समय राज्य में शुरू की गई तीन साल की डॉक्टरी की पढ़ाई याद आती है जिसे बाद में भारतीय चिकित्सा परिषद और सुप्रीम कोर्ट ने गैरकानूनी करार दे दिया था, और बंद करवा दिया था। हमारा ख्याल है कि देश में रोजाना की मामूली बीमारियों का इलाज करने के लिए तीन साल की पढ़ाई से ऐसे सहायक चिकित्सक तैयार हो सकते हैं, जो कि सीमित इलाज करें। आज एमबीबीएस डॉक्टरों की देश में इतनी कमी है कि अगले कई बरस भी आबादी को सही अनुपात में डॉक्टर नहीं मिलने वाले। और न ही हर छोटी-मोटी तकलीफ के लिए लोगों को पांच-सात साल मेडिकल कॉलेज में लगाकर निकलने वाले एमबीबीएस डॉक्टरों की अनिवार्य जरूरत भी होती है।
न सिर्फ छत्तीसगढ़ राज्य को, बल्कि पूरे हिन्दुस्तान को यह सोचना चाहिए कि एमबीबीएस डॉक्टरों से कम शिक्षा वाले ऐसे तीन बरस के स्वास्थ्य कार्यकर्ता या सहायक चिकित्सक बनाए जाएं जो कि छोटी बीमारियों के सीमित इलाज के लिए सक्षम रहें, और उन्हें उतनी ही इजाजत रहे। आज तो आरएमपी, रजिस्टर्ड मेडिकल प्रेक्टिशनर बनने के लिए लोग कई तरह की कागजी डिग्री ले लेते हैं जो पूरी तरह फर्जी रहती है, और वे उसकी आड़ में सभी तरह के इलाज करते रहते हैं। इनके बजाय तीन बरस के औपचारिक शिक्षण-प्रशिक्षण वाले लोग गांवों में जाकर काम भी करेंगे, गरीब लोगों के बीच कम फीस पर काम भी करेंगे, और मरीज और एमबीबीएस के बीच के लंबे फासले को पाटने का काम भी करेंगे। भारतीय चिकित्सा परिषद, केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, और जरूरत पड़े तो सुप्रीम कोर्ट को मिलकर तीन बरस की चिकित्सा शिक्षा पर विचार करना चाहिए जो कि देश की जरूरत है। इससे आज के एमबीबीएस डॉक्टरों के आत्मसम्मान को चोट पहुंच सकती है कि आधी-अधूरी पढ़ाई से तीन बरस में तैयार लोग भी डॉक्टर कहलाएंगे, तो ऐसे में उनके लिए कोई और उपयुक्त नाम छांटा जा सकता है, लेकिन इस जरूरत को पूरा करना चाहिए। और हम होम्योपैथी या दूसरी पैथियों के डॉक्टरों को एलोपैथिक दवाइयों को लिखने की इजाजत देने के खिलाफ हैं जिन्होंने इसकी सही पढ़ाई नहीं की है, उन्हें यह औजार नहीं थमाना चाहिए।

खुले में शौच रोकने से पहले खुले में कातिल सोच रोकें...

संपादकीय
7 सितंबर 2017


भारत में आज नफरत की वजह से की गई दिखती एक पत्रकार की हत्या के बाद का माहौल देखने लायक है। कर्नाटक की इस महिला पत्रकार को बाकी देश में आम लोग शायद नहीं जानते थे, लेकिन अब उसकी लिखी हुई बातें अनुवाद होकर कई भाषाओं में छप रही हैं, और वह सोच आगे बढ़ रही है। लेकिन दूसरी तरफ भारत के सोशल मीडिया में लगातार इस मौत पर बहुत बड़ी खुशी भी मनाई जा रही है कि एक वामपंथी, धर्मनिरपेक्ष कुतिया की हत्या पर देश भर के कुत्ते और पिल्ले रो रहे हैं। कई लोग ऐसे और कत्ल के फतवे दे रहे हैं, और कई लोग खुशियां भी मना रहे हैं कि ऐसे एक धर्मनिरपेक्ष से पीछा छूटा। इन गालियों में बहुत नया तो कुछ नहीं है, लेकिन पिछले कुछ बरसों से लगातार यह सोच बढ़ती चली जा रही है, और आज इस पर लिखना जरूरी है।
हम किसी को गालियां देने के लिए कुत्ते और कुतिया की मिसाल को गाली नहीं मानते, और हमारा यह मानना है कि इससे इंसान का कोई अपमान नहीं होता, बल्कि इससे एक वफादार जानवर का अपमान जरूर होता है जो कि इंसान का सबसे वफादार साथी होता है, दूसरे इंसान से भी अधिक। लेकिन किसी कत्ल पर खुशी मनाने की ऐसी खुली सोच से यह सवाल उठता है कि क्या देश का कानून ऐसे लोगों के खिलाफ एकदम ही ताक पर धर दिया गया है? आज देश के बड़े-बड़े कुछ अखबारों की यह रिपोर्ट है कि एक हौसलामंद पत्रकार की ऐसी हत्या पर ट्विटर पर खुली खुशी मनाने वाले लोगों में से चार लोग ऐसे हैं जिन्हें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी फॉलो करते हैं। किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति को तो दसियों लाख लोग फॉलो कर सकते हैं, और आमतौर पर ऐसे किसी व्यक्ति के पास इतना वक्त नहीं होता कि वे उन्हें फॉलो करने वाले लोगों की छानबीन करें। लेकिन दूसरी तरफ वे तो किसी और को तभी फॉलो करते हैं जब वे अपनी पसंद से उसे छांटते हैं। यह बात हक्का-बक्का करती है कि मीडिया में पिछले दो-तीन बरस से लगातार ऐसी कई मिसालें सामने रखी गईं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कैसे-कैसे लोगों को फॉलो करते हैं, जो कि दूसरों को हत्या और बलात्कार की खुली धमकी पोस्ट करते हैं। जब ऐसी बातें सार्वजनिक रूप से राष्ट्रीय मीडिया में बार-बार आती हैं, तो यह हैरानी होती है कि प्रधानमंत्री का मीडिया अकाउंट देखने वाले लोगों को क्या इसमें कुछ भी बुरा नहीं दिखता है? और क्या प्रधानमंत्री के सलाहकार, खुद प्रधानमंत्री इसे देखकर भी अनदेखा करते हैं? कल जब देश भर में बेंगलुरू की अखबारनवीस गौरी लंकेश की हत्या पर शोक रखा जा रहा था, तब उनके कत्ल पर खुशी मनाने वाला अपने ट्विटर खाते पर फख्र से यह लिखकर चल रहा था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उसे फॉलो करते हैं, और उसके पेज पर यह दिखता भी है।
लोकतंत्र में नेताओं की सोच कई तरह की हो सकती है, लेकिन लोकतंत्र और हिंसा साथ-साथ नहीं चलते। इसलिए नरेन्द्र मोदी को चाहिए कि पिछले बरसों में लगातार राष्ट्रीय मीडिया में लिखी जा रही इस बात को और अनदेखा न करें। वे जिस तरह खुले में शौच के खिलाफ अपने कार्यकाल के शुरू से ही एक अभियान चला रहे हैं, उसी तरह लोकतंत्र में हमेशा ही एक अभियान की जरूरत रहती है जो कि खुले में कातिल सोच के खिलाफ काम करें। खुले में शौच तो एक बार चल सकती है, लेकिन खुले में कातिल सोच की लोकतंत्र में कोई जगह नहीं हो सकती। प्रधानमंत्री को चाहिए कि वे अमिताभ बच्चन की मदद लेकर दरवाजा बंद के अंदाज में गंदी जुबान बंद का भी एक अभियान चलाएं जिससे बलात्कारी और कातिल फतवे देने वाले लोगों पर रोक लग सके। लोकतंत्र महज पखानों की समझ पैदा करने का काम नहीं है, लोकतंत्र तो यह है कि जो लोग बलात्कार और हत्या पर खुशी मनाते हैं, खुली धमकी देते हैं, उन तमाम लोगों को जेल में बंद किया जाए। शौच को बंद पखाने में किया जाए, और हत्यारी सोच को खुले में फैलाया जाए, यह इस देश की संस्कृति नहीं रही है, और देश के संविधान में इसकी कोई जगह भी नहीं है। जो लोग देश के संविधान की शपथ लेकर जनता की दी गई कुर्सियों पर काबिज हैं, उन्हें खुले में शौच से पहले खुले में कातिल सोच को रोकने का काम करना चाहिए, क्योंकि इस मोर्चे पर लगातार चुप्पी को इतिहास अच्छी तरह दर्ज करते चल रहा है।

