सुषमा-निर्मला की इंसानियत फौज से अधिक ताकतवर...

संपादकीय
11 अक्टूबर 2017


भारत की रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण पहली बार भारत-चीन सरहद पर पहुंचीं, तो चीनी हिस्से में वहां के सैनिक भी खड़े हुए थे। सिक्किम में वे भारतीय सैनिकों से मिलने गई थीं, लेकिन नाथू ला चौकी पर अपने इलाके में उत्सुकता के साथ खड़े हुए चीनी फौजी अफसरों से भी उन्होंने बात की। उन्हें नमस्ते किया, और नमस्ते का मतलब समझाया, नफरत और तनाव से दूर विनम्रता और मित्रता की जुबान में अनौपचारिक चर्चा की, और फिर इसका वीडियो खुद रक्षा मंत्रालय ने जारी किया। एक जरा सी दरियादिली और इंसानियत ने सरहद के दोनों तरफ लोगों का दिल जीत लिया, और भारत के साथ-साथ चीन के मीडिया ने भी निर्मला सीतारमण की बड़ी तारीफ की।
हमारे पाठकों को याद होगा कि दो-तीन दिन पहले ही हमने इसी जगह भारत के वायुसेना अध्यक्ष के उस भड़काऊ बयान के खिलाफ लिखा था जिसमें उन्होंने पाकिस्तान के परमाणु ठिकानों पर हमला करने की भारतीय वायुसेना की क्षमता का जिक्र किया था। पड़ोस के देशों से संबंध अच्छे और बुरे रखने में कुछ बुनियादी फर्क रहते हैं। रिश्ते अच्छे हों तो फौजी तैयारियों पर खर्च घटता है, और रिश्ते खराब हों, तो गरीबों के मुंह का निवाला छीनकर हथियारों के कारखानों को दौलतमंद बनाया जाता है, सरहद के गांव तनाव में जीते हैं, लोग अपनी जिंदगी खोते हैं, और देश का ध्यान अपने असल और बुनियादी मुद्दों को छोड़कर जंग की सनक पर खर्च होता है। भारत के दो तरफ चीन और पाकिस्तान ऐसे देश हैं जिनके साथ पहले जंग हो चुकी है, और आज इन तीनों देशों की जंग की तैयारियों में कम से कम भारत और पाकिस्तान तो ध्यान में रहते ही हैं, पाकिस्तान की चीन के खिलाफ, और चीन की पाकिस्तान के खिलाफ कोई तैयारी नहीं रहती।
फौजी अफसर चाहे जिस देश में हो, उनको जंग का रास्ता इसलिए सुहाता है कि उन्हें अपने बची हुई नौकरी में जंग का एक तमगा मिलने की हसरत रहती है। लेकिन दूसरी तरफ हम देखें कि भारत में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज आए दिन यह ट्वीट करती हैं कि पाकिस्तान के किस परिवार को भारत में जीवनरक्षक ऑपरेशन के लिए वीजा दिया गया, और ऐसे परिवार इलाज के पहले या इलाज के बाद उनसे मिलकर शुक्रगुजार भी होते हैं। अब निर्मला सीतारमण ने भी वैसी ही इंसानियत वाली यह बहुत छोटी सी पहल की है, और देशों के बीच बंद कमरों की बड़ी-बड़ी बातचीत के मुकाबले इस छोटी सी बात ने सबको जीत लिया। इसलिए फौजी तैयारियां धरी रह जाती हैं, पेशेवर डिप्लोमेसी धरी रह जाती है, और आखिर में इंसानियत ही असरदार होती है। हम ऐसी छोटी-छोटी दोस्ताना बातों की अहमियत इसलिए बहुत मानते हैं कि इनके बढऩे से देशों के बड़े-बड़े खर्च घटते चलेंगे, और उसी की जरूरत भी है।
यह बात हर किसी को समझना चाहिए कि दुनिया भर में हथियारबंद आंदोलनों से लेकर देशों के बीच जंग तक को भड़काने में सबसे बड़ी दिलचस्पी हथियारों के कारखानेदारों की होती है। वे एक तरफ बागियों को हथियार बेचते हैं, और दूसरी तरफ उन देशों की सरकारों को। इसके साथ-साथ देशों की सरहद पर किसी तनाव के होने पर ये कारखानेदार दोनों ही देशों को हथियार खरीदने की तरफ धकेलते हैं, और खुद मोटा मुनाफा कमाकर उन देशों को कंगाल बनाते हैं। भारत, पाकिस्तान, और चीन को समझदारी दिखाते हुए सरहद के तनाव को घटाना चाहिए, आपस में दोस्ताना रिश्तों को बढ़ाना चाहिए, और जंग की हसरत पालने वाले अफसरों को काबू में रखना चाहिए। हम कई बार इस बात को लिखते हैं कि जंग की बातें उनको अधिक सूझती हैं, जो सरहदों से दूर राजधानियों में बसते हैं, और वहां बैठकर फैसले लेते हैं। यह बात भी समझनी चाहिए कि जंग का फैसला लेने वाले कभी भी सरहद पर नहीं मारे जाते, कभी भी किसी जंग में भी नहीं मारे जाते हैं, जंग में शतरंज की बिसात सरीखे छोटे प्यादे ही मारे जाते हैं, वजीर तो राजधानियों में बैठे हुए हथियार खरीदी में कमीशन खाते रहते हैं। हर देश में वहां की जनता को ही पड़ोसी देशों की जनता के साथ दोस्ताना रिश्ते इतने बढ़ाने चाहिए कि सरकारों को अपनी जनता को अनदेखा करना मुमकिन न रह जाए। हम सुषमा स्वराज और निर्मला सीतारमण के ऐसे सकारात्मक कदमों का स्वागत करते हैं, और जनता को भी खुले दिल से, राजनीति को अलग रखकर अमन की तरफ बढ़ाए जाते ऐसे कदम की तारीफ करनी चाहिए ताकि ऐसे नेताओं का हौसला बढ़ सके।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन लोकनायक जयप्रकाश नारायण और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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