नफरत से असहमति की हत्या कर, एक लाश टांग करोड़ों को धमकी

संपादकीय
6 सितंबर 2017


कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू में कल शाम एक साहसी पत्रकार, गौरी लंकेश की हत्या कर दी गई। उन्हें उनके दरवाजे पर ही पेशेवर अंदाज में गोलियों से भून दिया गया। उन्हें हिन्दुत्ववादी संगठनों से पहले से धमकियां मिल रही थीं, और वे अपनी वामपंथी विचारधारा से अखबारनवीसी करते हुए लगातार साम्प्रदायिकता के खिलाफ जूझ रही थीं, और अपने अखबार के अलावा वे सड़कों पर भी धर्मनिरपेक्षता के मुद्दों को लेकर आंदोलनों में शरीक रहती थीं। सोशल मीडिया पर वे लगातार दुनिया के अमन-पसंद मुद्दों पर लिखती थीं, और भारत में कट्टरता और नफरत के खिलाफ वे लगातार मुखर रहती थीं। उनकी मौत के बाद देश की साम्प्रदायिकता-विरोधी ताकतों को यह भी याद पड़ रहा है कि किस तरह देश के धर्मान्धता-कट्टरता विरोधियों को पिछले बरसों में इसी अंदाज में एक-एक कर मारा गया है, और उनमें से एक के भी कातिल को पकड़ा नहीं जा सका है। यह अलग बात है कि पुणे में हुई नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या के पीछे उग्रवादी हिन्दू संगठनों से जुड़े लोगों का नाम आया था, लेकिन अभी तक कोई कातिल पकड़े नहीं जा सके हैं। देश में साम्प्रदायिक-राजनीति और नफरत के खिलाफ मुखर ऐसे चार पत्रकारों-सामाजिक कार्यकर्ताओं की पिछले तीन बरस में एक ही अंदाज में हत्या हुई है, और यह ताजा हत्या भी पुलिस के मुताबिक बिल्कुल उसी तरह से हुई है।
आज भारत में जिस रफ्तार से वैज्ञानिक सोच के खिलाफ, धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ, सामुदायिक सद्भाव के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा है, ये हत्याएं पहली नजर में उसी सिलसिले की एक कड़ी दिखती हैं। दूसरी बात यह भी है कि आज सोशल मीडिया पर देश की धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ एक बहुत बड़ी फौज सक्रिय है जो कि देश के अमन-पसंद लोगों की रोजाना ही चरित्र-हत्या करने में लगी हुई है। कल शाम इस हौसलामंद अखबारनवीस के कत्ल के बाद भी यह धर्मान्ध फौज सोशल मीडिया पर खुशियां मनाने में जुट गई थी, और यह बात देश के बाकी धर्मनिरपेक्ष लोगों के लिए एक चेतावनी अधिक है कि चरित्र-हत्या के साथ-साथ उनकी शरीर-हत्या भी किस तरह हो सकती है। ऐसे बहुत से मामलों में मकसद महज एक को चुप करने का नहीं रहता है, बल्कि लाखों और लोगों को भी चुप्पी के लिए यह एक समझाईश रहती है और यह बात तय है कि हर किसी का हौसला गोली खाने का नहीं रहता है, इसलिए ऐसी हत्या से लोगों की चुप्पी की गारंटी भी रहती है। आज पूरे हिन्दुस्तान में मीडिया के लोग जगह-जगह एकजुट होकर इस हत्या का विरोध कर रहे हैं। इसके बाद दो-चार दिनों में यह समाचार विचार के पेज पर चले जाएगा, और फिर अगली ऐसी किसी हत्या के वक्त या हत्या की बरसी के समय एक बार फिर इसे याद कर लिया जाएगा। लेकिन कत्ल तो खबरों और इतिहास में दर्ज हो जाता है। डरी-सहमी चुप्पी न दिखती है, न इतनी आसानी से दर्ज हो सकती है। और ऐसे कत्ल के पीछे वही एक मकसद दिखता है। हिन्दुस्तान आज आर्थिक आंकड़ों और नारों पर तैरता दिख रहा है, लेकिन देश में असहमति के खिलाफ हिंसा का एक अभूतपूर्व माहौल दिखाई पड़ता है जिसने अब तक के सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। आज हिंसक-नफरत फैलाने वाले सोशल मीडिया-आतंकियों के पीछे देश की सबसे बड़ी निर्वाचित ताकतों की सहमति बताई जाती है, और दिखती है। यह नौबत सभ्य और लोकतांत्रिक दुनिया में भारत की साख चौपट कर चुकी है, और भारत में सांस्कृतिक-धार्मिक विविधता की जो एक सबसे बड़ी ताकत रही है, उसे भी तबाह कर चुकी है। देश में अंधविश्वास, अवैज्ञानिकता, धर्मान्धता, और नफरत की फसल लगातार बोई जा रही है, और उन फसलों को कोई लोकतांत्रिक पंछी नुकसान न पहुंचा दें, इसलिए डराने के लिए हर बरस ऐसी कोई न कोई लाश इन फसलों के बीच टांग दी जाती हैं। ये हालात एकदम ही भयानक हैं, और एक लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष देश की भारत की ऐतिहासिक साख को खत्म कर चुके हैं।
जो हिन्दुत्ववादी ताकतें गौरी लंकेश नाम की इस हौसलामंद अखबारनवीस के पीछे लगी हुई थीं, उनका ऐतिहासिक टकराव ऐसे दूसरे कुछ हिन्दुओं से भी चलते आया है। सोशल मीडिया पर लोगों ने याद किया है कि महात्मा गांधी, गोविंद पंसारे, नरेन्द्र दाभोलकर, और एम.एम. कालबुर्गी का विरोध ऐसी हिन्दुत्ववादी ताकतें ही करते आ रही थीं, चाहे इनके हत्यारे अब तक पकड़े न गए हों, लेकिन यह बात तो साफ है कि मारे गए ये सारे लोग हिन्दू थे। इसलिए हिन्दुत्व की रक्षा करने के लिए आतंकी-हिंसा पर उतारू लोगों के बारे में यह बात भी समझने की जरूरत है कि वे अपने बीच के, हिन्दू धर्म में पैदा हुए ऐसे लोगों को जरा भी बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं, जो कि हिन्दुओं के साथ-साथ दूसरे धर्मों को भी बराबरी का सम्मान देने की बात कर रहे हैं। इस सिलसिले में यह भी समझने की जरूरत है कि संविधान की शपथ लेने वाली वे कौन सी ताकतें हैं जो कि सद्भाव के खिलाफ बिना बर्दाश्त वाली ऐसी हिंसक ताकतों के साथ हैं, और यह साथ कुछ लोग चुप्पी से उजागर कर रहे हैं, और कुछ लोग गालियां देकर, बलात्कार और हत्या की धमकियां देकर भी कर रहे हैं।

चीनी सामानों के बहिष्कार का फतवा तो ठीक है लेकिन क्या बिना बिजली, बिना फोन रहेंगे?

संपादकीय
5 सितंबर 2017


भारत के एक तबके में पड़ोस के देशों के खिलाफ नफरत पर आधारित जंग छेड़ देने का बड़ा उत्साह रहता है। कोई भी बात हो और एक के बदले दस सिर काटकर लाने के नारे लगने लगते हैं, और चीन से सरहद पर तनातनी हो, तो देश भर में जगह-जगह कुछ राष्ट्रवादी संगठन चीनी सामान जलाते दिखते हैं, हालांकि तस्वीरों में जलते हुए केवल खाली बक्से दिखते हैं, क्योंकि सामान जलाने के हौसले वाले कम ही रहते होंगे। लेकिन आज जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चीन में पाकिस्तान के आतंकी संगठनों के खिलाफ आवाज उठाने में कामयाब रहे हैं, और वे ब्रिक्स देशों के संयुक्त घोषणा पत्र में आतंक की इस बात को जुड़वाने में भी कामयाब रहे हैं, तो यह सरहद पर जंग के चलते नहीं हो पाया है, यह दोनों देशों के बीच बैठकर ठंडे दिल से बातचीत करने से हो पाया है। डोकलाम सरहद की तनातनी बातचीत से ही खत्म हुई, न कि फौजी कार्रवाई से। इसी तरह हिन्दुस्तान के युद्धोन्मादी-राष्ट्रवादी लोगों को यह भी समझना चाहिए कि चीनी सामानों का बहिष्कार एक फतवा हो सकता है, हकीकत नहीं हो सकता। क्योंकि जब यह नारा लगा रहे हैं, तब उनके पसंदीदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चीन में उस ब्रिक्स सम्मेलन में बात कर रहे हैं, और चीन के साथ अलग से सीधी बात भी कर रहे हैं, और इन चर्चाओं में कारोबार एक बड़ा मुद्दा है। ब्रिक्स देशों के बीच कारोबार बढ़ाने की बात है, और इनमें से कोई भी देश एक-दूसरे का कारोबारी बहिष्कार नहीं कर सकता।
चीन के सामान को जलाने का नाटक फिजूल का है। आज भारत में जितने बिजलीघर चल रहे हैं, उनमें से बहुत से चीन में बने हुए हैं, चीनी टेक्नालॉजी से खड़े किए गए हैं, और चीन के इंजीनियर आकर उन पर काम भी करते हैं। आज भारत में जितने मोबाइल फोन काम कर रहे हैं, उनमें शायद नब्बे फीसदी चीन से बनकर आए हुए हैं, उनमें चीनी कलपुर्जे लगे हैं, मोबाइल कंपनियों के भीतर के उपकरण चीन के हैं, डेस्कटॉप और लैपटॉप चीन के हैं, प्रिंटर और उनकी स्याही चीन की है, और नोट गिनने की मशीनों से लेकर पिन लगाने की मशीनें तक चीन की हैं। भारत और चीन के बीच कारोबार इतना जुड़ा हुआ है कि चीनी सामानों का बहिष्कार एक बहुत ही पाखंडी नारा है, क्या हिन्दुस्तान के लोग अगले दस-बीस बरस बिना बिजली अंधेरे में जीने तैयार हैं? क्या वे अगले पांच-दस बरस बिना मोबाइल फोन जीने तैयार हैं? बिना कम्प्यूटर उनका घर-कारोबार चल जाएगा? क्या बिना टीवी देखे उनका परिवार चल जाएगा?
आज जब दुनिया में देशों के बीच सरहदों को नीचा किया जा रहा है, और लोगों की आवाजाही और कारोबार को बढ़ावा दिया जा रहा है, तो पड़ोस में बसे हुए चीन से सस्ते में और कम दूरी से आने वाले सामान को रोकने की बात करना बेकार है। या तो हिन्दुस्तानी कारखाने और कामगार चीनियों जैसे हुनर से काम करना सीख लें, अपनी उत्पादकता बढ़ा लें, तो फिर न सिर्फ चीन से आयात घट सकता है, बल्कि दुनिया के बाकी देशों में हिन्दुस्तान का सामान जा भी सकता है। लेकिन अपने घर को सुधारने के बजाय दूसरे के घर से आना-जाना रोकने की बात किसी की काम की नहीं है। पड़ोसियों से दुश्मनी रखने और निकालने के नारों के बिना अपना घरेलू राष्ट्रवाद जिंदा नहीं सकता, उसमें हिंसक धार नहीं आ सकती। इसलिए हर देश में ऐसे कुछ संगठन रहते हैं जो पड़ोसी को दुश्मन बताते हुए रात-दिन जंग और नफरत की बात करते हैं। लोगों को याद होगा कि प्रधानमंत्री बनने के पहले नरेन्द्र मोदी ने अपनी चुनावी सभाओं में पाकिस्तान के खिलाफ जितने किस्म की भड़काऊ बातें कही थीं, और एक के बदले दस सिर काटकर लाने का वायदा किया था, और यूपीए के प्रधानमंत्री का मखौल उड़ाया था, बिरयानी खिलाने के लतीफे सुनाए थे, वे सब प्रधानमंत्री बनने के बाद शांत हो गए। उसके बाद वे ही पाकिस्तान के साथ परंपरा के खिलाफ जाकर भी घरोबा दिखाते रहे, और बिन बुलाए भी वहां जाते रहे हैं। आज देश के भीतर चीनी सामान या पड़ोसी देशों को लेकर एक निहायत नाजायज और गैरजरूरी फतवा दिया जा रहा है, और इस बारे में हकीकत बताने का जिम्मा भी प्रधानमंत्री का है ताकि देश के लोग बिना उन्माद चैन से जी सकें।

...इतना अहसानफरामोश तो महज इंसान ही हो सकता है

4 सितंबर 2017
जानवरों को लेकर इंसानों का सोचना बड़ा दिलचस्प होता है। जिस शेर से कुछ हासिल नहीं होता, उस शेर को इंसानों ने हिन्दुस्तान में जंगल का राजा बना रखा है। यह अलग बात है कि शेर लगातार हिन्दुस्तान के कई इलाकों में इंसानों को मारने का काम भी करते हैं। लेकिन दूसरी तरफ हिरण हैं, या ऐसे बहुत से और पशु-पक्षी हैं जो इंसान का कोई नुकसान नहीं करते हैं, लेकिन उनके लिए कोई खास इज्जत इंसानी नजरों में रहती नहीं है। 
बोलचाल में लोग किसी के हौसले की तारीफ करने के लिए उसे शेरदिल बताते हैं। किसी की चाल दमखम से भरी दिखे, तो उसे शेर जैसा चलने वाला कहा जाता है। दूसरी तरफ जो प्राणी इंसान का सबसे अधिक साथ देता है, जो उसके लिए वफादार रहता है, उस कुत्ते का इस्तेमाल महज गाली के लिए किया जाता है, और हिन्दी भाषा की कहावतों, लोकोक्तियों को देखें, हिन्दी के मुहावरों को देखें तो कुत्ते को लेकर महज गालियां और अपमान भरा पड़ा है। यह तो अच्छा है कि कुत्ता हिन्दी पढ़ता नहीं है, वरना वह इंसानों से वफादारी कभी की भूल गया होता। 
कुछ लोगों को यह चर्चा आक्रामक राष्ट्रवादी-हिन्दुत्व का एजेंडा लग सकती है कि इंसानों की सबसे अधिक सेवा करने वाले प्राणियों को राष्ट्रीय पशु क्यों न बनाया जाए? आज भारत में शेर राष्ट्रीय पशु है, और सिंह देश का राजचिन्ह है, ऐसे में गाय महज घूरों पर दिखती है, या कि सरकारी पैसों पर चलने वाली गौशालाओं में मरी पड़ी दिखती है। ऐसे में गाय को राष्ट्रीय पशु बनाने की सोच में एक दूसरी दिक्कत भी आड़े आ सकती है कि गाय के नाम पर धंधा करने वाले लोगों को भी यह बात शायद न जमे कि गाय को पशु घोषित किया जाए, फिर चाहे राष्ट्रीय पशु ही क्यों न बनाया जाए। गाय को मां का दर्जा देने की जिन लोगों की जिद है, और फिर चाहे बूढ़ी मां को वृद्धाश्रम में भूखा मारने में जिनकी नैतिकता और जिनके सांस्कृतिक मूल्यों को जरा भी चोट न पहुंचती हो, उनको भी गाय के नाम के साथ राष्ट्रीय पशु लिखना तकलीफ दे सकता है। 
जानवरों को लेकर इंसान न सिर्फ उन्हें खाने के मामले में बेरहम हैं, बल्कि उन जानवरों को लेकर इंसानों की सांस्कृतिक संवेदना भी जगह-जगह आड़े आती है, और कई मामलों में नहीं भी आती है। धर्मालु लोग भी अपने देवी-देवताओं के वाहन बने हुए जानवरों की कभी पूजा करते दिखते हैं, तो कभी उन्हें मारने में भी नहीं चूकते। गणेश का वाहन चूहा गणेशोत्सव के दस दिनों में खूब पूजा पाता है, लेकिन उसके बाद का साल ऐसा रहता है कि कई समुदायों के लोग शौक से चूहा खाते हैं, या कि मजबूरी में भी खाते हैं। किराने की कई दुकानों के बाहर दरवाजे खुलने के पहले से कुछ लोग खड़े दिखते हैं कि भीतर अगर चूहेदानी में चूहा फंसा हो तो उसे ले जाकर नाश्ता किया जाए। इसी तरह नवरात्रि या दुर्गा पूजा के वक्त दुर्गा के वाहन शेर या सिंह की पूजा होती है, लेकिन बाद में इंसानों को जब मौका मिलता है तब उसे मारकर उसकी खाल, उसके नाखून, और उसकी चुनिंदा हड्डियों को महंगे दामों पर बेच दिया जाता है। 
जो बेकसूर इंसान को मारकर खा जाए, वह शेर जंगल का राजा है, भारत का राष्ट्रीय पशु है, जंगल का सिंह भारत का राजचिन्ह है, लेकिन जो वफादार कुत्ता इंसान की पूरी जिंदगी चौकीदारी करता है, वह महज एक गाली है। हिंदी फिल्मों में खून पी जाने से लेकर टुकड़े-टुकड़े कर देने के लिए गाली देते हुए इंसानों को दूसरों के लिए कुत्ता शब्द ही सूझता है। इंसान की कोई भी गाली शेर या सिंह को लेकर नहीं बनी है, उसके हाथों खा लिए जाना भी इंसान को मंजूर है, और वफादार को गाली देना उसकी आदत है, उसका मिजाज है। इतना अहसानफरामोश महज इंसान ही हो सकता है।

सत्ता की शाही सहूलियतें खत्म करना चाहिए

संपादकीय
4 सितंबर 2017


जापान की एक दिलचस्प खबर है कि वहां की राजकुमारी ने अपने पसंदीदा एक आम नौजवान से शादी करने के लिए राजघराने की सदस्य का दर्जा छोडऩा तय किया है। एक प्रेस कांफे्रंस में उन्होंने यह घोषणा की कि उन्हें यह मालूम है कि किसी आम व्यक्ति से शादी का मतलब जापानी कानून के मुताबिक राजकुमारी का दर्जा छोडऩा है, लेकिन उनके लिए यह दर्जा कोई मायने नहीं रखता है, अपनी मोहब्बत मायने रखती है। जापान वैसे तो एक विकसित देश है, लेकिन वहां भी संविधान प्रमुख का दर्जा एक राजघराने के लोगों को ही मिलता है, ब्रिटेन की तरह। सरकार निर्वाचित होती है, लेकिन राष्ट्रपति की तरह के राजा एक ही खानदान के चले आते हैं। और ऐसी अलोकतांत्रिक परंपरा के साथ-साथ वहां पर राजघराने के आदमियों और औरतों में इस भेदभाव का कानून भी है कि उसके आदमी तो आम नागरिक से शादी करके शाही दर्जा बरकरार रख सकते हैं, लेकिन राजकुमारियां ऐसा करने पर तुरंत ही यह दर्जा खो बैठती हैं। कुछ इसी तरह की एक कहानी ब्रिटेन में भी चल रही है जहां पर प्रिंस हैरी अपनी एक अमरीकी अभिनेत्री पे्रमिका के साथ आम लोगों की तरह पूरी दुनिया घूम रहे हैं, और ऐसी चर्चा है कि वे शादी दर्जे को छोड़ भी सकते हैं।
दूसरी तरफ हम हिंदुस्तान जैसे देश में देखते हैं कि लोग गरीब परिवारों से उठकर ऊपर आते हैं और चुनाव के रास्ते सत्ता तक पहुंचते हैं और सत्ता से हासिल अमीरी का दिखावा करने के लिए वे करोड़ों की शादी करते हैं, लाखों की घड़ी पहनते हैं, बड़ी-बड़ी गाडिय़ों में चलते हैं, और जनता के पैसों से शाही अंदाज में रहते हैं। वे अपने लिए इतने बड़े-बड़े बंगले बनवा लेते हैं कि अपनी कमाई से उसका महीने भर का भाड़ा भी न दे सकें, इतना ऐशो-आराम जुटा लेते हैं कि जो उनके पुरखों ने भी न देखा हो, और यह सब वे जनता के पैसों पर करते हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बारे में यह बात आम है कि उनकी पार्टी पर उनका पूरा कब्जा है। ऐसे में वे अपने-आपको जैसी गरीबी से आया हुआ बताते हैं, और भाजपा के पीछे आरएसएस की जिस तरह की परंपरा की चर्चा रहती है, और आरएसएस के प्रचारकों-कार्यकर्ताओं की जिस तरह की सादगी की बात कही जाती है, क्या नरेन्द्र मोदी यह साहस दिखा सकते हैं कि वे वामपंथी दलों की तरह अपनी पार्टी के लोगों के लिए एक आचार संहिता बना सकें? उनकी कमाई और उनकी दौलत को लेकर कोई सीमा बांध सकें? वे बीच-बीच में सरकारी फिजूलखर्ची के खिलाफ अपने मंत्रियों को कुछ-कुछ कहते जरूर हैं, लेकिन उसका कोई ठोस असर पार्टी पर किसी तरह की किफायत का दिखता नहीं है। यह पार्टी आज अपने को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी कह रही है, लेकिन महज आकार से कुछ नहीं होता, भाजपा को आचार-विचार और चाल-चलन से भी अपने-आपको दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी साबित करना चाहिए। चूंकि सत्ता जनता के पैसों पर चलती है, इसलिए सबसे पहले सत्ता के खर्च से शाही सहूलियतों को खत्म करना चाहिए।

केन्द्रीय मंत्रिमंडल फेरबदल राज्यों के लिए भी नजीर बने

संपादकीय
3 सितंबर 2017


 केन्द्र की मोदी सरकार ने कई मंत्रियों को हटाया, और कई नए मंत्री जोड़े। कुछ को प्रमोशन देकर राज्यमंत्री से कैबिनेट मंत्री बनाया गया, और कई लोगों के विभाग बदले गए। नए मंत्रियों में से कुछ ऐसे हैं जो अभी सांसद नहीं हैं, लेकिन यह कोई नई और अनहोनी बात नहीं है क्योंकि आज देश में मोदी के बाद सबसे महत्वपूर्ण मंत्री अरूण जेटली भी जिस दिन वित्तमंत्री बनाए गए, वे भी हारे हुए थे, और सांसद नहीं थे। बाद में उन्हें रक्षामंत्री का काम भी दिया गया जो कि अब अमूमन चुप रहने वाली मंत्री निर्मला सीतारमण को दिया गया है। इसलिए कांग्रेस की इस आपत्ति में कोई दम नहीं है कि गैरसांसदों को मंत्री बनाया गया है, पहले भी हर सरकार में ऐसे मंत्री बनते आए हैं जो कि बाद में लोकसभा या राज्यसभा में सांसद बनते हैं, और मंत्री का काम जारी रखते हैं। संविधान में बिना सांसद बने भी छह महीने काम करने का प्रावधान इसीलिए रखा गया है। आज का यह फेरबदल और विस्तार भाजपा की अगुवाई वाली मोदी सरकार में केवल भाजपा के भीतर है, और एनडीए के दूसरे गठबंधन-दलों पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। शिवसेना ने अपनी निराशा के साथ इसे भाजपा का घमंड कहा है, और एनडीए ने ताजा-ताजा शामिल हुई एक सबसे बड़ी पार्टी, नीतीश कुमार की जेडीयू से किसी को नहीं लिया गया है जो कि कुछ चौंकाने वाली बात है। लेकिन नियमों के मुताबिक अभी केन्द्रीय मंत्रिमंडल में आधा दर्जन के करीब और लोगों को शामिल किया जा सकता है, और हो सकता है कि आगे गठबंधन के आंतरिक संतुलन के मुताबिक कुछ और मंत्री बनाए जाएं।
इतने बड़े देश और इतने धर्म, इतनी जातियां, इतने समुदाय, इन सबको देखते हुए और आखिरी के इन दो बरसों में कामकाज और साख को भी देखते हुए किसी पार्टी के लिए अपने मंत्री तय करना आसान बात नहीं होती है, लेकिन इस तरह का फेरबदल किसी भी सरकार के मंत्रियों को चौंकन्ना रखने के लिए जरूरी भी होता है। विभागों में फेरबदल, या मंत्रिमंडल में चेहरों का फेरबदल कार्यकाल के बीच में एक बार तो होना ही चाहिए उसके बिना लोगों के कामकाज में सुस्ती आ जाती है, और वे अपनी साख को लेकर बेफिक्र भी हो जाते हैं कि उनका कोई क्या बिगाड़ लेगा। हम छत्तीसगढ़ के मंत्रिमंडल को आज इसी यथास्थितिवाद का शिकार पाते हैं जिसमें किसी तरह का कोई फेरबदल नहीं होता है, और ऐसे में आखिर में जाकर यह जिम्मा शायद मतदाता पर आ जाता है कि वही फेरबदल करे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की एक साख तो यह बनी हुई है कि अपने मंत्रियों के कामकाज और निजी चाल-चलन पर उनकी बारीक निगाह रहती है, और वे अपने हर मंत्री को जवाबदेह भी बनाकर रखते हैं। इसी का नतीजा है कि यह फेरबदल हुआ है, और अच्छा काम करने वाले मंत्रियों को और अधिक महत्वपूर्ण जिम्मा दिया गया है।
नौकरशाही हो, या निर्वाचित नेता, उनकी जिम्मेदारियों में चुनौती और ताजगी बनी ही रहनी चाहिए। कई बार एक ही काम को लंबे समय तक करते हुए लोगों की कल्पनाशीलता चुक जाती है, और कोई नई चुनौतियां उनको दिखती नहीं हैं। लोग एक विभाग को अपनी अधिकतम संभव प्रतिभा का फायदा दे देते हैं, और फिर उसके बाद उनके कामकाज में एक घिसा-पिटा दुहराव ही बाकी रह जाता है। मंत्रियों और बड़े अफसरों के एक ही विभाग में लंबे समय तक बने रहने से उनके नीचे का ढांचा भी फौलाद सा कड़ा हो जाता है, और उसकी पसंद-नापसंद भी संभावनाओं को सीमित कर देती हैं, भ्रष्टाचार एक संगठित व्यवस्था बन जाता है। हम राज्य में बीच-बीच में सुनते हैं कि सत्तारूढ़ संगठन मंत्रियों के निजी सचिवों को हटाने की बात करता है, लेकिन बहुत से मंत्रियों के निजी सचिव उनके दलालों की तरह एक संगठित रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार में लगे रहते हैं, वे एक मंत्री से दूसरे मंत्री तक चले जाते हैं, लेकिन वे मंत्री के पीए बने रहते हैं। भारतीय जनता पार्टी को एक नीति बनाकर ऐसी निरंतरता में फेरबदल का नियम बनाना चाहिए, ताकि भ्रष्टाचार का सिलसिला कुछ तो कमजोर हो। केन्द्र सरकार में नामों और विभागों में फेरबदल, नए चेहरों का आना, कुछ पुराने चेहरों का जाना बाकी राज्यों के लिए भी एक नजीर बननी चाहिए।

धान बोनस पर विधानसभा सत्र बीमा, गौशाला पर भी चर्चा हो

संपादकीय
2 सितंबर 2017


छत्तीसगढ़ के धमधा में किसानों का आंदोलन महीने भर से चलते-चलते सड़क पर आ गया और पुलिस को हड़बड़ाकर भागकर वहां पहुंचना पड़ा। किसानों का कहना है कि 2015 से उन्हें फसल बीमा का मुआवजा नहीं मिला है क्योंकि सरकारी कर्मचारियों ने उनकी जमीनों का खसरा नंबर बीमा कागजात में गलत दर्ज कर दिया था, और बीमा कंपनी अब भुगतान नहीं कर रही है। फसल बीमा को लेकर पूरे देश में हालत बहुत खराब है क्योंकि राज्य सरकारों ने समय रहते बीमा कंपनियों से कागजात में सावधानी नहीं बरती, और न ही बीमा कंपनियों ने जिलों के भीतर निर्धारित जगहों पर बारिश नापने के लिए मशीनें लगाईं।
पूरी दुनिया में बीमा कंपनियां धोखाधड़ी और जालसाजी के लिए जानी जाती हैं।  दुनिया के सबसे पूंजीवादी और विकसित देशों में भी बीमा कंपनियां इलाज के नाम पर तरह-तरह से धोखा करती हैं, और वहां से लेकर छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में जहां सरकार इलाज का बीमा करवाकर जनता को बीमा कार्ड देती है, वहां भी बीमा कंपनियां अस्पतालों को भुगतान नहीं करतीं, और बहुत से मामलों में अस्पतालों के साथ मिलकर जालसाजी करती हैं। फसल बीमा के मामले में तो बीमा कंपनियों ने इस बरस पूरे देश में इतनी मोटी कमाई की है कि लोगों में यह विचार भी चल रहा है कि क्या अकेली सरकारी फसल बीमा कंपनी से ही काम करवाना बेहतर होगा, और निजी कंपनियों को इस कारोबार से बाहर कर दिया जाना चाहिए।
ऐसा नहीं है कि राज्य सरकार के अधिकारी नजर रखें तो यह बात साबित न हो कि बीमा कंपनियों ने जिलों के भीतर भी निर्धारित शर्तों के हिसाब से अलग-अलग इलाकों में बारिश नापने के लिए मशीनें नहीं लगाईं। बीमे का काम देते हुए इसकी शर्त थी और मौसम के आंकड़े जुटाने वाली मशीनों को केन्द्रीय कम्प्यूटरों से जोडऩा भी था ताकि भुगतान के समय कोई विवाद न हो। लेकिन फसल बीमा के नाम पर कृषि विभाग के अधिकारी, राजस्व अधिकारी, और किसानों को कर्ज देने वाले बैंकों के अधिकारी ये सब मिलकर इस परले दर्जे की धोखाधड़ी में जुट जाते हैं कि किसान के हाथ कुछ न आए, बीमा कंपनी की यह नीयत पूरी होने लगती है। आज प्रदेश में किसान जगह-जगह इस धोखाधड़ी के शिकार हैं। बैंकों ने उनको खेती का कर्ज देते हुए उनके खातों से खुद ही बीमा का भुगतान निकाल लिया और कंपनियों को दे दिया।
अब जब छत्तीसगढ़ में घोषित धान के बोनस पर बजट मंजूर कराने के लिए राज्य सरकार विधानसभा का एक सत्र करवा रही है तो उसमें फसल से जुड़े हुए कुछ ऐसे दूसरे मुद्दों पर भी चर्चा होना चाहिए। बजट सत्र के लिए विधायकों और विधानसभा पर, अधिकारियों और राज्य शासन पर जनता का पैसा खर्च होगा, इसलिए जनता से जुड़े इन जरूरी मुद्दों पर उस सत्र में चर्चा होनी ही चाहिए। विधानसभा का पिछला सत्र हड़बड़ी में जल्दी खत्म किया गया था, और कई मुद्दों पर उसमें चर्चा नहीं हो पाई। लेकिन हम यहां यह भी सुझाव देना चाहते हैं कि विपक्ष किसी भी तरह से विधानसभा के इस सत्र का इस्तेमाल सड़क जैसे प्रदर्शन के लिए न करे, और उसके एक-एक मिनट को केवल चर्चा और बहस में काम लाए। अब अगर एक दिन या दो-चार दिन के ऐसे सत्र को भी शोर-शराबे और बहिर्गमन में खत्म कर दिया जाएगा, तो यह प्रदेश की जनता का बड़ा नुकसान होगा।
हमारा यह भी मानना है कि प्रदेश की गौशालाओं में सैकड़ों गायों की दर्ज मौत और हजारों गायों की अघोषित मौत पर भी खेती से जुड़े इस सत्र में चर्चा होनी ही चाहिए। गायों की मौतों का मुद्दा किसान और कृषि अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा हुआ है, और विधानसभा के पिछले सत्र के बाद ये मौतें सामने आई हैं इसलिए उन पर भी विपक्ष को चाहिए कि वह सरकार को घेरे और इन मौतों की जिम्मेदारी तय करने की मांग करे, उस पर कार्रवाई करवाए। कांग्रेस से लेकर जोगी कांग्रेस तक ने सड़कों पर गायों के मुखौटे लगाकर तो प्रदर्शन कर लिए, लेकिन विधानसभा के इस एक दिन के सत्र में हंगामा और बहिष्कार न करके इसमें गायों पर भी ठोस चर्चा होनी चाहिए वरना सड़कों का प्रदर्शन अखबारी सुर्खियां बटोरने वाला ही माना जाएगा।

धान-बोनस की रकम का समझदारी से इस्तेमाल हो

संपादकीय
1 सितंबर 2017


छत्तीसगढ़ सरकार ने कल एक बड़ा फैसला लेकर किसानों को धान बोनस का अपना पुराना वायदा पूरा किया है, और बीते बरस की धान खरीदी पर 13 लाख किसानों को 21 सौ करोड़ रूपए बोनस देने की घोषणा की है। यह मामला इस कार्यकाल की शुरुआत से ही एक बड़ा मुद्दा बना हुआ था, और भाजपा के भीतर भी इसे लेकर नेताओं में फिक्र थी कि राज्य के किसानों की जो खराब हालत चल रही है उसके साथ अगर धान बोनस का मुद्दा जुड़ जाएगा, तो अगले चुनाव में प्रदेश में भाजपा को दिक्कत हो सकती है। पिछले कुछ महीनों में लगातार प्रदेश में किसानों की आत्महत्या भी सामने आई है, और सूखे का असर भी किसानों में देखने मिला है। इसलिए 21 सौ करोड़ रूपए का यह बोनस दसियों लाख लोगों की जिंदगी में एक बड़ी राहत लेकर आएगा।
छत्तीसगढ़ में सरकार पहले से दो मोर्चों पर किसानों और गरीबों के लिए एक बड़ा काम करते आ रही थी। राज्य की धान खरीदी की नीति, और उस पर अमल देखने के लिए देश के कई राज्यों के मुख्यमंत्री-मंत्री, और अधिकारी आते रहे हैं। यह नीति इतनी कामयाब है कि पड़ोसी राज्य ओडिशा से भी बड़ी मात्रा में धान सीमा पार करके लाया जाता है, और छत्तीसगढ़ के किसानों के कागजात के साथ मंडी में बेच दिया जाता है। नतीजा यह भी होता है कि छत्तीसगढ़ को धान उत्पादक में बढ़ोत्तरी का केन्द्र सरकार का ऐसा पुरस्कार-सम्मान भी मिल जाता है, जो कि सच्चे आंकड़ों पर टिका हुआ नहीं रहता। दूसरी तरफ राज्य के गरीबों को रियायती राशन देने की सरकार की योजना देश में सबसे सफल पीडीएस प्रणाली मानी गई है, और सुप्रीम कोर्ट से लेकर केन्द्र सरकार तक ने बाकी राज्यों को छत्तीसगढ़ की योजना का अध्ययन करने, और अमल करने को कहा है।
छत्तीसगढ़ की आबादी का पौन से अधिक हिस्सा खेती से जुड़ा हुआ है। दूसरी तरफ देश में सभी चीजें महंगी होती चल रही हैं, सिवाय किसानों की उपज के। अनाज उगाने वाले किसानों से लेकर सब्जी उगाने वाले किसानों तक की हालत बहुत खराब है, और कई राज्यों में लगातार आत्महत्याएं होती हैं। राज्य सरकारें आमतौर पर किसानों की आत्महत्या को किसानी-आत्महत्या मानने से इंकार करती हैं, और कहती हैं कि किसान बहुत से निजी कारणों से भी आत्महत्या करते हैं जिनका कि खेती में घाटे या कर्ज से लेना-देना नहीं होता है। दूसरी तरफ किसानों के मुद्दे को लेकर आंदोलन करने वाले लोगों का यह मानना है कि किसानों की जिंदगी में कोई निजी तकलीफें भी अगर रहती हैं तो उनकी जड़ें किसानी के घाटे से ही जुड़ी रहती हैं। छत्तीसगढ़ में किसानों के लिए ब्याज पर तकरीबन सौ फीसदी की छूट को मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह एक बड़ी मदद बताते हैं, और राज्य सरकार की तरफ से किसान की उपज के हर दाने को खरीदने की घोषणा भी की गई है। यहां पर यह लिखना भी जरूरी है कि राज्य में किसानों की कर्ज-भुगतान की स्थिति सबसे अच्छी है, और छत्तीसगढ़ी किसान कर्ज वापिस करने में भरोसा रखते हैं।
इस सिलसिले में हमारी एक सलाह है कि किसानों के हाथ जब इतनी बड़ी रकम आएगी, तो उसके समझदार-इस्तेमाल के बारे में भी सरकार को एक जागरूकता लानी चाहिए। यह धान-बोनस बंटना शुरू हो, उसके पहले ही सरकार को किसानों को यह समझाना चाहिए कि वे इस रकम का अपने परिवार के लिए कैसे बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं, वरना अनायास मिली कोई भी रकम कभी तीर्थयात्रा पर खर्च हो जाती है, तो कभी गैरजरूरी कार-मोटरसाइकिल खरीदने में। लोगों के बीच परिवार के भले के लिए रकम का इस्तेमाल सरकार को समझाना चाहिए।
लगे हाथों हम किसानों की जिंदगी में आई एक नई परेशानी की भी चर्चा करना चाहते हैं। गाय और गोवंश को बचाने के लिए जितने तरह के नियम-कायदे छत्तीसगढ़ सहित बहुत से राज्यों ने लागू किए हैं, और केन्द्र सरकार ने भी एक निहायत गैरजरूरी और नाजायज कड़ा कानून बनाया है, उससे भी किसानों के लिए यह मुश्किल हो गया है कि वे खेती में जानवरों का इस्तेमाल करें। भाजपा सरकारों को अपनी धार्मिक भावना को परे रखकर कृषि अर्थव्यवस्था में इस्तेमाल होने वाले जानवरों की खरीद-बिक्री, और बुढ़ापे में उनके कसाईघर भेजे जाने के बारे में फिर से सोच-विचार करना चाहिए, क्योंकि छत्तीसगढ़ में गौशालाओं में सरकार के करोड़ों के अनुदान के बावजूद बूढ़े जानवरों को जैसी मौत मिल रही है, वह कसाईघरों में कटने से जरा भी बेहतर नहीं है। कृषि अर्थव्यवस्था में जानवरों पर लगाई गई नई पाबंदियों से वे जानवर मर नहीं पा रहे हैं, और किसान न खुद जी पा रहे हैं, न उन जानवरों को खिला पा रहे हैं।